'मेरे जीवन के 12 साल कौन लौटाएगा?'

  • 21 फरवरी 2017
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हुसैन को 12 साल बाद दिल्ली बम धमाकों के आरोपों से बरी किया गया

मोहम्मद हुसैन फ़ाज़ली के घर के पिछले वाले हिस्से में कई चीज़ें बिखरी पड़ी हैं, वैसे ही जैसे हुसैन और उनके परिवार की ज़िंदगी और चैन सुकून बीते 12 सालों से बिखरा हुआ था.

श्रीनगर के सोरह में 43 साल के हुसैन के घर के अंदर जाते ही, वे कई लोगों के बीच कंबल में बैठे नज़र आते हैं. वो लोगों को जेल में बिताए सालों की कहानी सुना रहे हैं.

जो भी आता है तो हुसैन खड़े होकर उसे गले लगाते हैं. यहाँ आने वाले कई लोगों और अपने ख़ानदान की नई पीढ़ी में से किसी को भी वह पहचानते नहीं हैं.

हुसैन और रफ़ीक़ अहमद शाह को पिछले दिनों दिल्ली की एक निचली अदालत ने 2005 में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपों से बरी कर दिया है. उन धमाकों में 68 लोग मारे गए थे.

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हुसैन को बेगुनाह होकर रिहा होने की ख़ुशी तो है, लेकिन वे इस बात से सदमे में हैं कि उनके 12 साल जेल में रहने के दौरान उनके मां-बाप की सेहत बिगड़ गई.

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Image caption हुसैन अपनी मां के साथ तस्वीर में नज़र आ रहे हैं

हुसैन का कहना था, "अब घर पहुंच कर मुझे लग रहा है कि मैंने क्या खोया. घर पहुंचा तो मां को बिस्तर पर लेटा पाया, बाप के आंखों की रोशनी भी ख़त्म हो गई है."

मोहम्मद हुसैन फ़ाज़ली अपने घर के जिस कमरे में बैठे हैं, वहां कोने में ताक पर रखा काले रंग का पुराना टेलीफ़ोन रखा हुआ है. हुसैन के अपने मां-बाप से संपर्क का एकमात्र ज़रिया था ये फ़ोन.

बीते 12 साल में हुसैन के मां-बाप कभी अपने बेटे को मिलने नहीं जा पाए, वे दिल्ली आने जाने का ख़र्चा नहीं उठा सकते थे. हुसैन बार-बार एक ही सवाल पूछते हैं, "मेरे 12 साल कौन वापस लौटाएगा?"

'शादी की उमर थी'

बेगुनाही के 12 साल जेल में काटने पर हुसैन पूछते हैं, "जिस तरह मुझे 12 साल के बाद जेल से बरी कर दिया गया, क्या बारह साल पहले ऐसा नहीं हो सकता था? मेरी ज़िन्दगी तो तबाह हो गई. जब गिरफ़्तार किया गया तो मेरी शादी की उमर थी."

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ये पूछने पर कि क्या जिन लोगों ने आपको गिरफ़्तार किया था, उनके ख़िलाफ़ कारवाई होनी चाहिए या फिर आपको मुआवज़ा मिलना चाहिए. वह कहते हैं, "मेरी मांग ये है कि जिन पुलिस वालों ने मुझे उठाया था, उनसे ये पूछा जाए कि मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया?"

जब हुसैन को गिरफ़्तार किया गया था, वे उस समय 31 वर्ष के थे. घर में शादी की बातें हो रही थीं. अब हुसैन के पिता को इस बात की आशंका सता रही है कि बेटे पर जो दाग़ लगा है वो इतनी जल्दी मिटेगा नहीं.

उन्होंने कहा, "किस-किस को समझाएं कि मेरा बेटा बेगुनाह है." हालांकि उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि उन्होंने मरने से पहले बेटे को देख लिया. वह कहते हैं, "बस ये एक सपना था की मरने से पहले बेटे को देख लें, जो पूरा हो गया."

चंद मिनट की पूछताछ

हुसैन की माँ फ़ातिमा बेगम को लगता है कि बेटे का नया जन्म हुआ है. उन्होंने बताया, "ऐसा लगता है कि बेटा घर वापस आकर एक बार फिर मेरे कोख से जन्मा है. बेटे के बग़ैर 12 साल दिल पर पत्थर रख कर गुज़ारे हैं."

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हुसैन को अपने घर से ये कहकर गिरफ़्तार किया गया था कि चंद मिनटों के पूछताछ के बाद छोड़ दिया जाएगा. हुसैन को ये भी नहीं पता था कि उन्हें क्यों गिरफ़्तार किया गया और कहां ले जाया गया?

तब वे शॉल बनाने का काम करते थे और महीने में ढाई हज़ार रूपया तक कमा लेते थे.

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Image caption अपने माता-पिता के साथ हुसैन

उन्हें कई दिनों के बाद एक पत्रकार से पता चला कि वे दिल्ली में हैं और दिल्ली धमाकों के आरोपों में उन्हें दिल्ली लाया गया और फिर उन्हें 12 साल जेल में काटने पड़े.

जिस दिन उन पर लगे आरोपों पर अदालत में फ़ैसला होना था, उस दिन के बारे में हुसैन कहते हैं, "वो मेरी क़िस्मत का फ़ैसला था, ख़ुदा पर भरोसा था और इंसाफ़ की जीत हुई."

हालांकि हुसैन में इस बात का ग़ुस्सा है कि उन्हें कश्मीरी मुसलमान होने के चलते पकड़ा गया था, वे कहते हैं, "हमें इसलिए गिरफ़्तार किया गया कि हम कश्मीरी मुसलमान हैं."

हालांकि अब हुसैन और उनके परिवार वालों को नई ज़िंदगी की शुरुआत की उम्मीद है.

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