भागी हुई लड़कियां: 'वो न प्यार के लिए भागी, न शादी से, लेकिन भागी'

  • 17 फरवरी 2017
भागी हुई लड़कियां इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption सांकेतिक तस्वीर

'अगर एक लड़की भागती है तो हमेशा जरूरी नहीं है कि कोई लड़का भी भागा होगा.'

ये कहानी ऐसी ही एक लड़की की है, जो किसी लड़के से इश्क़ की वजह से नहीं भागी. वो भागी, क्योंकि उसे अपने मन की पढ़ाई करनी थी.

बीबीसी हिंदी की सिरीज़ 'भागी हुई लड़कियां' में आप पहली किस्त में विभावरी और दूसरी किस्त में शिवानी की कहानी पढ़ चुके हैं.

ये दोनों लड़कियां प्यार में घर से निकली थीं. आज तीसरी किस्त में उस लड़की की कहानी, जिसके घर से भागने की वजह प्यार नहीं था.

इमेज कॉपीरइट Geeta Yatharth
Image caption गीता यथार्थ

गीता यथार्थ

गांव के स्कूल में हमेशा पहली या दूसरी पोज़िशन आती थी. स्कूल के टीचर पापा से मिलने पर तारीफ़ करना नहीं भूलते थे.

पापा खुशी से फूले न समाते. वे मुझे मेडिकल की पढ़ाई कराना चाहते थे. उन्हें लगता कि बेटा एमबीबीएस कर रहा है तो बेटी भी कर लेगी.

गांव में पांचवीं तक की पढ़ाई के बाद बाद दूसरे गांव पढ़ने जाना पड़ता था. दसवीं क्लास में अच्छे नंबर आए तो पापा की उम्मीद बढ़ गई. पापा ने सोच लिया कि अब लड़का और लड़की दोनों ही डॉक्टर बनेंगे.

गांव के स्कूल में 11वीं में मेडिकल में जाने के लिए ज़रूरी सब्जेक्ट नहीं थे. इसलिए पापा ने मेरा एडमिशन गुड़गांव के एक प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवा दिया गया. फ़ीस भरना पापा के लिए मुश्किल था. पापा ने घर के खर्चे में कटौती कर स्कूल की फ़ीस चुकाई.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption सांकेतिक तस्वीर

शहर के स्कूल में आकर मालूम चला कि दुनिया कितनी बड़ी है. सब फ़र्राटेदार इंग्लिश में बात करते.

ऐसी इंग्लिश हमारे स्कूल के इंग्लिश टीचर भी न बोल पाते थे. लड़कियों की स्कूल ड्रेस की छोटी स्कर्ट सपने जैसा लगता. और इन सबसे उलट मैं टॉम बॉय टाइप की लड़की, लंबी स्कर्ट, बेढंगी शर्ट, हिंदी बोलने वाली सबके मज़ाक का केंद्र बन गई.

गांव वाली का टैग लग गया.

इंग्लिश का ट्यूशन लगाकर सब ठीक करने ही वाली थी कि बायोलॉजी की प्रैक्टिकल क्लास आ गई.

कमरे में एक छिपकली को देखकर घर सिर पर उठाने वाली लड़की चूहे, छिपकली काटने लगी. इसी डर में बुखार हो गया. कई दिन स्कूल नहीं गई.

बस फिर असली बीमारी से बहाने वाली बीमारी पर आ गई. स्कूल जाना एकदम बंद. ऊपर से फीस लगातार जाती रही. इतनी महंगी फीस की वजह से पापा का दबाव पढ़ाई के लिए बढ़ने लगा.

हारकर एक साल बर्बाद करके गांव के स्कूल में नॉन मेडिकल सब्जेक्ट वाले कोर्स में एडमिशन ले लिया. रिश्तेदार और पड़ोसी पापा को समझाते 10वीं कर ली, ब्याह कर दो. बेटी पर इतना पैसा ख़र्च करना ठीक नहीं. पापा किसी की न सुनते, बस पढ़ लो- कुछ कर लो, यही धुन थी. फिर पापा ने बीएससी में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी कैंपस में एडमिशन दिलवा दिया.

मैं हॉस्टल चली गई. पहली बार घर से बाहर गई. पहली बार सांभर खाया. देर रात तक लड़कियों के साथ बातें की. पहली बार लड़कों की और अपनी पसंद, प्यार के बारे में बातें की.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption सांकेतिक तस्वीर

यह सब एक नई दुनिया की सैर सा था. खूब आज़ादी मिली, खूब जिया उन दिनों को. बस पढ़ाई के अलावा सब किया. गांव की लड़की का शहरीकरण हो गया.

कुछ ही महीनों बाद घर जाकर बोला, ''पापा बीएससी नहीं करनी. मेरा मन नहीं करता. मुझे पत्रकारिता की पढ़ाई करनी है.

पापा ने पूछा, ''उससे तो पत्रकार बनते हैं न, अख़बारों में नौकरी लगती है. जगह जगह घूमना भी पड़ेगा. मतलब बहुत सारी जगह अकेले जाना पड़ेगा. नहीं, इस बार तुम्हारी नहीं चलेगी.''

पापा ने मम्मी, दीदी-जीजा, अंकल को बताया, ''इसका दिमाग़ ख़राब हो गया. पहले मेडिकल की पढ़ाई छोड़ी, अब बीएससी छोड़नी है. या तो यहीं पढ़ो या घर बैठो. शादी के लिए लड़का देख रहे हैं. बहुत हुआ. तुम्हें नहीं पढ़ना.''

फिर लड़का खोजा जाने लगा. घर में सबने मुझसे बात करनी बंद कर दी. उधर हर रोज़ मैं सोचती- कैसे भागूं यहां से. क्या करूं. कहीं चली गई तो पैसे कहां से आएंगे. तरह-तरह के सवाल. फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता का फॉर्म भर दिया. लेकिन इंटरव्यू में क्वालिफ़ाई नहीं कर पाई.

मैं पत्रकारिता कर रहे एक लड़के को जानती थी. कुरुक्षेत्र जाते हुए कश्मीरी गेट के बस स्टैंड पर उससे मुलाकात हुई थी. उसका नाम याद आया. उससे मिलने का तरीका ढूंढने लगी.

उससे मुलाकात मेरी लाइफ़ का एक टर्निंग पॉइंट था. वो लड़का कानपुर से था. नोएडा के किसी प्राइवेट इंस्टीट्यूट से पत्रकारिता कर रहा था. उससे किसी तरह संपर्क किया, सारी बात बताई. इतनी अक्ल नहीं थी कि किसी अनजान को ऐसे सीधे कुछ बताना चाहिए या नहीं. उस लड़के ने बोला- चिंता मत करो, मैं तुम्हारी मदद करुंगा.

मैंने उस लड़के को पड़ोस की चाची के घर का लैंडलाइन नंबर दिया. अपने घर के लैंडलाइन पर अगर फ़ोन आ जाता तो घरवाले फ़ौरन शादी फ़िक्स कर देते. फिर एक रोज़ उसकी कॉल आई और वो बोला, ''खुशखबरी है. फरीदाबाद कॉलेज में पहली बार पत्रकारिता कोर्स आया है. सरकारी है तो फीस कम होगी. लगता है भगवान ने तेरी सुन ली. बस चार हज़ार रुपए का जुगाड़ कर लो.''

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption सांकेतिक तस्वीर

मेरे पास इतने पैसे नहीं थे. उस लड़के ने अपने पैसे से मेरा फॉर्म भरा. मैं बस साइन करने के लिए फ़रीदाबाद गई थी. इस बीच दीदी जीजा को लगातार मनाती रही.

एक रोज़ हिम्मत हारकर मैं घर से निकल पड़ी.

हिम्मत करके मैं उस लड़के के पास पहुंच गई. ये दूसरी बार था, जब मैं गुड़गांव से फरीदाबाद गई थी. भला हो कि उस लड़के ने बातों-बातों में अपना पता मुझे बताया हुआ था. भगवान से दुआ करते हुए आगे बढ़ी. वो लड़का अपने रूममेट के साथ फ्लैट की सीढ़ियों पर मुझे मिला तो बस चौंक ही गया.

वो बोला, ''तुम यहां क्या कर रही हो? कब आई? कैसे-किसके साथ आ?'

जवाब में मैंने कहा, ''मुझे शादी नहीं करनी. बस पढ़ना है. मेरी मदद कर लो प्लीज. मैं घर से भागकर आई हूं. अब मुझे घर नहीं जाना है. यहीं तुम्हारे कमरे के कोने में सो जाऊंगी. घर का सारा काम कर दूंगी.

वो लड़का मुझे समझाने लगा, ''मैं तुम्हारे पापा से बात करुंगा. सब ग़लत समझेंगे. तुम घर लौट जाओ.''

मेरी ज़िद देखते हुए उसने दीदी का फ़ोन नंबर लेकर उन्हें मेरे सही सलामत रहने की बात और अपना पता बताया. दीदी, जीजा मुझे लेने पहुंच गए.

इसके कुछ वक्त बाद मैं दीदी के पास ही रही.

दीदी मेरी हमराज़ थीं. पापा के डर से दो साल घर नहीं गई. धीरे-धीरे चीज़ें नॉर्मल होने लगीं. कॉलेज की फीस के लिए ब्यूटी पार्लर में काम करना शुरू किया. फिर पीजी में रहने लगी, ट्यूशन पढ़ाया.

इस बीच गांव में पड़ोसी कहने लगे- लड़की भाग गई है.

कोई कहता किसी से शादी कर ली. कोई कुछ कहता- कोई कुछ. आईआईएमसी (भारतीय जनसंचार संस्थान) से पढ़ाई, फिर नेट करने और फिर नौकरी लगने तक, मेरे भागने के चर्चे गांव में रहे. और मेरी शादी होने तक मेरी हवा-हवाई शादी के चर्चे भी.

गांवों की लड़कियों की राह आसान नहीं होती है. इतने साल मैंने लड़ाई की, अपने छोटे-छोटे सपनों और पसंद की पढ़ाई के लिए. जब मैं घर में अंदरुनी तौर पर लड़ रही थी तो मेरे पेरेंट्स समाज से लड़ रहे थे.

तमाम परेशानियों के बावज़ूद आज ज़िंदगी खूबसूरत लगती है, क्योंकि ये ज़िंदगी अपने हाथों बनाई हुई है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे