राहुल-अखिलेश कैसे बन गए ताज़ा हवा का झोंका

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जो लोग व्यवस्था में सुधार और बुनियादी-आर्थिक विकास के सकारात्मक प्रचार के बलबूते चुनाव जीत कर आए थे. राजनीति को स्वच्छ करने और चुनाव जीतने के दावे करते थे, वे कामों को कारनामे बता कर उनका मज़ाक उड़ाने लगे.

रोमियो स्क्वॉड जैसी मध्ययुग की बातें करने लगे और कच्चे चिट्ठे खोलने की धमकियाँ देने लगे. दुष्यन्त कुमार की अमर पंक्तियों, "कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं," की याद दिलाने लगे.

इन विधानसभा चुनावों की सबसे निराशाजनक बात यही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सुशासन, स्वच्छता, भ्रष्टाचार मुक्ति और विकास की बातें छोड़ कर लोगों को बाँटने, उकसाने और धमकाने की बातें शुरू कर दी हैं.

स्वच्छ इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्किल इंडिया और न जाने क्या-क्या इंडिया, सब कहीं खो गए हैं. बीजेपी की सबसे बड़ी कमी यह रही कि उसने स्वच्छ राजनीति की बातें करते-करते सबसे अधिक आपराधिक छवि वाले लोगों को मैदान में उतारा है.

अखिलेश और राहुल भी विकास और नई राजनीति के नाम पर मोबाइल फ़ोन, कंप्यूटर और साइकिल बाँटने, किसानों के कर्ज़े माफ़ करने या फिर फीताकटी शहरी योजनाओं के ढोल पीटते फिर रहे हैं.

गाँवों की गलियाँ, कस्बों और छोटे शहरों के बाज़ार दिनों-दिन गंदे पानी और कीचड़ से बजबजाते जा रहे हैं. कहीं नालियों और मलजल निकासी की व्यवस्था नहीं है. कूड़े के ढेर लगे रहते हैं. नलों में एक तो पानी आता नहीं, आता है तो ऐसा कि पिया जाता नहीं. बिजली नहीं. सड़कों के नाम पर गड्ढे हैं.

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सरकारी स्कूल ऐसे हैं कि ख़ुद अध्यापक अपने बच्चों को वहाँ नहीं पढ़ाते. औषधालय और अस्पताल ऐसे कि सेहतमंद को बीमार कर दें. कानून-व्यवस्था के नाम पर जिसकी लाठी उस की भैंस वाली अराजतकता है.

इनमें से बहुत से काम विधायक के नहीं, पंचायत और नगर पालिका के हैं. लेकिन उनकी व्यवस्था तो राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. मान लिया नेता इन मुद्दों से भागते हैं. लेकिन जनता को तो इन्हें उठाना चाहिए!

यही हाल भ्रष्टाचार और कुशासन के मुद्दे का है. लगता है यह किसी का सरोकार ही नहीं है. जबकि सब जानते हैं कि कुशासन की जड़ भ्रष्टाचार ही है. राजनीति में फैला वंशवाद और भाई-भतीजावाद भी भ्रष्टाचार का ही एक रूप है.

अखिलेश देश के सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे के होकर और राहुल सबसे शक्तिशाली राजनीतिक कुनबे के होकर भी समाजवाद और सामाजिक न्याय की दुहाई देते हैं.

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विधायकों के वेतन और भत्तों को बढ़ा कर दोगुना-चौगुना कर लिया गया है. फिर भी न कोई पारदर्शिता है न ईमानदारी. पार्टियाँ नेताओं की जागीर की तरह हैं.

विधायक बनते ही जनता के सेवक शहंशाह की तरह बर्ताव करने लगते हैं. यदि प्रदेश में नई और युवा राजनीति की बात हो रही है तो ये सब बातें क्यों नहीं हो रहीं?

पूर्वी यूरोप के देश रोमानिया में सरकार ने 48,500 डॉलर से कम की धाँधली को संगीन जुर्म की श्रेणी से निकालने की कोशिश की थी. पाँच लाख लोग बुखारेस्ट के विजय चौक में प्रदर्शन पर उतर आए. सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा लेकिन लोग अब सरकार के इस्तीफ़े की माँग पर अड़ गए हैं. हमारे यहाँ ऐसा क्यों नहीं होता? क्या हम रोमानिया की बराबरी पर भी नहीं आ सकते?

किसी जागीरदार की तरह मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर बाँटने, कर्ज़े माफ़ करने, कुछ समुदायों को आरक्षण दे देने और शहरों को जोड़ने वाली टोल फ्री सड़कें बनाने से विकास नहीं होगा. शिक्षा, स्वास्थ्य, जलमल निकासी और सड़क-बिजली जैसी बुनियादी सेवाओं में सुधार करना होगा.

कानून-व्यवस्था ठीक करनी होगी और शासन सुधारना होगा. जाति और धर्म से ऊपर उठ कर सोचना होगा.

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फिर भी, इन विधानसभा चुनावों में उन पार्टियों ने विकास को नारा बनाया है जो सांप्रदायिक और जातीय समीकरणों में ज़्यादा भरोसा रखती थीं. यह एक सकारात्मक बात है. लेकिन विकास और रोज़गार के नाम पर आम चुनाव जीतने वाली बीजेपी उन मुद्दों को छोड़ कर दूसरे नारों में उलझ गई है यह चिंता का विषय है.

मतदाता की मुश्किल यह है कि उसके पास इस बार भी कोई आदर्श विकल्प नहीं है. इसलिए उसे अखिलेश और राहुल का सामंती समाजवादी विकास ही ताज़ा हवा के झोंके जैसा लग रहा है. ताहिर तिलहरी साहब का शेर है:

कुछ ऐसे बदहवास हुए आँधियों से लोग,

जो पेड़ खोखले थे उन्हीं से लिपट गए.

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