मुखौटे सच्चाई भी बयां करते हैं...

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Image caption कन्नड़ नाटक 'अक्षयम्बरा'

दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सालाना जलसे 'भारत रंग महोत्सव' ने इस साल अपने 19वें वर्ष में प्रवेश कर लिया.

इस साल के भारत रंग महोत्सव की थीम है 'यह रंगमंच किसका है?'.

पेंटिंग ने बदल दी ज़िंदगी

जो भरते हैं मिट्टी में कला के रंग

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Image caption तमिल नाटक 'द्रौपदी वास्थिरबारणं'

21 दिन तक चलने वाले इस नाट्य समारोह में इस साल 94 नाट्य प्रस्तुतियां होंगी. इनमें 14 विदेशी नाटक शामिल हैं. इस बार 12 देश हिस्सा ले रहे हैं.

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Image caption बंगाली नाटक 'मानसा मंगल'

भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को नाटक का सबसे प्राचीन ग्रन्थ माना जाता है. हिंदी में नाटकों का प्रारंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से माना जाता है.

नाटक को दृश्य काव्य का एक भेद कहा जाता है. इसमें मुखौटों की पुराने समय से अहम भूमिका रही है.

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Image caption बंगाली नाटक 'इला गुरहाईशा'

पुराने समय में नाटक मनोरंजन का एक साधन हुआ करता था. लोकभाषाओं में रासलीला, रामलीला और नौटंकी के रूप में नाटक किए जाते थे, जो अब तक प्रचलन में हैं.

इन नाट्य उत्सवों में रावण, कुम्भकरण, गणेश, हनुमान, जटायु , पूतना, शूर्पणखा, जामवंत जैसे पात्रों का परिचय उनके मुखौटों से ही होता था.

छउ नृत्य के मास्टर

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Image caption तमिल नाटक 'द्रौपदी वास्थिरबारणं'

प्राचीन नाटकों में पात्रों के परिचय के लिए विशेष मुखौटों का प्रयोग किया जाता था. वैष्णव संत शंकर देव और माधव देव के लिखे नाटकों में खासकर जानवरों के चरित्र का अभिनय करने के लिए विशेष मुखौटों का इस्तेमाल किया जाता था.

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Image caption बंगाली नाटक 'अश्वत्थामा - द वॉर मशीन'

धीरे-धीरे हिंदी नाटकों में मुखौटों का इस्तेमाल कम होने लगा, पर आज भी पौराणिक पात्रों के लिए इनका प्रयोग किया जाता है.

विदेशी नाटकों और मूक नाटकों में भी मुखौटों का ख़ास स्थान है. मुखौटे लोक रंगमंच में भी आज नाटक का अभिन्न अंग हैं.

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Image caption हिंदी नाटक 'पांचाली की शपथ'

अज्ञेय ने अपनी पुस्तक 'अज्ञेय रचना सागर' में लिखा है, ''मुखौटे केवल धोखा देने के लिए ही नहीं बल्कि सच्चाई को प्रस्तुत करने के लिए भी लगाए जाते हैं. साधारण जीवन में मुखौटा फ़रेब है, लेकिन नाटक में वही मुखौटा हमें यथार्थ में लौटा लाने में सहायक हो सकता है.''

लोक जीवन को दिखाती पिथौरा चित्रकला

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Image caption हिंदी नाटक 'किस्से सूझ-बूझ के '

मुखौटों के इस्तेमाल की एक ख़ास बात ये भी है की एक कलाकार कई मुखौटों का प्रयोग कर मंच पर एक समय पर अलग-अलग किरदार निभा सकता है.

कुछ ऐसा ही श्रीलंका के नाटक 'लव एंड लाइफ़' के कलाकारों ने किया. एक नाटक में एक कलाकार मुखौटों की सहायता से अलग-अलग किरदारों को जीवंत कर दर्शकों को रोमांचित कर देता है.

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Image caption श्रीलंका का नाटक 'लव एंड लाइफ़'

इस नाटक के निर्देशक एसआई साम्राक्कोडी कहते हैं, "ये मेरा पहला प्रयोगवादी नाटक है जिसमें मैंने मुखौटों का इस्तेमाल किया है. 15 चरित्रों के लिए 15 मुखौटे रखे गए हैं, जिन्हें तीन अभिनेता मंच पर उतारते हैं क्योंकि नाटक के तीन अभिनेता 15 किरदार निभा रहे हैं तो वो 35 बार अपने मुखौटे बदलते हैं."

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Image caption बंगाली नाटक 'अश्वत्थामा - द वॉर मशीन'

इसी तरह बांग्ला नाटक 'अश्वत्थामा : द वॉर मशीन' में भी नाटककार सुमन साहा ने मुखौटों का प्रयोग कर अश्वत्थामा की मनोदशा दिखाने की कोशिश की है.

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