भागी हुई लड़कियां: नाज़मीन के घर से 'भाग कर' निशा बनने की कहानी

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'और भी लड़कियां होंगी जो भागेंगी मार्च के महीने में.'

'भागी हुई लड़की' कई बार सिर्फ घर ही नहीं, बल्कि अपना नाम, रिश्ते और धर्म भी पीछे छोड़ जाती है.

ये कहानी है नाज़मीन की, जो ऐसे हालात और वक़्त में अपनी मोहब्बत पाने के लिए घर से निकली, जब मुल्क के एक सूबे में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए कुछ वक़्त ही बीता था.

साल 2002 के बाद का समय था और नाज़मीन को मोहब्बत थी हिंदू लड़के अंकित शर्मा से.

बीबीसी हिंदी की सिरीज़ 'भागी हुई लड़कियां' में विभावरी, शिवानी और गीता की कहानी के बाद आज पढ़िए चौथी किस्त.

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नाज़मीन

मैं यहां अपनी कहानी बता रही हूं. यह इस बात का सुबूत है कि मैं अब भी 'भागने' के टैग से मुक्त नहीं हो पाई हूं.

अब्बा दूसरों की लड़कियों के लिए कहते, ''फलाने की लड़की ने भागकर नाक कटवा दी. लड़का बिरादरी का भी नहीं था.''

बिरादरी का लड़का न होने पर भड़कने वाले अब्बा को मेरे रूप में वक़्त तगड़ा झटका देने वाला था.

जयपुर के एक छोटे इलाक़े में हम रहते थे. अब्बा लोगों के घरों में वाइट वॉश करते थे. छह भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ी थी.

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स्कूल के बाद एक टेक्निकल कोर्स करने के दौरान अंकित से मुलाक़ात हुई. फिर फ़िल्मों की ही तरह हम दोनों को न जाने कब प्यार हो गया.

इन मुलाक़ातों के दौरान कभी हमारा धर्म आड़े नहीं आया. हम एक-दूसरे को अलग धर्म के होने के बावजूद भी प्यार करने से नहीं रोक पाए. कल क्या होगा, इसकी ज़्यादा फ़िक्र नहीं की.

अम्मी मेरी हमराज़ थीं. "मैं किसी को पसंद करती हूं' अम्मी को जब यह पहली बार बताया था तो वो ख़ुश हुई थीं. लेकिन मेरी मोहब्बत अंकित का नाम सुनते ही अम्मी की ख़ुशी चंद पलों में फ़रार हो गई."

अम्मी ने पहली बार में ही साफ इनकार कर दिया. बोलीं, ''अपने छोटे भाई-बहनों का सोचा है? अब्बा बिलकुल बर्दाश्त नहीं करेंगे. तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है. मुझसे तो कह दिया, किसी और से मत कहना.''

अब्बा से मैंने तब भले ही कुछ न कहा हो लेकिन अपने आप से मैं कह चुकी थी कि यह फ़ैसला अब नहीं बदलूंगी.

अंकित ने भी कई बार अम्मी को समझाया, लेकिन कुछ फ़र्क नहीं पड़ा. कोर्स पूरा होने के बाद मैं नौकरी करने लगी थी. मालूम था कि अब्बा कभी नहीं मानेंगे.

फिर एक रोज़ हारकर मुझे अपना घर छोड़ना पड़ा, एक नए घर और अपनी मोहब्बत के लिए.

उस रात मैं पहली बार घर नहीं लौटी थी. ज़ाहिर है कि सब परेशान होंगे. अब्बा अपनी परेशानी को ग़ुस्से से छुपा रहे होंगे. यही ख्याल मुझ पर हावी हुए जा रहे थे. लिहाज़ा मैंने घर फ़ोन कर दिया.

वो मेरी ज़िंदगी का पहला सबसे ख़तरनाक फ़ोन कॉल था.

अंकित ने अब्बा और अम्मी से फ़ोन पर मिलने की गुज़ारिश की. हमें लाख कोसने के बाद अब्बा अम्मी आख़िरकार कुछ रोज़ बाद हमसे मिले.

हमने अब्बा-अम्मी को अपनी शादी के बारे में बताया.

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अब्बा बोले, ''तू मेरे लिए आज से मर चुकी है. अपनी शक्ल कभी मत दिखाना. मेरी दी आज़ादी का ये फ़ायदा उठाया है तूने?''

मैं कुछ नहीं बोल पाई. चुप रही. अब्बा से वो मेरी आख़िरी मुलाकात थी.

अब जंग दूसरे घर लड़ी जानी थी. अंकित भी भाई-बहनों में सबसे बड़ा था. अंकित के घरवालों ने उसे भी काफी कोसा. पर अंकित भी मेरी तरह अड़ चुका था. धीरे-धीरे ससुराल में सबने मुझे अपना लिया.

अंकित ने मुझे क़ुरान शरीफ़ लाकर दी. कहा- तुम जैसे अब तक इबादत करती आई हो, वैसे ही करती रहना.

ये एक बात आज भी याद करती हूं तो मन ख़ुश हो जाता है.

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पर हक़ीक़त ये है कि मैं ख़ुद भी धीरे-धीरे अंकित के साथ परिवार में ढलने लगी. मैं अब नमाज़ नहीं पढ़ती हूं. मीट खाना बंद कर दिया है. मेरा नाम अब नाज़मीन नहीं, निशा है.

ससुराल में सब निशा या भाभी ही बोलते हैं. ईद पर अंकित शॉपिंग करवाना और मिठाई का पूरा इंतज़ाम रखते हैं. घर में जितनी पूजा होती हैं, सबमें शरीक़ होती हूं.

इन बातों के लिए मुझ पर कोई दबाव नहीं रहा. बस सब ख़ुद-ब-ख़ुद होता चला गया. ये फ़ैसले मैंने खुद लिए, घर से निकलकर अंकित से शादी करने के फ़ैसले की ही तरह.

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ख़ुशी होती है कि ज़िंदगी मैं कुछ ऐसे फ़ैसले कर पाई, जिन्हें अब भी निभा रही हूं.

हालांकि कुछ अफ़सोस भी होते हैं. ख़ासतौर पर जब मेरी ज़िंदगी का दूसरा सबसे ख़तरनाक फ़ोन कॉल आया. अब्बा के इंतकाल की ख़बर वाला फोन कॉल.

मैं चाहकर भी न जा सकी. अम्मी ने मना किया कि रिश्तेदार लोग आए हुए हैं, ख़ुदा के लिए इस दुख की घड़ी में तू आकर मुसीबत मत बढ़ाना.

अब्बा के जाने के बाद सिर्फ़ एक बार रात के अंधेरे में घर जा सकी. मेरा घर, जहां से मैं अपनी ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए निकली थी.

और कई लोगों के लिए भागी हुई लड़की बन गई थी.

(इस सच्ची कहानी के सारे पात्र और शहर का नाम बदला हुआ है.)

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