नज़रिया: सेनाध्यक्ष का बयान ज़रूरत भी है, मजबूरी भी

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भारत प्रशासित कश्मीर में इस महीने हुई तीन अलग-अलग मुठभेड़ों में आठ चरमपंथी और एक मेजर समेत भारतीय सेना के छह जवान मारे गए हैं. इन मुठभेड़ों में सेना और सुरक्षा बलों के 10 जवान जख्मी हैं.

ये आंकड़े कश्मीर की ज़मीनी स्थिति के सिर्फ़ एक और शायद सतही पहलू ही बयां करते हैं.

ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानना और समझना है कि किन हालात में ये मुठभेड़ हुए.

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सुरक्षा बलों पर आम लोगों के जानमाल का नुक़सान होने से बचाने का कितना दबाव है. जिन इलाकों में मुठभेड़ होती है, वहां के स्थानीय लोगों का रवैया और प्रतिक्रिया कैसी है. किस तरह स्थानीय लोग सुरक्षा बलों पर पथराव कर रहे हैं. उग्र भीड़ की ओट लेकर किस तरह एक तरफ तो चरमपंथी भाग निकलने में कामयाब हो रहे हैं.

वहीं दूसरी ओर सेना और अर्धसैनिक बलों के जवान ज्यादा संख्या में हताहत हो रहे हैं. इस माहौल और घटनाक्रम का चरमपंथियों और सुरक्षा बलों के मनोबल पर क्या असर पड़ रहा है?

इन सवालों के जवाब को रेखांकित करने की ज़रूरत नहीं है.

घाटी पर चुप्पी तोड़न में सरकार से हुई देरी

भारत के सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने चरमपंथियों का समर्थन कर रहे कश्मीरियों को चेतावनी दी है कि अगर सुरक्षा बलों के काम में उन्होंने दखलदांजी की और आतंकियों का समर्थन किया तो उन्हें भी देशद्रोही की तरह देखा जाएगा. उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

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जनरल रावत का बयान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय सेना के सब्र का प्याला भर चुका है.

अब तक सेना और सुरक्षा बल अपनी तरफ से पूरी एहतियात बरतते थे कि 'कॉलेट्रल डैमेज' कम से कम हो यानी स्थानीय लोग कम से कम निशाना बनें. आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच होने वाली गोलाबारी में आम लोग न फंसें. लेकिन अब जब पिछले कुछ महीनों से एक के बाद एक मुठभेड़ों में स्थानीय लोगों ने चरमपंथियों का साथ दिया है, सुरक्षा बलों का रास्ता रोका है और उन पर पथराव किया है,

ऐसे में इस रणनीति में चेतावनी के साथ संशोधन करना सेनाध्यक्ष की ज़रूरत और मजबूरी दोनों बन गए हैं.

सेनाध्यक्ष की इस बदली हुई रणनीति का कारण भी अच्छी तरह से समझ में आ रहा है. अब तक सुरक्षा बलों को अधिकतम संयम बरतने का निर्देश इसलिए था कि स्थिति और न बिगड़े. पहले ही आतंकवादियों के जनाजों में ही इतनी भीड़ जमा होती रही है. निर्दोष और निहत्थे नागरिक जब मारे जाते हैं तब तो स्थिति और विस्फोटक हो जाती है. इसके बाद जो क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर शुरू होता है उसे काबू करने में कई महीने लग जाते हैं.

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पिछले साल बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में जो कुछ हुआ वह सबको मालूम है.

हिजवुल कमांडर बुरहान वानी की मौत

स्थानीय नागरिकों को कम से कम चोट पहुंचे, इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सुरक्षा बलों के हाथ जैसे पहले ही एक तरह से बंधे हुए थे.

कितने ही ऐसे वीडियो और ख़बरें सामने आईं जिनमें हाथ में बंदूक लिए सुरक्षाकर्मी भीड़ से अपनी जान बचाकर भाग रहे होते थे.

लेकिन डैमेज कंट्रोल और संयम की यह नीति कहीं न कहीं सुरक्षा बलों को ही ज्यादा नुक़सान पहुंचाने लगी थी.

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मंगलवार को स्थानीय लोगों की पथराव कर रही भीड़ ने सेना की गाड़ियों का रास्ता रोका. इससे घायल मेजर सतीश दहिया समय पर श्रीनगर के बेस अस्पताल नहीं पहुंच पाए. उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

इस घटना से सेना में बहुत रोष है. लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने बुधवार को लिखे एक लेख में आतंकवादी घटनाओं में भारतीय सेना को होने वाले नुक़सान का जिक्र किया है.

उन्होंने लिखा है कि पांच आतंकवादियों के बदले एक सैनिक की जान जाना तो फिर भी समझा जा सकता है लेकिन आठ आतंकवादियों के मुकाबले एक मेजर सहित छह सैनिकों की कुर्बानी किसी भी हालत में सेना को स्वीकार नहीं है. इससे मौक़े पर मौज़ूद सुरक्षा बलों का मनोबल प्रभावित होता है और चरमपंथियों का हौसला बढ़ता है.

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जनरल रावत की ओर से दी गई चेतावनी को इसी परिप्रेक्ष्य में लिया जाना चाहिए. लेकिन सिर्फ चेतावनी देने से बात बन जाएगी और स्थानीय लोगों का रवैया बदल जाएगा, यह सोचना भी शायद खुशफहमी होगी. अगर जमीन पर हालात नहीं बदलते तो सेना को और आक्रामक रवैया अपनाना होगा.

सेनाध्यक्ष के बयान के बाद उनके संयम को भी कमजोरी की तरह देखा जाएगा. दूसरी तरफ अगर सैन्य कार्रवाई में स्थानीय लोग हताहत होते हैं तो कश्मीर में हालात फिर पिछले साल जैसी बन जाने की आशंका है.

कड़ी कार्रवाई की चेतावनी तो दे दी गई है लेकिन सेना और प्रशासन के लिए 'चित्त भी तेरी पट्ट भी तेरी' वाली स्थिति बन गई है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

(इस मुद्दे का दूसरा पहलू पढ़िएगा सत्येंद्र रंजन की कलम से शुक्रवार शाम)

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