SPECIAL REPORT काज़ीरंगा: गैंडों की हिफ़ाज़त में इंसानों पर ख़तरा

काज़ीरंगा इमेज कॉपीरइट Getty Images

वन्य जीव संरक्षण के मामले में काज़ीरंगा राष्ट्रीय पार्क की कामयाबी काफ़ी बड़ी है.

असम में एक शताब्दी पहले जब इस पार्क की स्थापना की गई तो यहां गिने-चुने एक सींग वाले भारतीय गैंडे थे. अभी यहां एक सींग वाले 2400 गैंडे हैं, जो कि पूरी दुनिया के इस तरह के गैंडों की दो-तिहाई आबादी है.

लेकिन इस पार्क में वन्यजीवों की सुरक्षा जिस तरीके से की जाती है, वह काफी विवादित है. यहां रेंजर्स को गोली मारने का अधिकार तक दिया गया है. इस तरह के अधिकार भारत में अशांति के वक़्त में केवल सशस्त्र बलों को ही दिए जाते हैं.

Image caption गार्ड अवधेश और जिबेश्वर

गैंडों को अवैध शिकारियों से बचाने के क्रम में एक साल में 20 लोगों से ज़्यादा लोग मारे जाते हैं. 2015 में जितने गैंडों को शिकारियों ने मारा उससे ज़्यादा लोग पार्क के सुरक्षाकर्मियों की गोली से मरे. ये ज़्यादातर बेगुनाह ग्रामीण आदिवासी हैं जो इस संघर्ष की चपेट में आ जाते हैं.

गैंडों को सुरक्षा की ज़रूरत है. चीन और वियतनाम में गैंडों के सींग भारी कीमत पर बिकते हैं. चीन और वियतनाम में इसके सींग का इस्तेमाल कैंसर और यौन बीमारियों के इलाज में किया जाता है. 100 ग्राम सींग चार लाख रूपए से अधिक में बिकती है यानी इसकी कीमत सोने से भी ज़्यादा है.

भारतीय गैंडों के सींग अफ़्रीकी गैंडों के सींग से छोटे होते हैं, लेकिन कहा जाता है कि बाज़ार में भारतीय गैंडों के सींग की मांग ज़्यादा है. अब सवाल यह है कि हमें विलुप्तप्राय जानवरों की सुरक्षा में कहां तक जाना चाहिए? मैंने यहां के दो सुरक्षाकर्मियों से पूछा कि जब पार्क में उनका सामना शिकारियों से होता है तो उन्हें क्या करने के लिए कहा गया है.

इस सवाल के जवाब में अवधेश नाम के एक गार्ड ने बिना किसी झिझक के कहा, ''साफ़ निर्देश है कि शिकारियों को देखते ही हमें गोली मार देनी है.'' मैंने पूछा, ''आपने गोली मारी है?''

अवधेश ने कहा, ''हां, हां. पूरा आदेश है कि गोली मार देनी है. जब रात के वक़्त में हम शिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को देखते हैं तो उन्हें गोली मार देने का आदेश है.''

Image caption कच्चु कलिंग और उनकी पत्नी

अवधेश ने बताया कि पिछले चार सालों में गार्ड रहते हुए उन्होंने दो लोगों को गोली मारी है लेकिन कोई मरा नहीं. हालांकि अवधेश जानते हैं कि अगर ऐसा होता भी हैं तो उन्हें किसी भी तरह की मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ेगा.

काज़ीरंगा पार्क में सरकार ने गार्डों को असाधारण शक्ति दी है.

ये गार्ड किसी को मार देते हैं तो इनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलने पर सरकार पर्याप्त संरक्षण देती है.

अवधेश और जिबेश्वर जैसे गार्डों को लेकर आलोचकों का कहना है उन्हें ग़ैरक़ानूनी तरीके से हत्या करने की अनुमति दी गई है. पार्क में अब तक कितने लोगों को मारा गया इसका आंकड़ा निकालना आश्चर्यजनक रूप से कठिन है. भारतीय वन विभाग के सीनियर अधिकारियों ने कहा, ''हम लोग सब कुछ अपने पास नहीं रख सकते.''

इस पार्क के निदेशक डॉ सत्येद्र सिंह ने कहा कि पार्क में शिकारियों को पकड़ना काफी मुश्किल है.

उन्होंने कहा कि शिकारियों का गैंग स्थानीय लोगों से पार्क में जाने के लिए मदद लेता है. गैंग इस काम में स्थानीय लोगों को नियुक्त करता है.

सिंह ने कहा कि असली शूटर वे हैं जो गैंडों को मारते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे लोग पड़ोसी राज्यों से आते हैं. उन्होंने कहा कि शूट-ऑन-साइट टर्म की व्याख्या ठीक से नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि यह संदिग्ध शिकारियों से निपटने के लिए गार्डों को दिया गया आदेश है.

उन्होंने कहा, ''पहले हम लोग चेतावनी जारी करते हैं. हम पूछते हैं कि तुम कौन हो? अगर वे गोलीबारी पर उतर आते हैं तो हम उन्हें मार देते हैं. पहले हम लोग उन्हें गिरफ़्तार करने की कोशिश करते हैं. हम लोग सूचना हासिल करते हैं कि इसकी कड़ी क्या है और इस गैंग में और कौन लोग हैं.''

Image caption यहां कैथरीन और विलियम्स भी आ चुके हैं

डॉ सिंह ने कहा, ''पिछले तीन सालों में 50 शिकारी मारे जा चुके हैं. गैंडों के शिकार में 300 स्थानीय लोग शामिल हैं'.

काज़ीरंगा के आसपास जो लोग रहते हैं उनके लिए मृतकों की बढ़ती संख्या एक बड़ा मुद्दा बन गया है.'

बाकी भारत के मुक़ाबले काज़ीरंगा घनी आबादी वाला इलाका है. यहां सदियों से जंगल में और उसके आसपास आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं. ये यहां से जलाने के लिए लकड़ी, जड़ी बूटी और पौधों को इकट्ठा करते हैं. इनका कहना है कि बेगुनाह ग्रामीणों को मारे जाने की वारदात में बढ़ोतरी आई है.

पार्क की सीमा से सटे एक गांव में काचु कलिंग अपनी पत्नी के साथ रहते हैं. दिसंबर 2013 में इनके बेटे गोआनबुराह को गार्डों ने गोली मार दी थी. गाओनबुराह घर की दो गायों को चरा रहा था. उसके पिता का मानना है कि गायों के साथ वह रास्ता भटककर पार्क में चला गया था.

Image caption ग़ुस्से में हैं ग्रामीण

इसमें किसी से भी ग़लती होना काफ़ी आसान है. पार्क के इलाके की घेराबंदी नहीं की गई है. यहां कोई बाड़ नहीं है. पार्क को पहचानना आसान नहीं है.

पार्क के अधिकारियों का कहना है कि गोआनबुराह को गार्ड ने गोली तब मारी जब उसने संरक्षित इलाके में चेतावनी जारी करने के बाद कोई जवाब नहीं दिया.

पिता ने कहा, ''वह मुश्किल से ख़ुद से अपनी पैंट और जूते पहन सकता था. वह विकलांग था इसलिए इस इलाके में उसे सभी लोग ठीक से जानते थे. कच्चु कलिंग को भरोसा नहीं है कि वह अपने बेटे के मारे जाने के ख़िलाफ़ कुछ कर सकते हैं, क्योंकि गार्डों को सरकार ने इस मामले में काफी संरक्षण दे रखा है.

उन्होंने कहा, ''मैंने कोई मुक़दमा दायर नहीं किया है क्योंकि मैं ग़रीब हूं और इसे वहन नहीं कर सकता हूं".

Image caption पर्यटकों को बीच काफ़ी लोकप्रिय है काज़ीरंगा

यह सच है कि काज़ीरंगा इस इलाक़े में पर्यटन मुख्य आकर्षण है जिसके केंद्र में गैंडे हैं. हर साल एक लाख 70 हज़ार से ज़्यादा लोग यहां आते हैं और ये ठीक-ठाक पैसे खर्च करते हैं. ऐसे में इसे आसानी से समझा जा सकता है कि पार्क को शिकारियों से बचाने के लिए राजनीतिक दबाव क्यों इतना ज़्यादा है.

2013 में शिकारियों ने कई गैंडे मारे थे. यह संख्या बढ़कर 27 हो गई थी. तब स्थानीय नेताओं ने कड़ी कार्रवाई की मांग की थी.

पार्क के निदेशक ने इस मांग से ख़ुशी जताई थी. एमके यदवड़ा ने एक रिपोर्ट लिखी थी. इसमें उन्होंने काज़ीरंगा में शिकारियों पर काबू पाने की रणनीतियों की विस्तृत जानकारी दी थी जिसमें कहा गया था कि पार्क में घुसने वाले आदेश न मानें तो उन्हें गोली मारी जा सकती है.

उन्होंने सिफारिश की थी कि गोली चलाना अनचाहा है और इसमें गार्डों को सिखाने की ज़रूरत है.

उन्होंने अपनी सिफ़ारिशों की व्याख्या करते हुए कहा कि पर्यावरण से जुड़े अपराध, जिसमें कि अवैध शिकार भी शामिल है, और वह हत्या से भी संगीन है.

उन्होंने कहा, ''वे बड़ी ख़ामोशी से पृथ्वी की सभी सभ्यताओं के अस्तित्व को नष्ट कर देते हैं.'' उन्होंने पार्क को सुरक्षित रखने के लिए बिना समझौता किए कड़े क़दम उठाने का समर्थन किया.

मारे जाने वालों की संख्या में बढ़ोतरी नाटकीय रूप से हुई है. आरोप है कि 2013 से 2014 में शिकारियों के मारे जाने की संख्या 5 से 22 हो गई. 2015 में काज़ीरंगा में गैडों के मुक़ाबले शिकारी ज़्यादा मारे गए. इस साल 17 गैंडों के मुक़ाबले 23 लोग मारे गए.

पिछले साल जुलाई में सात साल का आकाश ओरांग पार्क की सीमा से सटे गांव के मुख्य मार्ग से आ रहा था. वह उस वाकये को बताते हुए हकलाने लगता है.

वो बताता है, ''मैं एक दुकान से वापस आ रहा था. गार्ड चिल्ला रहा था- गैंडा! गैंडा! इसके बाद वह चुप हुआ और उसने अचानक मेरे ऊपर गोली चलाई. गोली मेरे दाहिने पैर के पास फटी.'' जख़्म काफी गंभीर था. आकाश को पांच घंटे की दूरी पर असम के मुख्य हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया.

Image caption आकाश अभी भी चोट से उबर नहीं सका है और उसका भाई उसे सहारा देता है

आकाश यहां चार से पांच महीनों तक रहा और उसकी कई सर्जरी हुई. हॉस्पिटल की कोशिश की बावजूद आकाश मुश्किल से चल पाता है.

आकाश के पिता दिलीप ओरांग ने अपने बेटे के बैंडेज को हटाकर जख़्म को दिखाया.

उसका पैर देखने के बाद लगता है कि इस पर कोई चमड़ी ही नहीं है. पिंडली की मांसपेशी किसी कड़ी गेंद की तरह अकड़ गई है. इसे मोड़ा नहीं जा सकता है. उन्होंने कहा कि यहां के मांस को फिट करने की कोशिश की गई लेकिन यह सफल नहीं रहा.

उसका बड़ा भाई हमें स्थानीय दुकान पर लेकर आया है.

दिलीप ने कहा कि वह अब बदल गया है. वह पहले ख़ुश रहा करता था. अब वैसा नहीं रहा. रात में वह दर्द से कराहता है और अपनी मां के लिए रोता है. पार्क इस बात को स्वीकार करता है कि उसने आकाश के मामले में बड़ी ग़लती की थी. आकाश के इलाज में पार्क की तरफ से ही सारा खर्च वहन किया गया. परिवार वालों को दो लाख रुपए का मुआवजा भी दिया गया था.

आकाश के विकलांग होने के बाद ग्रामीणों में काफी रोष था. लोगों के मारे जाने की बढ़ती संख्या को लेकर विरोध-प्रदर्शन चरम पर था. सैकड़ों लोगों ने पार्क मुख्यालय की तरफ मार्च किया था.

पार्क हेडक्वॉर्टर के पास में ही मानवाधिकार कैंपेनर प्रणब डोली का घर है. वह स्थानीय आदिवासी समुदाय से हैं. उन्होंने अपने बैग से दस्तावेज़ निकाले. उन्होंने भारत के सूचना अधिकार क़ानून के तहत कई अनुरोध किए हैं. इन आवेदनों की प्रतिक्रिया में जो जवाब मिले हैं, उनसे पता चलता है कि ज़्यादातर मामलों को ठीक से नहीं देखा गया.

उन्होंने कहा, ''ज़्यादातर मामलों की न्यायिक जांच नहीं हुई. इनकी कोई फोरेंसिक रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी नहीं है. पार्क का कहना है कि वह इस जांच के लिए जवाबदेह नहीं है. क़ानून के तहत जो कुछ भी होगा उसे किया जाएगा. डोली के दस्तावेज़ों के मुताबिक़ कई मामलों में सूचनाओं का पर्याप्त अभाव है. उन्होंने मृतकों की सूची बनाकर रखी है.

पार्क का कहना है कि पिछले तीन सालों में अवैध शिकार के मामले में केवल दो लोगों पर मुक़दमा चला.

आश्चर्यजनक रूप से इसी वक्त 50 लोगों को पार्क में गोली मारी गई. पार्क में मारे गए लोगों की संख्या पर सवाल करने कहा गया कि मारे गए लोगों की संख्या ज़्यादा इसलिए है क्योंकि यहां सशस्त्र शिकारी गैंग काफी सक्रिय हैं और इन्होंने सुरक्षाबलों को साथ गोलीबारी की थी.

हालांकि आंकड़ों से संकेत मिलते हैं एनकाउंटर एकतरफा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पिछले 20 सालों में शिकारियों के हाथों केवल एक गार्ड मारा गया था.

इसकी तुलना में इसी वक्त गार्डों के हाथों 106 लोग मारे गए. डोली ने ज़्यादा लोगों को मारे जाने की वजह बताई कि पार्क के सुरक्षाकर्मियों को क़ानूनी कवच मिला हुआ है.

उन्होंने कहा, ''इस तरह की माफी ख़तरनाक है. इस वजह से पार्क और उसके आसपास रहने वाले लोगों के बीच वैमनस्य फैल रहा है.''

इस मामले को लंदन स्थित चैरिटी सर्वाइवल इंटरनेशनल में भी लाया गया.

कहा जा रहा है कि पार्क के आसपास रहने वाले आदिवासियों के हक़ों को वन्यजीव सुरक्षा के नाम पर मारा जा रहा है.

इस संस्था की कैंपेनर सोफी ग्रिग ने कहा, ''इस पार्क का संचालन क्रूरता के साथ किया जा रहा है. यहां न कोई अदालत है, न कोई जज है और न ही कोई सवाल करने वाला है. और डराने वाली बात यह है कि इस योजना को पूरे भारत में बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है.''

ग्रिग ने कहा कि दुनिया भर के बड़े वन्यजीव संरक्षण चैरिटी, जिसमें वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड भी शामिल है, आंख बंद कर काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, ''डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ख़ुद को असम में वन विभाग का बड़ा साझेदार कहता है. वह वन विभाग को उपकरण और फंड मुहैया कराता है. पार्क के पास देखते ही गोली मारने वाली नीति के ख़िलाफ़ लोगों से हमेशा कहा जाता है कि वे अपनी आवाज़ बुलंद करें.

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया वेबसाइट के मुताबिक़ काज़ीरंगा के गार्डों को घात लगाकर हमला करने की ट्रेनिंग दी जाती है.

इसके साथ ही फंड भी मुहैया कराया जाता है. इन्हें रात में देखने के लिए ख़ास उपकरण भी उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि अवैध शिकार पर लगाम लग सके.

इंडिया में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ संरक्षण प्रोग्राम को चलाने में मदद करने वाले डॉ दिपांकर घोष ने कहा, ''कोई भी किसी को मारकर अच्छा महसूस नहीं करता है. सुरक्षा के लिए जो भी ज़मीन पर करने की ज़रूरत है उसे किया जा रहा है. अवैध शिकार रूकना चाहिए.''

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