ELECTION SPECIAL: 'तुम्हारे आज़मगढ़ में इतने माफ़िया और टेरेरिस्ट क्यों रहते हैं?'

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आजमगढ़ की पहचान 'अंडरवर्ल्ड' और 'टेरर फ़ैक्ट्री' जैसे शब्दों से की जाने लगी है

कुछ आंखें शक की नज़रों से घूरेंगी, कुछ अपने मोबाइल फ़ोन में ख़बरें चेक करने लगेंगी और कुछ आपकी तरफ़ खिंची चली आएंगी.

जो आपसे बात करेंगी. वे इस सवाल का जवाब सबसे तेज़ी और बुलंदी से देंगी, "क्या पिछले कुछ सालों में आज़मगढ़ पर कोई धब्बा लगा है?"

एक अधेड़ महिला शबाना परवीन ने पहले ही मेरी जिज्ञासा शांत कर दी, "कह कर तो देखिए कि किसी सूअर या गाय को सड़क से भगा दे. कुछ लोग इस पर राजनीति शुरू कर भौकाल मचा देंगे."

पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख ज़िलों में आजमगढ़ का नाम काफी ऊपर है. भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर शिक्षा, राजनीति या संस्कृति में इस इलाके की भूमिका को शायद ही कोई नज़रअंदाज़ कर सके.

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'टेरर फ़ैक्ट्री'

मगर पिछले डेढ़ दशक से आजमगढ़ की पहचान 'अंडरवर्ल्ड' और 'टेरर फ़ैक्ट्री' जैसे शब्दों से की जाने लगी. आजमगढ़ ज़िले के कुछ लोगों के 'मुंबई अंडरवर्ल्ड' में शामिल होने पर फिल्में बन चुकी हैं.

पिछले एक दशक में भारत में हुए कई संदिग्ध चरमपंथी हमलों में शामिल होने के आरोप में आज़मगढ़ ज़िले के कई युवा जेल में हैं, कई लापता हैं, कुछ को सज़ा हुई है और कुछ बरी भी हो चुके हैं.

इस ज़िले के कई युवाओं पर 'इंडियन मुजाहिदीन' नामक चरमपंथी संगठन से जुड़े होने के आरोप 2008 में दिल्ली के बटला हाउस एनकाउंटर के बाद से ख़बरों में लगते रहे हैं.

लेकिन शहर में किसी से भी बात कर लीजिए, ज़्यादातर शहर पर 'ज़बरदस्ती थोपे गए इस धब्बे' को ग़लत और बेबुनियाद बताते हैं.

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'स्वार्थ की राजनीति'

अदिति दुबे शहर के नामचीन शिबली कॉलेज में पढ़ती हैं. उन्होंने बताया, "कहीं भी बाहर जाते हैं तो लोग पूछते हैं तुम्हारे आज़मगढ़ में इतने माफ़िया और टेरेरिस्ट क्यों रहते हैं. जवाब देना मुश्किल हो जाता है कि यहाँ ऐसा कुछ है ही नहीं. लोग हमें नाली के कीड़े की तरह देखते हैं."

अदिति इस बात के लेकर ज़रूर आश्वस्त हैं कि इस तरह का 'दुष्प्रचार' सिर्फ़ 'स्वार्थ की राजनीति' या 'मौके को भुनाने' के लिए ही होता है. अदिति के साथ ही कॉलेज में पढ़ने वाली पड़ोसी ज़ायरा इस बात को मानती हैं कि 'समुदायों के बीच थोड़ी खटास तो आई है.'

उन्होंने कहा, "सभी पार्टियां बस चुनाव में ये कहते पहुंच जाती हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं और दूसरा नहीं. कोई हिंदू वोट बैंक की बात करता है तो कोई मुस्लिम वोट बैंक की. माहौल ख़राब कर के रख दिया है शहर का. न यहां आतंकवादी हैं और न ही डॉन."

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'गलत ब्रैंडिंग'

शिबली कॉलेज वो जगह है, जहां भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और ज़ाकिर हुसैन जैसे लोग आकर रहते थे और राजनीतिक-सामाजिक चर्चाएं करते थे.

उत्तर प्रदेश में एक ज़माने में शिक्षा के चार बड़े केंद्र होते थे: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी और शिबली कॉलेज.

शिबली कॉलेज के स्टॉफ और स्टूडेंट्स को लगता है कि आज़मगढ़ शहर की 'गलत ब्रैंडिंग' होने का नुकसान शिक्षा और कॉलेजों पर भी हुआ है. आज़मगढ़ में विकास के नाम पर कुछ एक प्राइवेट हॉस्पिटल, कुछ रेस्त्रां और मोबाइल फ़ोन की दुकानें भर दिखती हैं.

लोक सभा और विधान सभा मिला कर मैंने खुद पांच चुनाव कवर करने पर पाया है कि शहर जस का तस ही कहीं ठहर सा गया है. न तो सड़कें बहुत बेहतर हुईं हैं और न ही बिजली-पानी की स्थिति. कूड़े के ढेर बढ़ रहे हैं और नालियों की चौड़ाई भी.

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'गुनाह 0.01 फीसदी, कलंक भुगतें लाखों शांतिप्रिय लोग'

शहर के लोग इस बात को लेकर थोड़े चिंतिंत ज़रूर दिखते हैं कि भले ही तमाम सम्प्रदाय के लोग एक साथ मिल कर रहते हों, लेकिन राजनीति के चलते दूरियां बढ़ीं हैं. आज़मगढ़ निवासी प्रोफ़ेसर मोहम्मद ताहिर को लगता है कि पिछले सालों की घटनाओं के बाद लोगों ने बच्चों को बाहर पढ़ने भेजना बंद कर दिया है.

उनके मुताबिक़, "बटला हाउस एनकाउंटर में आजमगढ़ के लड़कों का नाम आने से लेकर मुंबई अंडरवर्ल्ड के कुछ शार्प शूटरों के नाम तक, बदनामी सिर्फ़ शहर की हुई है. जबकि ऐसे लोगों का गुनाह अगर साबित भी होता है तो भी 0.01% से कम होगा. इसका कलंक शहर या इसके लाखों शांतिप्रिय लोग क्यों भुगतें?"

क़मर कमाल नामक छात्र क़ानून की पढाई कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि आजमगढ़ की 'टेरर ब्रैंडिंग' से लगभग सभी राजनीतिक दलों को फ़ायदा पहुंचता है. बस अड्डे पर शाम की बसों का तांता लगा है. कोई बनारस, कोई मऊ, कोई गोरखपुर और कुछ लखनऊ जाने को तैयार हैं.

बाहर सफ़ेद मटर की चाट और आलू की टिक्की बेच रहे सुरेंद्र यादव के मुताबिक "किसी को क्या फ़र्क पड़ता है कि बस अड्डे का शौचालय शायद हफ़्ते में दो ही दिन साफ़ होता है."

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