जाट आरक्षण: बदली रणनीति, मोर्चे पर आई महिलाएं

जाट आरक्षण

हरियाणा के रोहतक के पास जसियां गांव में लोगों का हुजूम इकट्ठा है. जैसे-जैसे दिन चढ़ रहा है, भीड़ बढ़ती जा रही है.

दूर-दराज़ के इलाकों से ट्रैक्टर में भर-भर कर लोग जशिया आ रहे हैं. ये सभी लोग जाट समुदाय से हैं जो पिछले 25 दिनों से आरक्षण की मांग को लेकर यहां धरना दे रहे हैं.

ठीक एक साल पहले फरवरी माह में पूरे हरियाणा में आरक्षण के लिए जाटों के आंदोलन के दौरान कई दिनों तक हिंसा चलती रही. इस हिंसा में 31 लोग मारे गए थे और इस दौरान हुई आगज़नी और लूटपाट की घटनाओं में लोगों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा.

अब अपनी आरक्षण की मांग के साथ-साथ जाट समुदाय के लोग हिंसा के दौरान मारे गए अपने लोगों के लिए मुआवज़े की भी मांग कर रहे हैं. वैसे तो यह आंदोलन अब तक शांतिपूर्ण ही है मगर रोज़ आकर धरना दे रहे लोगों ने अब अपने तेवर तल्ख़ करने शुरू कर दिए हैं.

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Image caption जाट नेता किशनलाल हूडा

जाट आरक्षण आंदोलन समिति के बैनर तले चलाया जा रहा आंदोलन शुरू तो हरियाणा से हुआ था, मगर अब यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से होता हुआ दिल्ली में दस्तक दे रहा है. आंदोलन के 25 वें दिन आंदोलनकारियों का गुस्सा सरकार से ज़्यादा मीडिया पर नज़र आया जिन पर उन्होंने एकतरफा खबरें देने का आरोप लगाया.

सरकारी आश्वासन

जाट नेता किशनलाल हूडा कहते हैं कि सरकार ने पिछले साल आश्वासन दिया था कि फरवरी की घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवज़ा दिया जाएगा जो नहीं हुआ. उनका कहना था कि जाट बिरादरी को आरक्षण देने के मामले में भी हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार 'ढुलमुल' रवैया अपना रही हैं.

उन्होंने कहा, "हमारे आक्रोश का कारण भी यही है. हमने अब तक शांतिपूर्ण आंदोलन ही चलाया है मगर किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही है."

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Image caption मीना मकरौली

पिछली बार आंदोलन में महिलाएं कहीं नज़र नहीं आ रही थीं. मगर इस बार जाट आरक्षण आंदोलन समिति ने अपनी रणनीति बदलते हुए सभी धरनास्थलों पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की है.

आंदोलन में हिस्सा लेने वाली एक महिला हैं मीना मकरौली जो जशिया के पास ही रहती हैं.

सरकार से नाराज़गी

मीना को नाराज़गी है कि उनका आन्दोलन पिछले 25 दिनों से चल रहा है मगर सरकार के किसी प्रतिनिधि ने आकर उनसे बात नहीं की है.

वो कहती हैं, "इतने लोग सड़कों पर कई दिनों से हैं. मगर सरकार को तो परवाह ही नहीं है. क्या ये अधिकारी और नेता सिर्फ़ एसी ऑफिसों में ही बैठने के लिए हैं. जाट बिरादरी को बदनाम करने की साज़िश चल रही है जबकि हमारे साथ 36 जातियों का समर्थन है. हम सबको साथ लेकर चल रहे हैं मगर कुछ नेता हमें देशद्रोही तक कहने से बाज़ नहीं आ रहे हैं."

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Image caption राजकली

गढौली गांव की रहने वाली राजकली कहती हैं कि इस बार आंदोलन में महिलाएं ही आगे बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं.

वो कहती हैं कि इस बार महिलाओं ने ठान ली है कि जब तक सरकार आरक्षण देने के लिए तैयार नहीं हो जाती है, वो सड़कों पर ही डटी रहेंगी.

सरकार को चेतावनी

जाट आरक्षण आंदोलन समिति के महासचिव अशोक बलहारा कहते हैं कि अपनी मांगों को लेकर इस बार वो सरकार से आश्वासन नहीं बल्कि 'इंप्लीमेंटेशन' चाहते हैं. इसलिए अब समिति ने अधिकारियों को अल्टिमेटम देना शुरू कर दिया है.

वो कहते हैं कि समिति से जुड़े लोगों ने अपनी मांगों को लेकर 26 फरवरी को 'काला दिवस' मनाने का फैसला किया है. वहीँ दो मार्च को हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाटों ने दिल्ली में एक बड़ा प्रदर्शन करने की भी घोषणा की है.

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Image caption धर्मवीर सैनी

इस प्रदर्शन के दौरान जाट नेता अपने 'संसद घेरो' आंदोलन की तरीक़ की भी घोषणा करेंगे.

मगर रोहतक के सुपरा चौक और उन तमाम इलाकों में ग़ैर-जाट बिरादरियों में दहशत का माहौल है जो पिछले साल फरवरी माह में आंदोलन के दौरान हिंसा का शिकार हुए थे.

धमकी और पलायन

इनमें सुपरा चौक के वो दुकानदार भी हैं जिनकी दुकानों को उनके सामने लूटकर आग के हवाले कर दिया गया था.

बाज़ार के प्रधान धर्मवीर सैनी ने बीबीसी से बात की और यह आरोप लगाया कि पिछले 25 दिनों से उन्हें धमकियां मिल रहीं हैं.

वो कहते हैं कि उन्हें सरकार ने मुआवज़ा दिया ज़रूर, मगर रोहतक में हालात ऐसे होते चले जा रहे हैं कि वो अब पलायन करने का मन बना रहे हैं. सुपरा चौक के दुकानदारों का कहना है कि उनके परिवार के लोग रात को ठीक से सो भी नहीं पा रहे हैं क्योंकि उन्हें हमेशा हमले का अंदेशा बना हुआ है.

हालांकि राज्य सरकार ने जाटों के आंदोलन को देखते हुए अर्धसैनिक बालों की तैनाती की है. मगर लोगों को यह सबकुछ अपर्याप्त लग रहा है.

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