भागी हुई लड़कियां: 'मैं एक गरीब लड़के के लिए बाप की दौलत छोड़ भागी'

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'क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी है?'

कहानी हरियाणा की एक लड़की की. जो अब भी समाज और परिवार की नज़र में चुभ रही है, क्योंकि उन लोगों की नज़रों में वो आज भी भागी हुई लड़की है.

बीबीसी की सिरीज़- 'भागी हुई लड़कियां' की पहली किस्त में आपने विभावरी की कहानी पढ़ी.

आज बारी है दूसरी किस्त की. आगे की कहानी, भागी हुई लड़की की ज़ुबानी.

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शिवानी

उन दिनों मैं कॉलेज में कहा करती थी कि कुछ भी कर सकती हूं, पर इन चक्करों में नहीं पड़ सकती. मेरी जैसी कई लड़कियों के लिए प्यार शुरू में चक्कर ही होता है.

हरियाणा रोडवेज से कॉलेज आती-जाती थी. वहीं रवि से मुलाकात हो जाती थी. ये मुलाकातें न जाने कब प्यार में बदल गईं. प्यार जब ताजा होता है तो इस बात की फिक्र किसे होती है कि अगले मोड़ पर क्या होगा, बस नदी की तरह बहते जाना होता है.

मेरे पापा अक्सर नौकरी के सिलसिले में विदेश रहते. अमीर-गरीब की जो कैटेगिरी समाज में बनी हुई है, उस हिसाब में हमारा परिवार अमीर था और रवि का परिवार गरीब. रवि की नौकरी तक नहीं लगी थी. इधर मेरे पापा मम्मी से कहा करते थे, ''मैं अपनी बेटी शिवानी का ब्याह ऐसा करूंगा कि पूरे गांव ने नहीं देखा होगा.''

मम्मी अक्सर टोककर कहतीं, ''इस छोरी को इतना मत बिगाड़ो. गरीब घर में ब्याह हुआ तो इसके चोचले नहीं चलेंगे.'' पापा हंसते हुए कहते, ''गरीब घर में क्यों जाएगी मेरी बेटी. बेटी को खूब सारे रुपये बांध के भेजूंगा.''

सब अच्छे से चल रहा था कि मेरे चाचा को रवि और मेरे बारे में पता चल गया. मैंने हिम्मत कर पापा से कहा कि रवि भी हमारी तरह यादव है. वो शादी के लिए राज़ी भी हुए. लेकिन पता नहीं क्यों वो अचानक अपनी ही बेटी से किया वादा भूल गए और विदेश लौट गए.

इस बीच चाचा ने मेरी मार पिटाई शुरू कर दी. चाचा मोहल्ले के सामने पीटते. डराने के लिए करंट लगाते. मम्मी को बुरा तो लगता, पर वो कुछ कहती नहीं थीं. रवि अपने परिवार के साथ बात करने मेरे घर भी आया लेकिन चाचा ने साफ कह दिया, ''छोरी को जान से मार देंगे लेकिन तुम्हारे घर ब्याह नहीं करेंगे.''

Image caption आलोकधन्वा की कविता के अंश

चाचा ने तो एक बार खाने में ज़हर तक मिलाकर पिला दिया था. लेकिन मेरी किस्मत में मरना नहीं था. बच गई तो पापा छुट्टी लेकर घर आए और मेरे लिए लड़का खोजकर सगाई की बात चलने लगी. मैंने कहीं से नंबर निकालकर लड़के वालों से कह दिया कि मुझे कोई और पसंद है. मेरी कही इस एक लाइन से वो रिश्ता और मेरा फोन दोनों मुझसे छूट गए.

घरवालों ने मेरे डॉक्यूमेंट्स तक जला दिए. रवि के पापा कहते, 'बेटा तू पुलिस में शिकायत कर दे बाकी हम संभाल लेंगे.' लेकिन मैं घर से निकलती तो निकलती कैसे?

लेकिन एक रात रवि के दोस्त की मदद से मैं रात को घर से निकल ली.

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तय जगह पर रवि से मिली. कई दिन पुलिस कस्टडी में रहे. रिश्तेदारों के यहां भटके. इस बीच रवि के घरवालों को भी खूब धमकाया गया. लेकिन धीरे-धीरे मामला शांत हुआ. आर्य समाज मंदिर में हम दोनों ने शादी कर ली.

पापा, तुमने सही कहा था. पूरे गांव ने ऐसी शादी कभी नहीं देखी होगी.

रवि अब भी कहीं नौकरी नहीं करता है. वो अब खेत संभालता है. मैं भले ही अमीर घर से थी, घर हमारा बड़ा था लेकिन अब मैं यहां एडजस्ट करके रहना सीख गई हूं.

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कई बार सोचती हूं कि ये सब कब कैसे हुआ. तो बस कुछ कड़वी और मीठी यादें ही आंखों के सामने आती हैं.

मेरे घर से अब कोई मुझसे मिलने नहीं आता. नानी मरने से कुछ दिन पहले तक बस अड्डे मिलने आती तो बताती थीं कि मम्मी याद करके रोती हैं. सास ससुर सब खूब लाड़ करते हैं लेकिन डरते हैं कि कहीं मैं बयान न बदल लूं. रवि के घरवालों ने हमारे प्यार का खूब साथ दिया.

एक बार अपने ससुर से पूछा भी था, ''पापा जी, एक परायी लड़की के लिए इतना खतरा मोल लेने की हिम्मत कहां से आई.''

जवाब में पापाजी बोले, ''जब तेरे चाचा ने बोला कि जान से मार देंगे लेकिन शादी नहीं करवाएंगे. तभी मैंने सोच लिया था. छोरी मरने नहीं देनी है.''

और मैं मरी भी नहीं.

(इस सच्ची कहानी के सारे पात्र और जगहों के नाम बदले हुए हैं.)

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