नज़रिया: मेरी ख़ूबसूरती मर्दों की नज़रें क्यों तय करें

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मैं ग्यारहवीं क्लास में थी. ये वो व़क्त था जब मां से बहुत झगड़ा करने के बाद मुझे 'वैक्सिंग' करवाने की इजाज़त मिली थी.

यूनीफॉर्म में स्कर्ट की तुरपाई कर उसे छोटा किया था और बस स्टॉप पर पहुंचते ही जुराबों को मोड़ कर एड़ी के पास उसका गुच्छा बनाने लगी थी.

मां ने बहुत समझाया था कि चिकनी देह ही सुंदर हो ये ज़रूरी नहीं. ये भी कहा था कि लड़के मेरे मन की सुंदरता को जानकर दोस्ती करें तभी उसे निभाएंगे.

पर मां की आवाज़ से ऊंची और साफ़ उन लड़कों की नज़रों में छिपी तारीफ़ थी जो मैं रोज़ स्कूल में देखती थी.

ये तारीफ़ उन्हीं लड़कियों के लिए थी जो मां से लड़कर जीत चुकी थीं. चिकने बदन और छोटी स्कर्ट वाली 'ख़ूबसूरत' लड़कियां.

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मैं भी उन लड़कों की नज़र में 'ख़ूबसूरत' बनना चाहती थी. उसके लिए हर महीने 'वैक्सिंग' का दर्द, पॉकेट मनी में से उसके लिए निकलता ख़र्च, और अपने बदन की नुमाइश सब मंज़ूर थी.

क्लास के लड़कों की आंखों के अलावा और भी बहुत सारी नज़रों में मैं 'ख़ूबसूरत' बन रही थी.

टीवी, फ़िल्मों और मैगज़ीनों में को देखते हुए मैं ख़ुद को उन 'ख़ूबसूरत' औरतों के नज़दीक पा रही थी जो मर्दों की पसंद थीं.

बाज़ार की नज़र इतनी अहम् कैसे होती चली जाती है? जो कुदरती है उसे बदलने की ऐसी ज़िद क्यों?

बगलों में बाल तो मर्दों के भी होते हैं, टांगों पर भी होते हैं, पर उन्हें बदसूरत क्यों नहीं मानते हम?

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'द ऐटलांटिक' पत्रिका में छपे एक लेख में बताया गया है कि अमरीका की 99 फ़ीसदी औरतें अपनी देह से बाल उतरवाती हैं.

'वैक्सिंग' के अलावा रेज़र का इस्तेमाल भी आम हो चला है.

सोचिए अगर रेज़र बनानेवाली कंपनियां औरतों के लिए ख़ास रेज़र ना बनातीं तो ये कैसे होता?

अब तो पार्लर जाऊं तो पूछते हैं, "आपकी शादी हो गई है तो 'बिकिनी वैक्स' नहीं करवाएंगी क्या"?

दर्द की कोई सीमा होनी चाहिए ना. और ये सारा दर्द हमारे हिस्से क्यों?

क्यों मर्दों को छोटी बाँह के कपड़े या कम लंबाई के शॉर्ट्स पहनने से पहले सोचना नहीं पड़ता? वो तो किसी की नज़र में बदसूरत नहीं हो जाते.

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'एजंट्स ऑफ़ इश्क़' नाम की एक वेबसाइट पर एक और लेख पढ़ा जिसमें 'देखे जाने और जज किए जाने के डर और उससे ख़िलाफ़ विद्रोह करने की मुश्किल' के बारे में लिखा है.

ऐसा बहुत पढ़ लिया अब. मंटो की कहानी 'बू' पढ़े भी बहुत व़क्त हो गया. देह की बदबू और ख़ुशबू के बारीक़ फ़र्क़ की समझ बन गई है.

पर अब भी बाज़ार और नज़रों के खेल से हार ही रही हूं.

मेरी ज़िंदगी में मेरे मन की सुंदरता समझने वाले मर्द ही मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं पर अब भी बाक़ि ग़ैर-ज़रूरी आंखों में अपनी 'ख़ूबसूरती' की तारीफ़ को कुछ अहमियत तो देती हूं.

चिकनी देह की ख़ूबसूरती का जाल मैंने बुना तो नहीं पर हर कुछ हफ़्तों में उसमें फंसकर पार्लर चली ही जाती हूं. सोचती रहती हूं कि कैसे टूटेगा ये चक्रव्यूह?

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