जहाँ न माया चलीं और न अखिलेश का वादा

उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर की एक दलित बस्ती में क़रीब 200 लोग रहते हैं और यहां देश की आज़ादी के बाद से हालात कुछ ख़ास नहीं बदले हैं. यहां रहने वाले दलित आज़ादी से पहले से भूमिहीन रहे हैं.

इस दलित बस्ती का नाम है अलनपुर, जो बसपा सुप्रीमो मायावती के पूर्व संसदीय क्षेत्र आंबेडकर नगर में आती है.

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केंद्रीय उत्तर प्रदेश के अवध हिस्से में आने वाले इस इलाक़े के बारे में कहा गया था कि यहां दलितों के विकास के लिए एक ख़ास योजना लाई जाएगी.

इस बार भी लगभग हर पार्टी ने चुनावों को देखते हुए दलितों के विकास की बात की है, लेकिन यहां पर विकास न के बराबर है.

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यहां के बाशिंदों का कहना है कि वो 'अपने बाप-दादा के समय से' यहां बसे हैं और मज़दूरी करते हैं.

गांव के एक बुज़ुर्ग बताते हैं, "हमारे बड़ों ने हमें बताया था कि वो पहले सेवईं में बसे थे फिर यहां आ कर बस गए थे. अब तो वो लोग ख़त्म हो गए हैं और हमें नहीं पता कि कितने सालों से हम यहां हैं."

वो आगे कहते हैं, "आज़ादी के बाद से यहां कुछ नहीं बदला. ना हमारे लिए आने-जाने के लिए एक रास्ता है, ना लहसुन बैठाने (थोड़ी खेती करने के लिए) के लिए ज़मीन ही है. चार फुट के घर में दो-तीन भाई रहते हैं. घर बनाने तक को ज़मीन नहीं."

एक और ग्रामवासी ने बताया, "जैसा पहले था अब भी वही है, कोई काम हुआ ही नहीं."

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राजनीतिक दलों के बारे में एक ग्रामवासी कहते हैं, "वो आते हैं, वादे करते हैं- रास्ता बनवाएंगे, नाली बनवाएंगे, घर बनवाएंगे. फिर चुनाव खत्म हो जाते हैं और कोई नहीं सुनता."

इस बार के चुनाव से भी इन्हें कोई ख़ास उम्मीद नहीं. आठ लोगों के परिवार के मुखिया भवानी प्रसाद कहते हैं, "खाने को मिलता नहीं है, बच्चे पढ़ने के लिए कहां से लाएं? एक आदमी कमाने वाला है और दस खाने वाले, ऐसे में स्कूल के बारे में हम नहीं सोचते."

सितारा के अनुसार, "पहले नून तेल, कपड़ा लत्ता देखें या बच्चों को स्कूल भेजें. स्कूल भी गांव से दूर हैं और डर के मारे भी बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं."

वो कहती हैं, "सरकार की तरफ से मदद मिलेगी तो इसके बारे में सोचेंगे." वो आज काम पर नहीं गईं क्योंकि उनकी तबीयत ठीक नहीं थी.

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वो पूछती हैं, "सरकारी अस्पताल की हालत ख़राब है वहां कोई पूछने वाला ही नहीं है और प्राइवेट अस्पताल में बिना पैसे कौन पूछेगा? पैसा हो तो क्या खटिया पर पड़े रहेंगे. एक लहर पानी झूम कर बरस गया तो घर के भीतर पानी टपकता है. चार-चार बच्चा जिआएं या क्या करें?"

एक अन्य महिला के अनुसार सरकारी स्कूल एक किलोमीटर दूर है, लेकिन वहां जाने के लिए गांव से हो कर जाना होता है और लोग जाति को लेकर ताने देते हैं.

वो कहती हैं, "वो मार देते हैं बच्चों को, उस स्कूल में नहीं भेजेंगे."

एक अन्य महिला ने बताया, "ना स्कूल है, ना पानी की व्यवस्था है, ना मंदिर, ना बरात घर- यहां कुछ भी नहीं है."

बिजली के बारे में ग्रामवासियों ने बताया, "खंभा लगाया है, बोर्ड लगा दिया है, लेकिन बिजली का तार ही नहीं है. बिजली विभाग ने हर घर के पीछे दस हज़ार का बिल भेज दिया है. इस बारे में हमने गांव के प्रधान को बताया है, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो पाया है."

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दसवीं के बाद अपने सपनों से नाता तोड़ चुकी एक लड़की ने बताया, "पिता अकेले काम करते थे. परिवार की मदद कर सकूं इसलिए पढ़ाई छोड़ दी है."

उन्होंने स्वच्छता को लेकर अपनी समस्या बताई, "घरों में शौचालय भी नहीं है. दूसरों के खेतों में जाते हैं तो लोग भगा देते हैं, क्या करें?"

Image caption गांव के प्रधान शफ़ाद बेग

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गांव के प्रधान शफ़ाद बेग ने बताया, "नेता आते हैं, भाषण देते हैं. डंका बजाते हैं कि इनकी बस्ती है, लेकिन कोई काम नहीं होता."

वो कहते हैं, "मैंने राशन कार्ड बनवाए हैं. वो पैसे अधिक लेते हैं और 35 किलो की बजाय 29-32 किलो का ही राशन देते हैं. लोग डर से कुछ बोलते नहीं."

पीने के पानी के बारे में पूछे जाने पर ग्रामवासियों ने कहा, "नेता आते हैं और वादे करते हैं. फिर वोट पड़ जाने के बाद कहां आते हैं नेता."

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