'यादव कुनबे' के इन दिग्गजों का आज है इम्तिहान

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में 12 जिलों की 69 सीटों पर रविवार को मतदान होना है.

इस चरण में उन ज़िलों की विधानसभा सीटों पर भी चुनाव हो रहा है जिन्हें सत्ताधारी समाजवादी पार्टी का गढ़ कहा जाता है.

मुलायम सिंह यादव के परिवार के ज़्यादातर लोग इन्हीं जगहों से चुनाव लड़ते हैं.

हालांकि 2007 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर समाजवादी पार्टी की बहुजन समाज पार्टी से सीधी लड़ाई थी और बसपा की सीटें सपा से ज़्यादा थीं.

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भाजपा और कांग्रेस की स्थिति 2007 और 2012 के चुनावों में लगभग बराबर थी. यानी भाजपा के पास छह सीटें और कांग्रेस के पास दो सीटें.

Image caption शिवपाल और अखिलेश की तक़रार के बाद पार्टी दो फ़ाड़ होने की नौबत भी आ गई थी.

फ़िलहाल इटावा ज़िले की जसवंतनगर सीट से शिवपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि समाजवादी पार्टी के लिए पिछले दो चुनावों के प्रदर्शन दोहरा पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है, "पिछले चुनावों में सपा की सीधी लड़ाई बसपा से थी. अबकी बार सपा ने कांग्रेस से गठबंधन ज़रूर कर लिया है लेकिन भाजपा भी मुक़ाबले में खड़ी है."

इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, औरैया जैसे समाजवादी पार्टी के प्रभाव वाले ज़िलों के अलावा राजधानी लखनऊ और कानपुर में भी आज ही मतदान हो रहा है. लखनऊ शहर की दो सीटों से मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोग लड़ रहे हैं.

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Image caption यादव परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव, इनका मुकाबला भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से है.

लखनऊ कैंट से मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव का मुक़ाबला कांग्रेस छोड़कर भाजपा से चुनाव लड़ रहीं मौजूदा विधायक रीता बहुगुणा जोशी से है.

सरोजनी नगर से मुलायम सिंह के भतीजे अनुराग यादव चुनावी मैदान में हैं. उनके मुक़ाबले भाजपा की महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष स्वाति सिंह हैं.

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Image caption सरोजनी नगर से स्वाति सिंह का मुकाबला मुलायम सिंह के भतीजे अनुराग यादव से है.

इसके अलावा कानपुर और उन्नाव में भाजपा के दो वरिष्ठ नेताओं मुरली मनोहर जोशी और साक्षी महाराज की राजनीतिक ताक़त का भी इम्तिहान होना है क्योंकि ये लोग यहीं से सांसद हैं.

कानपुर के पत्रकार प्रवीण मोहता कहते हैं, "मुरली मनोहर जोशी के लोगों को भाजपा ने टिकट भी नहीं दिया है और जोशी एक भी दिन किसी का प्रचार करने नहीं गए. यही नहीं, पार्टी ने भी उनको कोई तवज्जो नहीं दी. यहां तक कि कन्नौज की सभा में उन्हें बुलाया तक नहीं गया जबकि पास की कानपुर सीट से वो सांसद हैं."

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जानकारों का कहना है कि इस चरण का मतदान काफ़ी अहम है क्योंकि ये आने वाले अन्य चरणों पर भी अपना असर छोड़ेगा.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के परिवार के अलावा कई मंत्रियों के सामने भी अपनी सीट बचाने की चुनौती है.

इनमें लखनऊ से अभिषेक मिश्र, रविदास मेहरोत्रा, शारदा प्रताप शुक्ल, बाराबंकी से अरविंद सिंह गोप और हरदोई से नितिन अग्रवाल शामिल हैं.

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दिलचस्प बात ये भी है कि कई मौजूदा विधायक और मंत्री दलबदल कर चुके हैं तो कुछ को अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिला है जिससे ये या तो निर्दलीय लड़ रहे हैं या फिर किसी अन्य पार्टी के बैनर तले.

ऐसे में मुक़ाबला और भी रोचक हो गया है. मसलन मंत्री शारदा प्रताप शुक्ल को जब समाजवादी पार्टी ने सरोजनी नगर से टिकट नहीं दिया तो वो उसी सीट से राष्ट्रीय लोकदल पार्टी के टिकट पर लड़ रहे हैं.

यूं तो चुनाव में जीत की उम्मीद और कोशिश हर पार्टी करती है लेकिन सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के सामने न सिर्फ़ अपनी सीटों को बचाने की बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की राजनीतिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा क़ायम रखने की भी चुनौती है.

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