नोटबंदी ने दी यूपी की इन औरतों को ताक़त

"पिताजी के पास किराए के पैसे नहीं थे. एटीएम बंद पड़े थे. मैंने 50 का नोट निकाला तो वे खुश हो गए."

"पति और घरवालों को लगता था कि मैं मुफ़्त में ही काम करतीं हूँ. नोटबंदी के बाद साग-सब्ज़ी मेरी कमाई से आई."

"दो दिन तक पैसे नहीं थे. तीसरे दिन रात को एटीएम लाइन में लगने वाली मैं अकेली महिला थी. लेकिन अपनी कारीगरों को पैसे की कमी नहीं होने दी."

ये कहना है उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले की कुछ महिलाओं का.

देवरिया शहर से करीब दस किलोमीटर दूर सरौली गाँव के मुख्य चौराहे पर किराए की तीन दुकानें हैं.

इन दुकानों के बाहर शटर नहीं ईटें खड़ी की गई हैं और उस पर कपड़े की चादर है जिससे दुकान के भीतर काम करने वालों की शक्ल न दिखे.

दुकान के भीतर करीब 12 महिलाएं रंग-बिरंगे धागों से 'मैकरेमे' या आभूषण बनाने में जुटी हुईं हैं.

किसी के बगल में उनका बच्चा खेल रहा है और किसी के बगल में उनकी सास झपकी ले रही है.

औरतों पर कैसी पड़ी नोटबंदी?

नोटबंदी से इनके हुए वारे-न्यारे

नोटबंदी से ख़ुशी

इन सभी महिलाओं को नोटबंदी का अफ़सोस कम और ख़ुशी ज़्यादा है.

सभी दिहाड़ी पर ये काम या तो अपने घर से करतीं हैं या इस केंद्र पर आकर.

Image caption पूजा शाही

देवरिया डिज़ाइन नामक इस पहल को शुरू करने वाली 26 वर्षीय पूजा शाही हैं.

उन्होंने बताया, "इंटरमीडियट की पढ़ाई के बाद जब मैंने ये काम सीखने की मंशा ज़ाहिर की, घर वालों ने बहुत विरोध किया, भाइयों ने मारा-पीटा भी. सिर्फ़ मेरे पिता ने समर्थन किया. झगड़े में एक बार पिताजी का पैर भी टूट गया. मैंने भी ठान ली थी कि इस कला को सीखना है और आगे बढ़ाना है".

पूर्वी उत्तर प्रदेश के इन इलाकों में इस तरह की कढ़ाई का काम काफ़ी महिलाओं को आता है लेकिन आम तौर पर वे घरों से बाहर नहीं निकलती हैं.

ज़ैनब इसी गाँव में अपने माँ-बाप के साथ रहतीं हैं और कुछ वर्षों से इस काम से जुड़ चुकी हैं.

ज़ैनब बताती हैं, "हम लोग पहले घर से ही काम करते थे. लेकिन नोटबंदी के बाद घर से निकल कर यही काम करने लगे. पैसा मिल रहा है तो घर में सब खुश हैं."

Image caption ज़ैनब

विदेश में भी पहुँच

देवरिया के इस गाँव की महिलाओं के हाथों से बनाए जा रहे धागों के आभूषण भारत ही नहीं विदेशों में भी बिक रहे हैं.

शुरुआत में इन महिलाओं की मदद के लिए कुछ गैर-सरकारी संगठन आगे आए थे, लेकिन कभी भी सरकारी मदद न मिलने की मायूसी है.

सरोज भी यहाँ काम करने आती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनावों में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं.

Image caption सरोज कहती हैं, ''दो दिन तक पैसे नहीं थे. तीसरे दिन रात को एटीएम लाइन में लगने वाली मैं अकेली महिला थी. लेकिन अपनी कारीगरों को पैसे की कमी नहीं होने दी". .''

उन्होंने कहा, "जब से कमाना शुरू किया है सबका नज़रिया हमारे प्रति बदल गया है. लेकिन मुझे वोट देने में कोई रुचि नहीं क्योंकि मैं अपना काम करके कुछ कमा लूंगी. उन लोगों ने मेरे लिए क्या किया है."

कुछ इसी तरह की दास्ताँ यहाँ पर हर महिला की है.

किसी ने घर वालों से छुपते-छिपाते काम शुरू किया था और किसी ने ये कह कर कि किसी पड़ोसी को सहयोग भर दे रहीं हैं बस.

लेकिन इन महिलाओं ने ये ज़रूर ठान रखा है कि आगे चल कर कमाती ज़रूर रहेंगी.

अब न सिर्फ़ इन्हें इनके हुनर के पैसे मिलते हैं बल्कि घरवालों और समाज से प्रशंसा भी उससे ज़्यादा मिल रही है.

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