नज़रिया- बीएमसी चुनाव: भगवा रंग में रंग गई मुंबई

  • 23 फरवरी 2017
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बृहन्मुंबई नगर पालिका (बीएमसी) चुनाव के नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसी खुद को सेक्युलर कहने वाली पार्टियां अगर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेंगी तो नोटबंदी जैसे निर्णयों के बावजूद जनता शिवसेना और भाजपा जैसे विकल्पों को ही चुनेगी.

शिव सेना ने बताया मुंबई का बड़ा भाई कौन?

नहीं समझे अपनी भूमिका

मुंबई के अलावा ठाणे, पुणे, पिंपरी-चिंचवड, नासिक, उल्हासनगर आदि 10 महानगर पालिका और 25 ज़िला परिषद के नतीजे देखने के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि शहरी इलाकों में भाजपा का ज़ोर कायम है. कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस न केवल शहरों से उखड़ गई है, बल्कि पश्चिमी महाराष्ट्र जैसे अपने गढ़ में भी उन्होंने जनाधार खो दिया है.

बीते ढाई साल की राजनीति ही इसका कारण है. 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद विरोधी दल बने इन पार्टियों के नेता विपक्षी पार्टी की भूमिका को अभी तक समझ ही नहीं पाए हैं. नोटबंदी हो या फिर कृषि उपज का सही दाम किसानों को मिलने का सवाल हो, इन पार्टियों ने संघर्ष की भूमिका कतई नहीं निभाई.

महाराष्ट्र की राजनीति में विरोधी पार्टी का जो वैक्यूम तैयार हुआ, उसे कुछ हद तक भरने का काम भाजपा के साथ सत्ता में बैठी शिवसेना ने ही कर दिया.

प्रमुख सत्ताधारी पार्टी भाजपा को आड़े हाथ लेने का काम शिवसेना का शीर्ष नेतृत्व करता रहा जिसका परिणाम सामने है. शहरों से उखड़ गई कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को सांगली और सतारा जैसे पश्चिमी महाराष्ट्र के ज़िलों में जूझना पड़ा है.

सेक्युलर विचारधारा

मुंबई शहर कई वर्षों तक अपनी सेक्युलर विचारधारा के लिए जाना-पहचाना गया. मुंबई शहर ने कॉमरेड डांगे, जॉर्ज फर्नांडिस और दत्ता सामंत जैसे कामगार नेता दिए. उसी शहर ने एमएफ हुसैन जैसे चित्रकार दिए.

जिस शहर में कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई, जहां देशभर से लोग आकर अपने सपनों को सच करने के लिए आज भी कड़ी मेहनत करते हैं, उस शहर का 'पोलिटिकल डिस्कोर्स' पूरी तरह से दक्षिणपंथी बन गया है.

37 हज़ार करोड़ का बजट रखने वाली बीएमसी में अब शिवसेना की सत्ता होगी और भाजपा प्रमुख विरोधी दल की भूमिका में होगी. चुनाव दोनों ही पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा है, हालांकि वो राज्य सरकार साथ मिलकर चला रहे हैं.

इस नतीजे के बाद गठबंधन का भविष्य क्या होगा, ये देखने वाली बात होगी.

मुंबई शहर अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए जैसे जाना जाता है, वैसे ही बाल ठाकरे जैसे दक्षिणपंथी नेताओं की कट्टर राजनीति के लिए भी जाना गया. बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद सबसे भयंकर दंगे मुंबई शहर ने ही देखे थे.

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सवाल सांस्कृतिक पहचान का

'मराठी मानूष' के हक के नाम पर उत्तर भारतीय नौजवानों की पिटाई भी इसी शहर में हुई थी और दक्षिण भारतीयों के ख़िलाफ़ 'उठाओ लुंगी' जैसी घोषणाएं भी इसी शहर ने सुनी थीं.

हालांकि इन सबके बावजूद मुंबई ने अपने सारे धर्म, जातियों, पंथ, भाषाओं को समेटकर अपनाने के तेवर कभी नही बदले. लेकिन इस चुनाव के बाद शायद मुंबई का सांस्कृतिक चेहरा बदल सकता है.

भीष्म साहनी के उपन्यास तमस में विभाजन के नाम पर शहर में जब हिंदू-मुसलमान के बीच तनाव बढ़ता है तो एक बुज़ुर्ग कहते हैं कि इस शहर पर चीलें मंडराएंगी. कई सेक्युलर बुज़ुर्गों को इन चुनावी नतीजों से कुछ ऐसा ही अहसास हो सकता है.

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मुंबई शहर से कांग्रेस पार्टी मानो पूरी तरह से साफ हो गई है. महाराष्ट्र में अब दो साल बाद लोकसभा के चुनाव होंगे. 10 साल पहले जिस मुंबई ने कांग्रेस को लोकसभा की छह में से छह सीटें दी थीं, उसी मुंबई में कांग्रेस को उभरने के लिए अब कड़ी मेहनत करनी होगी.

(वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स की बीबीसी से बातचीत पर आधारित)

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