नज़रिया: जनरल रावत की चेतावनी से शांत हो जाएंगे कश्मीरी नौजवान?

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कश्मीरी पत्थरबाज़ों को थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत की कड़ी चेतावनी में एक मासूमियत भी छिपी थी जिस पर बहुत लोगों का ध्यान नहीं गया.

उन्होंने यूँ तो सख़्त लहजे में कहा कि अगर कश्मीर के लोग आतंकवादियों को मदद देना बंद नहीं करेंगे तो उन्हें भी आतंकवादियों के कारकुन मानते हुए सख़्त कार्रवाई की जाएगी.

इसके लिए उनकी आलोचना भी की जा रही है. मगर इसी बयान में उन्होंने आगे कहा, "हम पाते हैं कि किन्हीं कारणों से स्थानीय लोग सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों का समर्थन नहीं करते."

ये एक ऐसा मासूम बयान है जिससे पता चलता है कि कश्मीर में हथियारबंद अलगाववादी आंदोलन के तीस साल बाद भी भारतीय सत्ता-प्रतिष्ठान अभी ये पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि आख़िर वो क्या कारण हैं जिनसे कश्मीरी लोग सेना और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों का समर्थन नहीं कर पाते.

शायद जनरल रावत कश्मीरियों से ये पवित्र उम्मीद लगाए हुए हैं कि वो फ़ौज की नेकनीयती को समझेंगे और इस बात पर भरोसा करने लगेंगे कि कश्मीर घाटी में फ़ौज की तैनाती उनके भले के लिए ही है. और जिस दिन कश्मीरी इस सच्चे और नेक इरादे को समझ लेंगे उस दिन उनके हाथों में पत्थर की बजाए गुलदस्ते होंगे और वो बढ़-चढ़कर सैनिकों का स्वागत करने लगेंगे.

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ज़मीनी हक़ीक़त अलग

मगर जनरल रावत भी जानते हैं कि ज़मीनी हक़ीक़त ये नहीं है. ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि सुरक्षा बलों या फ़ौज के जवान घाटी में जहाँ भी तैनात होते हैं उन्हें स्थानीय लोगों का अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ता है.

वर्दी पहने इंसान को कश्मीर में जितनी ज़लालत का सामना करना पड़ता है वो किसी को भी जीवन भर के लिए क्रोधित, असंतुष्ट और मानसिक तौर पर अस्थिर बनाने के लिए काफ़ी है.

एक तरफ़ हथियारबंद अलगाववादी अपनी छापामार कार्रवाइयों में फ़ौज और सुरक्षा बलों को लगातार लहूलुहान करते जा रहे हों और दूसरी तरफ़ हज़ारों की तादाद में लोग अपने घरों-मोहल्लों से निकलकर उन पर पत्थर बरसा रहे हों, तो जनरल बिपिन रावत का ग़ुस्सा समझ में आता है. पर दुनिया भर की फ़ौजों में कहा जाता है कि भले ही सेनापति के क़दमों तले धरती डाँवाडोल हो रही हो मगर उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती.

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जनरल रावत ने कहा, "स्थानीय जनता का जो हिस्सा हमारे ऑपरेशनों और मुठभेड़ों के दौरान अड़चनें डालता है और हमारा समर्थन नहीं करता उसे आतंकवादियों के खुले कारकुन माना जाएगा और उनसे उसी तरह निपटा जाएगा…. वो आज भले ही बच जाएँ, कल हम उन्हें धर लेंगे."

पर ये कौन लोग हैं जिन्हें धर लेने की बात जनरल रावत कह रहे हैं? नौ से पंद्रह बरस के लड़के जो बात बेबात पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आते हैं और वर्दी वाले सिपाहियों से गली-गली में जंग करते हैं, डाउन टाउन श्रीनगर में सैकड़ों की तादाद में घरों से बाहर निकल कर आज़ादी के नारे लगाने वाली औरतें जिन्हें न ख़ुद की मौत का डर होता है और न इस बात का ख़ौफ़ कि उनके परिवार वाले मारे जा सकते हैं या फिर गाँव-गाँव के वो लोग जो बुरहान वानी जैसे चरमपंथी के जनाज़े में शिरकत करने के लिए लाखों की तादाद में उमड़ पड़ते हैं?

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चेतावनी का क्या असर?

हिंदुस्तान को पराया मानने वाले इन लोगों पर जनरल बिपिन रावत की चेतावनी का क्या असर होगा? क्या अब कश्मीरी लोग अपने घरों में बात करने लगेंगे कि जनरल साहब हमारे ही भले की बात कर रहे हैं इसलिए पथराव बंद होना चाहिए? क्या वो भारी हथियारों से लैस अलगाववादी चरमपंथियों को अपने घरों में छिपाना बंद कर देंगे और उनकी जगह फ़ौजियों के लिए अपनी बैठक का दरवाज़ा खोल देंगे?

या फिर इस चेतावनी के बाद वो सब लोग घबरा कर शांत हो जाएंगे जिन्होंने पिछले तीस साल में हिंसा को हर पल अपने दरवाज़े दस्तक देते या फिर दरवाज़ा तोड़कर घर में घुस आते देखा और महसूस किया है?

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दरअसल दो वरिष्ठ फ़ौजी अफ़सरों को पछाड़कर थलसेनाध्यक्ष बनाए गए जनरल बिपिन रावत जिस सुर में बात कर रहे हैं वो मौजूदा केंद्र सरकार के सुर से घुलामिला है पर ये सुर शुरुआत से ही ग़लत लग गया था.

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नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद अब तक कई विवादास्पद मुद्दे सामने आए हैं पर केंद्र सरकार ने सबसे पहले कश्मीर को भारतीय संघ से जोड़े रखने वाली संविधान की धारा 370 को ख़त्म करने का विवादास्पद मुद्दा छेड़ा था जो बाद में उलटा पड़ गया. राम जेठमलानी जैसे क़ानून विशेषज्ञों के मुताबिक़ धारा 370 ही कश्मीर को भारत से जोड़े हुए है और अगर उसी को हटा दिया गया तो आख़िरी डोर भी कट जाएगी.

जेठमलानी का दावा है कि उनके समझाने के बाद ही भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार इस मामले पर पहले नरम पड़ी और फिर ख़ामोश हो गई.

इसके बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कश्मीर नाम की तलवार की धार पर चलने की कोशिश लगातार करते रहे हैं - एक ओर उन्हें सुरक्षा बलों का मनोबल ऊँचा रखना है तो दूसरी ओर कश्मीरी जनता में अलगाव की भावना को कम करना है.

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इसीलिए कभी वो कश्मीर में आई भयावह बाढ़ में तुरंत राहत मुहैया करवाने में सक्रिय दिलचस्पी लेते हैं और दूसरी ओर फ़ौजियों के साथ दिवाली मनाना भी नहीं भूलते. फिर भी आप कश्मीर घाटी चले जाइए तो आपको शायद ही नरेंद्र मोदी का कोई नामलेवा मिले.

वाजपेयी की याद क्यों?

पर क्या कारण है कि कश्मीरी लोग आज भी अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हैं. वहाँ के राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, प्रोफ़ेसर वग़ैरह वाजपेयी के एक मामूली वाक्य का बार बार ज़िक्र करते हैं कि 'कश्मीर के मसले का हल इंसानियत के दायरे में होना चाहिए?'

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क्या इसी तरह आम कश्मीरी लोग जनरल बिपिन रावत की चेतावनी को भी आत्मसात करते हुए अपना नज़रिया बदलेंगे? क्या वो कहेंगे कि जनरल रावत ने हमारे ज़ख़्मों पर मरहम लगाने की कोशिश की है?

जनरल रावत ग़लतफ़हमी में रहें तो रहें, कश्मीर से आ रही ख़बरों में कहा गया है कि इस बयान के बाद लोगों ने अपने हाथों में पत्थर की बजाए पेट्रोल बम ले लिए हैं.

आम तौर पर ऊँचे ओहदों पर पहुँचे फ़ौजी अफ़सरों से युद्ध कौशल के अलावा दर्शन, राजनीति, विचारधाराओं, इतिहास आदि की भी जानकारी रखने की उम्मीद की जाती है. इसलिए ये मान कर चलते हैं कि भारतीय थलसेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने स्पैनिश मूल के अमरीकी दार्शनिक जॉर्ज सांटियैना का नाम सुना होगा.

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जॉर्ज सांटियैना ने कहा था, "जो इतिहास को याद नहीं रखते हैं वो उसकी ग़लतियाँ दोहराने को अभिशप्त होते हैं."

ग़लत राजनीतिक पर चलकर ग़लत फ़ौजी फ़ैसले करने का इतिहास ढूँढने के लिए जनरल रावत को किसी लाइब्रेरी की धूल नहीं छाननी होगी. उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में ही किए गए उन ग़लत फ़ैसलों पर नज़र डालनी होगी जिनके कारण देशों का भूगोल बदल गया था.

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Image caption भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिलते बिपिन रावत

जनरल बिपिन रावत इतिहास को नहीं भूलेंगे तो उसे दोहराने को अभिशप्त भी नहीं होंगे.

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