नागा महिलाओं को आँगन तक रोकने का आंदोलन

  • 20 फरवरी 2017
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पिछले महीने भड़की हिंसा के बाद नगालैंड का सारा सरकारी कामकाज ठप पड़ा हुआ है.

समाज में बहस चल रही है कि क्या महिलाओं को रसोई घर तक ही सीमित रहना चाहिए या फिर समाज की तय की गयी हदों को लांघ कर अपनी खुद की पहचान बनाने के लिए आगे आना चाहिए.

ये बहस इसलिए है क्योंकि नगालैंड में महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व बिल्कुल ही नहीं है.

नगालैंड को अलग राज्य का दर्जा मिले 50 साल हो गए हैं और आजतक यहाँ की विधानसभा में एक भी महिला विधायक नहीं रही है. अलबत्ता 1977 में रानो मेसे शाज़िआ सांसद चुनी गईं थीं.

पिछले महीने की हिंसा तब भड़की जब मुख्यमंत्री टीआर जेलियांग ने नगर निकाय के चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी.

हिंसा

इस फैसले के खिलाफ आदिवासी समूह भड़क उठे और राज्य में जमकर हिंसा हुई जिसमे दो लोगों की मौत भी हो गयी. हिंसा के बाद जेलियांग ने अपना आदेश वापस लिया और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दे दिया.

मगर हिंसा में सरकारी इमारतों के बर्बाद होने की वजह से सारा कामकाज रुका पड़ा है.

नगालैंड पर नज़र रखने वालों का कहना है कि अब सामान्य हालात तब ही बहाल होंगे जब नगालैंड पीपल्स फ्रंट यानी एनपीएफ से निष्कासित सांसद नेफियु रियो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे.

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महिलाओं का संघर्ष

नगालैंड में कोई विपक्ष नहीं है क्योंकि 60 सदस्यों वाली विधानसभा में सभी विधायक सत्तापक्ष के हैं. इसमें 49 एनपीएफ के हैं जबकी 4 भाजपा के और 7 निर्दलीय विधायक शामिल हैं.

दिखने को तो मौजूदा संकट महिलाओं को आँगन के पार न निकलने देने के लिए ही दिखाई पड़ता है.

पूर्वोत्तर मामलों के जानकार किसलय भट्टाचार्या कहते हैं कि नगालैंड की राजनीति या समाज में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कभी रहा ही नहीं. वो कहते हैं कि समय-समय पर महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती रहीं हैं.

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मगर भट्टाचार्य यह भी मानते हैं कि नगालैंड में अब भी बंदूक का ही बोलबाला है.

वो मानते हैं कि जो कुछ नगालैंड में हो रहा है उसके पीछे नगालैंड पीपुल्स फ्रंट यानी एनपीएफ से निष्कासित सांसद नेफियु रियो का ही हाथ है.

वो कहते हैं, "सांसद बनने के बाद नेफ्यू रियो इस आस में दिल्ली चले गए कि उनको केंद्रीय मंत्रीमंडल में जगह मिल जाएगी."

जब ऐसा नही हुआ तो उनका मन नगालैंड वापस लौटने का हुआ. आज जो कुछ नगालैंड में हो रहा है उसके पीछे रियो का ही हाथ हो सकता है."

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नगालैंड में महिलाओं की उपेक्षा

  • नगालैंड में 1,110 गांव.
  • आदिवासी बहुल इलाक़ों में आदिवासियों का परम्परागत स्वशासन लागू.
  • ग्राम पंचायतों में महिलाओं के भाग लेने पर पाबंदी, जबकि ग्रामीण विकास परिषद की एक चौथाई सीटों पर आरक्षण की व्यवस्था.
  • नगालैंड के आदिवासी बहुल इलाक़ों में पारंपरिक क़ानून लिखित नहीं हैं इसलिए अपने हिसाब से लोग इनकी व्याख्या करते हैं. ज़्यादातर मामलों में पुरुषों के पक्ष में व्याख्या.
  • आओ नागा जनजाति की महिला 'पूटु मेंडेन' यानी ग्राम परिषद् की सदस्य नहीं हो सकतीं.
  • महिलाओं का पुश्तैनी संपत्ति पर अधिकार नहीं.

समाज का रवैया

कुमारी आलेम एक सरकारी स्कूल की टीचर हैं. वो कहती हैं कि महिलाओं को राजनीति में कभी कोई स्थान इस लिए भी नहीं मिल पाया है क्योंकि महिलाओं के संगठन कभी इसको लेकर संजीदा नहीं रहे हैं. उनका कहना है कि महिलाओं के प्रति समाज का रवैया कुछ ऐसा है कि अगर चुनाव में कोई महिला उतरती है तो उसे पुरुष वोट भी नहीं देना चाहते."

'नगालैंड पेज' की संपादक मोनालिज़ा चंकीजा कहती हैं कि नागालैंड का समाज आज भी पुरुष प्रधान ही है जो कभी नहीं चाहता कि महिलाएं घर के आँगन के पार निकलें.

बीबीसी से उन्होंने कहा, " हमारे समाज में एक चीज़ अच्छी है. हमारे यहां भ्रूण हत्या और दहेज़ प्रथा नहीं हैं. लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा वैसी ही है जैसी के भारत के दूसरे प्रांतों में है. बलात्कार, प्रताड़ना और घरेलू हिंसा के मामले आम हैं. उसी तरह महिलाओं को राजनीति में भाग लेने की मनाही भी है. उन्हें संपत्ति का अधिकार भी नहीं दिया गया है."

मोनालिज़ा कहती हैं कि नागालैंड की महिलाएं मेहनती हैं और वो ऐसी नज़र भी आती हैं. मगर सिर्फ मेहनत करते हुए नज़र आने से ही उनका सशक्तीकरण हो जाएगा ऐसा नहीं है.

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हलाकि पिछले महीने नगालैंड में भड़की हिंसा में सरकारी इमारतों के बर्बाद होने की वजह से सारा कामकाज रुका पड़ा है.

सोमवार को सामान्य जीवन के धीरे धीरे पटरी पर लौटने के आसार नज़र आने लगे.

नगालैंड पर नज़र रखने वालों का कहना है कि अब सामान्य हालात तब ही बहाल होंगे जब नगालैंड पीपुल्स फ्रंट यानी एनपीएफ से निष्कासित सांसद नेफियु रियो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे.

कुछ समीक्षक इसे सत्तारूढ़ गठबंधन के अंदरूनी कलह के रूप में देख रहे हैं.

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