नज़रिया: यूपी चुनाव से कहाँ ग़ायब हैं स्मृति इरानी?

  • 17 फरवरी 2017
कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए दो चरणों का मतदान हो चुका है, लेकिन कभी मुख्यमंत्री पद की दावेदार बताई जा रहीं स्मृति इरानी इस दौरान कहीं खो सी गई हैं.

2014 में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ख़िलाफ़ अमेठी में आक्रामक तेवर दिखा चुकीं स्मृति का आख़िर भाजपा इस बार इस्तेमाल क्यों नहीं कर रही है? इस बार के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में स्मृति इरानी अब तक एक चुनावी सभा में शामिल में हुईं. उन्होंने 12 फ़रवरी को शाहजहांपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित किया था.

क्या मंत्रालय बदलने के बाद उनका क़द घटा दिया गया है या कोई और वजह है?

पांच फ़रवरी को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने तीन तलाक़ के मुद्दे पर विपक्षी दलों को घेरने की कोशिश ज़रूर की.

उन्होंने मायावती, राहुल गांधी और अखिलेश यादव से इस मुद्दे पर अपना स्टैंड साफ करने को कहा.

स्मृति न सिर्फ एक स्टार प्रचारक हैं बल्कि अच्छी वक़्ता भी हैं. फ़िल्मी बैकग्राउंड होने की वजह से भी वे काफ़ी लोकप्रिय हैं. वे 1998 में मिस इंडिया के फ़ाइनल में पहुँची, लेकिन जीत नहीं पाईं.

अंदरूनी कलह से क्या डूबेगी बीजेपी की लुटिया?

शरद यादव ने कब कब की महिलाओं पर टिप्पणी

यूपी चुनाव का वो फैक्टर जो बदल सकता है सारे समीकरण

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

अमेठी में मुकाबला

कई सालों तक चले एक टीवी सीरियल 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में निभाया तुलसी विरानी का चरित्र आज भी उनकी पहचान का एक हिस्सा है. लेकिन पिछले कुछ सालों मे उन्होंने राजनीतिक जीवन में अपनी अलग जगह बना ली है.

खासतौर पर 2014 के लोकसभा चुनाव में अमेठी से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ख़िलाफ़ अच्छा मुक़ाबला करने के बाद. केवल 15-20 दिन के प्रचार के बाद ही वे राहुल के साथ सीधे मुक़ाबले में आ गई थीं.

दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी के कद्दावर नेता कुमार विश्वास दो महीने से अमेठी में डेरा डाले रहने के बावजूद चंद हज़ार वोट ही बटोर पाने में कामयाब हो पाए. अमेठी के लोकसभा चुनाव दौरान वे स्थानीय लोगों से इंस्टैंट कनेक्ट बनाने में सफल रही थीं. ख़ासतौर पर महिलाओं में उन्होंने अच्छी पैठ बना ली थी.

उत्तर प्रदेश में 'बीजेपी सीएम' की घुड़दौड़

'स्मृति ने ही कहा था- मेरी डिग्री मत दिखाओ'

रोहित की मां के सवालों का जवाब देंगे प्रधानमंत्री?

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

मोदी की करीबी

स्मृति की चुनौती के मद्देनज़र ही कांग्रेस ने राहुल के पक्ष में प्रियंका गांधी को प्रचार की ज़िम्मेदारी दी थी. राहुल की जीत का श्रेय इसीलिए किसी हद तक प्रियंका को जाता है. स्मृति ईरानी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी नेताओं में शुमार किया जाता है.

यही वजह है कि उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में मानव संसाधन विकास मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग की ज़िम्मेदारी मिली. हालांकि शिक्षा के भगवाकरण को लेकर उन पर काफ़ी आरोप लगे तो कभी अपनी शिक्षा को लेकर वे सवालों के घेरे में खड़ी नज़र आईं, लेकिन उन्होंने सभी चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला किया.

संसद में रोहित वेमुला के मामले पर दिए उनके भाषण के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे. लेकिन पिछले फेरबदल में मोदी ने उन्हें टेक्सटाइल मिनिस्ट्री में भेज दिया. हालाँकि वहां भी उन्होंने खादी को बढ़ावा देने को लेकर हेडलाइन्स बटोरीं लेकिन वे किसी हद तक लाइमलाइट से बाहर हो गईं.

ये है मोदी के मंत्रियों के कैश का हिसाब

कोई नाराज़गी नहीं, पार्टी के साथ हूं: योगी

'राहुल के मुंह से सच्चाई आखिर निकल ही गई'

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

गांधी परिवार

स्मृति अमेठी से जीतने में सफल भले ही न हो पाई हों, लेकिन उन्होंने अमेठी से नाता बनाए रखा. वे लगातार अमेठी जाती रहती हैं और वहां विकास के काम शुरू कराने से लेकर चल रहे कामों की समीक्षा करती रहती हैं.

उनका आरोप है इतना महत्वपूर्ण लोकसभा क्षेत्र होने के बावजूद गांधी परिवार ने इसकी उपेक्षा की है और इस परिवार से 40 सालों से ज़्यादा समय से जुड़ाव के बावजूद यह प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है. वे कहती रही हैं कि अगली बार वे फिर यहीं से लड़ेंगी और जीत दर्ज करने के बाद विकास की गंगा बहा देंगी.

यही वजह थी कि यूपी की नेता-विहीन भारतीय जनता पार्टी को लगा कि स्मृति के रूप में उसे एक चेहरा मिल गया है जिसे बतौर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार उतारा जा सकता है. स्मृति के यूपी के लगातार बढ़ते दौरों ने भी इस खबर को आधार प्रदान किया.

'वेमुला की मां ने दलित होने का ढ़ोंग किया'

ELECTION SPECIAL: क़िस्सा अखिलेश और मुलायम की रैलियों का

अमित शाह के लिए बजने लगी है ख़तरे की घंटी?

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

यूपी की राजनीति

माना गया कि इस बार पीएम मोदी को यूपी में अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर नहीं लगानी पड़ेगी. लेकिन फिर स्मृति इरानी को लड़ाई से बाहर कर दिया गया. माना जा रहा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीएम कैंडिडेट किरण बेदी को बाहरी आदमी मानकर न तो पार्टी के स्थानीय नेताओं ने सहयोग दिया और न ही लोगों ने वोट दिया.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बीजेपी में टिकट बंटवारे को लेकर घमासान, क्या बोले योगी आदित्यनाथ

नतीजा यह हुआ कि मुख्यमंत्री बनना तो दूर वे अपने विधानसभा क्षेत्र से भी हार गई थीं. भाजपा को डर था कि कहीं किरण बेदी जैसा हश्र स्मृति इरानी का भी न हो. वहीं आरएसएस भी स्मृति को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने के खिलाफ था. हालाँकि भाजपा नेता इसे एक रणनीतिक फैसला क़रार देते हैं.

उनका कहना है कि उन्होंने स्मृति इरानी को केवल प्रियंका गांधी से मुकाबले के लिए बचा कर रखा है. उन्होंने कहा, "जब तक प्रियंका लड़ाई में नहीं उतरतीं, हम स्मृति को चुनाव से बाहर ही रखेंगे." पिछले चालीस साल से यूपी की राजनीति पर छाए कुछ अन्य नेता भी स्मृति की तरह चुनाव पटल से नदारद हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)