70 ज़िंदगी बचाते हुए आंखें खोने वाला जांबाज़

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
कुलदीप को खुशी है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में अंधेरा लाकर भी 70 लोगों की ज़िंदगी बचाई.

कुलदीप सिंह अपनी आँखों की रोशनी खोने के बाद लाचारगी भरी ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. जीवन गुज़ारने के लिए वो पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर हैं.

कुलदीप सिंह रियल लाइफ़ हीरो हैं. उन्होंने 29 अक्तूबर, 2005 के सिलसिलेवार बम धमाकों में अपनी जान पर खेलकर कई लोगों की जानें बचाई थी.

गुरुवार को दिल्ली की एक अदालत ने सबूतों के अभाव में धमाकों के अभियुक्तों को बरी कर दिया. कुलदीप सिंह अदालत के फ़ैसले को चैलेंज नहीं करते लेकिन उस पर मायूस ज़रूर हैं.

वो कहते हैं, "अदालत सबूतों के आधार पर फैसला करती है."

'ये बरी हो गए तो धमाके करने वाले कौन थे?'

दिल्ली में हाल के वर्षों के बम धमाके

लेकिन उनका एक सवाल ज़रूर है, "इंसाफ़ तो हमें मिला नहीं. बम रखने वाला कोई तो होगा?" इस सवाल का जवाब दिल्ली पुलिस से मांगा जा रहा है. पुलिस का कहना है कि इस फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

कुलदीप सिंह को इंसाफ़ नहीं मिलने का अफ़सोस है लेकिन उन्हें गर्व है कि उन्होंने कई लोगों की जान बचाई.

इमेज कॉपीरइट AP
Image caption अक्टूबर 2005 बम धमाकों में एक धमाका पहाड़गंज में भी हुआ था.

जब वो अपनी आँखों से देख सकते थे तब वो दिल्ली की डीटीसी बस के ड्राइवर थे. 29 अक्तूबर, 2005 को वो अपनी बस में 70 से अधिक यात्रियों को लेकर कालकाजी से गुज़र रहे थे.

एक सीट के नीचे एक लावारिस बैग पड़ा था. खोलने पर तीन रंगों की तारें नज़र आईं जो एक टाइमर से जुड़ी थीं.

वो कहते हैं, "मैंने तारों को काटना चाहा ठीक उसी तरह से जैसा हिंदी फिल्मों में दिखाते हैं. लेकिन मैंने यात्रियों का ध्यान रखते हुए उसे बस के बाहर एक पेड़ के नीचे रख दिया."

धमाका जो छोड़ गया भविष्य का सूनापन

जैसे ही वो बैग रख कर बस में वापस आने के लिए मुड़े, एक ज़ोरदार धमाका हुआ. वो कहते हैं, "मैं बेहोश हो गया. जब होश आया तो अस्पताल में था."

ये धमाका दिल्ली में सिलसिलेवार बम धमाकों का एक हिस्सा था. कुलदीप ने 70 यात्रियों की जान तो बचाई लेकिन अपनी आँखों की रोशनी खो दी,

"मुझे जब होश आया तब पता चल गया कि मेरी आँखों की रोशनी चली गई है."

Image caption कुलदीप सिंह दायां हाथ अब बेकार हो गया है

काफी सालों तक इलाज चला लेकिन रोशनी वापस नहीं लौटी. कुलदीप अपनी आँखों पर काला चश्मा लगाते हैं. उनके दाएं हाथ की मुठ्ठी बंद नहीं होती क्योंकि वो धमाके में बुरी तरह से जल गई थी. अब वो हाथ बेकार है.

कुलदीप सिंह की इकलौती संतान 12 साल का एक बेटा है. "वो हादसे के डेढ़ महीने बाद पैदा हुआ. इसका चेहरा अब तक देख नहीं पाया हूँ."

उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उनकी आँखों की रोशनी वापस आएगी और वो अपने बेटे का चेहरा देख सकेंगे.

"मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया है कि अमरीका में एक रिसर्च चल रहा है. कोई नया आविष्कार हो सकता है और मेरी आँखों की रोशनी वापस हो सकती है."

कुलदीप कहते हैं, "उम्मीद पर दुनिया क़ायम है. अगर रोशनी नहीं भी आई तो मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने 70-80 लोगों की जानें बचाईं."

कुलदीप 45 वर्ष के हैं लेकिन अपनी उम्र से ज़्यादा के लगते हैं. अब उनकी सेहत ठीक नहीं रहती. वो मधुमेह के मरीज़ भी हैं.

Image caption कुलदीप सिंह को उम्मीद है कि एक दिन उनकी आंखों की रोशनी वापस लौटेगी और वो अपने बेटे का चेहरा देख पाएंगे.

डीटीसी की नौकरी तो है लेकिन ऑफ़िस जाकर बैठे रहते हैं क्योंकि आँखों की रोशनी जाने के कारण कोई काम नहीं कर सकते.

उनका सब से बड़ा सहारा उनकी पत्नी हैं. वो कहते हैं, "बेटा छोटा है लेकिन मेरी कहानी सुनकर मुझ पर गर्व करता है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे