भागी हुई लड़कियां: डांस के लिए घर से 'भाग फ्रीडम फाइटर' बनी ये लड़की

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'घर से बाहर लड़कियां काफी बदल चुकी हैं.'

ये कहानी ऐसी एक लड़की की है, जो घर से प्यार या पढ़ाई के लिए नहीं निकली. वो घर से इसलिए निकली कि पैरों में घुंघरू बांधकर कुचिपुड़ी डांस सीख सके.

बीबीसी हिंदी की सिरीज़- 'भागी हुई लड़कियां' में आप विभावरी, शिवानी, गीता, नाज़मीन और शबाना की कहानी पढ़ चुके हैं. आज बारी है छठी किस्त की.

दीपिका

छोटे से ही मुझे डांस करना अच्छा लगता था. स्कूल में पढ़ाई के अलावा डांस, ड्रामा और म्यूजिक से जुड़े प्रोग्राम्स में खूब एक्टिव रही.

इस वजह से टीचर्स की लाडली बनी. लेकिन मम्मी-पापा नाखुश थे कि उनकी बिटिया 'किताबी कीड़ा' नहीं बन पाई.

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मुझे डांस फॉम कुचिपुड़ी बहुत अच्छा लगता था. जैसे-जैसे बड़ी होने लगी, कुचिपुड़ी नृत्य में परफेक्ट होने का ख्वाब आंखों में चमकने लगा.

मम्मी, पापा ने कहा, ''पढ़ाई में ध्यान लगाओ. डांस सीखने से क्या होगा.'' बचपन का भागता मन कुचिपुड़ी से खेल-कूद की तरफ बढ़ चला. जब एथलेक्टिस ट्रेनिंग की गुज़ारिश घर में की तो इस बार भी वही घिसी हुई 'पढ़ाई में ध्यान लगाओ' की नसीहत मिली.

गली के लड़कों को साइकिल रेस में चुनौती देने के जुर्म में पापा ने मेरी साइकिल तक बेच दी. पापा ने तब 'दंगल' फिल्म के महावीर फोगाट की तरह 'म्हारी छोरी छोरों से कम है के' जैसी कोई लाइन नहीं कही.

कॉलेज पहुंची, तब भी मेरा मन सिर्फ पढ़ाई तक ही नहीं टिका. घर पर शायद पहला बड़ा झूठ बोला. झूठ ये कि कॉलेज में एक्सट्रा करिकुलर एक्टिविटी में हिस्सा लेना ज़रूरी है. इस बहाने की आड़ में साल भर कॉलेज की नाटक मंडली में खूब नुक्कड़ नाटक किए.

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नाटकों की वजह से घर पहुंचने में देर होने लगी. लड़कों से दोस्ती होने के शक में थिएयर छोड़ने का फ़रमान जारी हुआ. उसी पुरानी लाइन के साथ- सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान लगाओ.

इस फरमान के बाद छुपकर कुछ वक्त ही नाटकों में हिस्सा ले पाई. मन को समझाया कि जब नौकरी करने लगूंगी, तब अपने मन की करुंगी.

फिर धीरे-धीरे ये भ्रम भी टूटता रहा, क्योंकि जिस चीज में मैं अपनी खुशी देखती थी. खुद को ढूंढ पाती थी, उसमें मेरे घरवालों को न अपनी खुशी मिलती और न ही 'अच्छे घर की लड़की' वाली अपनी परिभाषा.

खुद की इच्छाओं को जो पूरा न कर पाएं, वो 'अच्छे घर की लड़कियां' न जाने कैसी जीती होंगी?

डांस, थिएटर, दोस्त के घर पढ़ाई, खेलना कॉलेज ट्रिप, एनजीओ में पढ़ाना. ये सारे काम जब करने चाहे, तो जवाब मिलता, ''वक्त बर्बाद मत करो. कॉलेज से घर और कॉलेज ख़त्म होने पर अच्छे से लड़के के साथ शादी को मेरी मंज़िल बना दिया गया.

मम्मी-पापा गलत भी नहीं थे. ज्यादातर मौकों पर एक मिडिल क्लास फैमिली बेटियों के बारे में इतना भर ही सोच पाती है. हमारे समाज को पैरेंटिंग अवेयरनेस की शायद सबसे ज्यादा ज़रूरत है.

पर अफ़सोस होता कि जन्म देने और पालकर बड़ा करने वाले मां-बाप ही अपनी बेटी को समझ नहीं पाए. वो नहीं समझ पाए कि मैं भी हाड़ मांस की बनी हूं. अलग सोच रख सकती हूं. किसी से प्यार भी कर सकती हूं.

घर की चोरी से एक दोस्त के साथ समर्थ थिएटर ग्रुप बनाया, जहां हम सबके साथ थिएटर करते. मेरे बचपन के देखे हुए सपने सच होने लगे. इसी बीच एक दोस्त के साथ मेरी करीबियां बढ़ने लगीं. घर पर ज़िक्र छेड़ा तो इस बार फिर इंकार भरा फ़रमान ही मिला.

फिर एक रोज़ घर पर शादी की बात सख्ती से चलने लगी. वो दिन मेरे घर पर आख़िरी दिन थे. परिवार की झूठी शान के लिए एक जेल से निकलकर दूसरी अनजान जेल जाना मुझे मंज़ूर नहीं था. मुझे अपनी पहचान अनचाहे आदमी की बीवी बनकर नहीं बनानी थी.

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लड़कों से कुंडलियां मिलाए जाने का दौर शुरू हुआ और मैं अपने ही घर में नज़रबंद कर ली गई. शुक्र ये रहा कि स्कूल पढ़ाने जाती थी, तो सांस सी मिल जाती थी.

मन और आत्मा कब की घर से भाग चुकी थी. शरीर भी घर छोड़ने को तैयार था. बचपन से दबाए जा रहे सपने बगावत कर बैठे.

घर से निकलने की हिम्मत मिली मोहब्बत और आज़ादी को दबाने के फ़रमान से.

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स्कूल से छुट्टी के वक्त पापा लेने आते थे. एक सुबह मना करके निकली कि आज लेने मत आना. वकील के ज़रिए अख़बार में पहले ही चुपचाप विज्ञापन दे चुकी थी कि घरवालों से मेरा कोई लेना-देना नहीं.

उस शाम मैं घर नहीं लौटी. कई फोन आ रहे थे. उठाने की हिम्मत नहीं हुई. पर अपने सपनों को दबाने की हिमाक़त भी नहीं कर सकती थी.

मैं उस रोज़ अपनी मोहब्बत को पाने के लिए घर से नहीं निकली थी.

मैं बस अपने लिए निकली थी.

आज उस वाकये को एक साल हो गया है. सपने को देखने के दस साल बाद मैं अब छोटे बच्चों के साथ कचिपुड़ी सीख रही हूं. जी भर नाचती हूं. खुश रहती हूं.

घरवालों की याद तो आती है. कई बार लगता भी है कि ये इकलौता रास्ता नहीं था. पर आज तक घर से भी किसी ने फ़ोन नहीं किया. दीदी ने एक बार फ़ोन कर पूछा था- शादी हुई या नहीं? पर मैं तो शादी के लिए घर से निकली ही नहीं थी.

हमारे मां-बाप सही होते हैं लेकिन वो हर बार सही हों, ये ज़रूरी नहीं है. आज़ादी न मिले तो 'फ्रीडम फाइटर' बन जाना चाहिए. सपनों को पूरा करने के लिए घर से निकल जाना चाहिए.

कोई इस निकलने को 'घर से भागना' कहे तो कहता रहे.

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