'बस्तर लौटना चाहते हैं, लड़ाई अभी बाक़ी है'

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Image caption बस्तर में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल

"पुलिस संरक्षण में चलने वाले असामाजिक संगठनों ने भले हमें बस्तर से हटने के लिये बाध्य कर दिया हो लेकिन बस्तर के आदिवासियों के क़ानूनी अधिकार की लड़ाई जारी है."

इस लड़ाई का दावा करने वाली 46 साल की शालिनी गेरा उस जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, जिन्होंने 2013 से बस्तर में काम करना शुरु किया.

गेरा का दावा है कि अपने साथी वकीलों की मदद से उन्होंने बस्तर के कई ज़िलों में आदिवासियों के लिये क़ानूनी लड़ाई की शुरुआत की.

मूलतः वैज्ञानिक शालिनी गेरा ने विदेश में काम किया लेकिन मानवाधिकार के प्रति काम करने की ललक उन्हें भारत खींच लाई. उनके प्रोफ़ेसर पति भी दिल्ली में ही थे. 40 साल की उम्र में शालिनी ने दिल्ली में क़ानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया.

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इसी दौरान बस्तर की आदिवासी नेता सोनी सोरी से उनकी दिल्ली में मुलाकात हुई और बस्तर से जुड़े मुद्दों को जानने-समझने के बाद उन्होंने तय किया कि बस्तर में ही काम करना है.

एक मुलाकात से मिला रास्ता

शालिनी कहती हैं, "सोनी सोरी से मिलने के बाद ही हमारे मन में यह विचार आया कि क्यों नहीं बस्तर में क़ानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिये कोई संगठन बनाया जाए और वहां रह कर ये काम किया जाए."

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जुलाई 2013 में जगदलपुर लीगल एड ग्रुप बना और उसमें ईशा खंडेलवाल, पारिजाता भारद्वाज, रुपेश कुमार, गुनीत कौर और देवेश अग्निहोत्री जैसे वक़ील और सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े. हालांकि बाद के दिनों में शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल ने ही संगठन की कमान संभाली.

मध्यप्रदेश के नीमच की रहने वाली ईशा खंडेलवाल ने कंप्यूटर की पढ़ाई करने के बाद दिल्ली से क़ानून की पढ़ाई की और वहीं उनकी मुलाकात शालिनी गेरा से हुई.

ईशा कहती हैं, "हमने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप बनाने के बाद शुरुआती दौर में बड़ी संख्या में न्यायालय और पुलिस के मामलों को लेकर सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाये और जो तथ्य हमारे सामने आये, वो हैरान करने वाले थे. हमने ऐसे मुक़दमे चिन्हांकित किए, जिनमें आदिवासी लंबे समय से जेल में थे."

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ईशा के अनुसार ऐसे सैकड़ों मामले अदालत में लंबित थे, जिनमें आदिवासियों की बरसों से पेशी नहीं हुई थी. यहां तक कि कई मामलों में वे सज़ा से अधिक दिन जेल में गुजार चुके थे लेकिन उनकी जमानत नहीं हो पाई थी.

आदिवासियों की पैरवी

अधिकांश मामलों में आदिवासियों को अपने मुक़दमे की स्थिति के बारे में भी कुछ भी पता नहीं था. जगदलपुर लीगल एड ग्रुप का दावा है कि स्थानीय वक़ीलों की मदद से उन्होंने इन मामलों की पैरवी शुरु की.

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पुलिस और सुरक्षाबलों द्वारा कथित रुप से आदिवासियों को फ़र्ज़ी मामलों में जेल भेजने, फर्ज़ी मुठभेड़ और महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसे मामलों को अदालत तक ले जाने वाला जगदलपुर लीगल एड ग्रुप जल्दी ही एक ऐसे संगठन के रुप में आदिवासियों के बीच लोकप्रिय हो गया, जिसके वकील बिना पैसे लिए आदिवासियों के मुक़दमे लड़ रहे थे.

लेकिन ऐसे मामलों ने पुलिस और सरकार के लिये मुश्किल पैदा कर दी. आरोप लगा कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप मूलतः माओवादियों के मामले अदालत में लेकर आ रहा है और माओवादियों को इससे मदद मिल रही है.

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6 अक्टूबर 2015 को बस्तर ज़िला बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित किया कि जो भी वकील स्थानीय बार काउंसिल में रजिस्टर्ड नहीं हैं, वे बस्तर में वकालत नहीं कर सकते. इसके बाद फरवरी 2016 में बार एसोसिएशन ने जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के वकीलों के साथ स्थानीय वकीलों के कामकाज पर भी सवाल खड़े करते हुये प्रस्ताव पारित किया और उन पर रोक लगायी.

संदिग्ध होने का आरोप

बस्तर ज़िला बार एसोसिएशन के सचिव नवीन कुमार ठाकुर का कहना है कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप से जुड़े वकीलों ने जब बस्तर में वकालत शुरु की तो उन्होंने स्थानीय वक़ीलों को नकारा साबित करने की कोशिश की. इसके अलावा वे ज्यादातर ऐसे ही मामलों में दिलचस्पी ले रहे थे, जिनका संबंध माओवादियों से था.

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नवीन कुमार ठाकुर का आरोप है कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के सदस्य ऐसे इलाकों में सक्रिय थे, जहां आम लोगों का जा पाना संभव नहीं था. वकालत की आड़ में वे जो कुछ कर रहे थे, वह 'संदिग्ध' था.

ठाकुर कहते हैं, "हमने उनसे रजिस्ट्रेशन के काग़ज़ मांगे और उन्हें स्थानीय बार एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन करवाने के लिये भी कहा. लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. इसके बाद बार एसोसिएशन ने बस्तर में अनाधिकृत रुप से वकालत कर रहे लोगों पर रोक का प्रस्ताव पारित किया."

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नवीन ठाकुर का कहना है कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के सदस्यों ने अपनी पहचान और पेशे को सुनिश्चित करने के बजाये उल्टा राज्य और देश की बार काउंसिल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बस्तर जिला बार एसोसिएशन की शिकायत की.

लेकिन ईशा खंडेलवाल के पास अपना तर्क है. ईशा कहती हैं, "एडवोकेट्स एक्ट की धारा 30 किसी भी बार एसोसिएशन को किसी वकील को पूरे देश में कहीं भी वक़ालत करने से नहीं रोक सकती. इसके बाद भी हमने दिल्ली स्टेट बार काउंसिल से छत्तीसगढ़ स्टेट बार काउंसिल में अपना रजिस्ट्रेशन ट्रांसफ़र कराने की प्रक्रिया शुरु की."

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बार एसोसिएशन के कड़े रुख के बाद भी शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल ने अपना काम बंद नहीं किया लेकिन इनके लिए असली मुश्किलें तब पैदा हुईं, जब इन महिला वकीलों के ख़िलाफ़ पुलिस ने वातावरण बनाना शुरु किया.

पुलिस के सरंक्षण में बने सामाजिक एकता मंच ने उस मुहल्ले में जा कर विरोध प्रदर्शन शुरु किया, जहां शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल रहती थीं. मंच का भी आरोप था कि वकीलों का यह समूह माओवादियों की मदद कर रहा है. इसके बाद एक अवसर तो यह भी आया कि पुलिस ने ही सार्वजनिक रुप से जगदलपुर लीगल एड ग्रुप से जुड़े लोगों के पुतले जलाए.

बस्तर में आसान नहीं औरत होना

बस्तर के तत्कालीन आईजी पुलिस शिवराम प्रसाद कल्लुरी ने भी दावा किया कि जगदलपुर लीगल एड ग्रुप की गतिविधियां 'संदिग्ध' हैं.

अभी बिलासपुर में ठिकाना

शालिनी कहती हैं, "पुलिस ने हमारे मकान मालिक को धमकाया कि हमें मकान से निकाल बाहर करे. हमारे ख़िलाफ़ ऐसा माहौल बना दिया कि हमें फरवरी 2016 में बस्तर छोड़ना पड़ा. हमने इसके बाद बिलासपुर में काम करना शुरु किया और पिछले साल भर में बस्तर से जुड़े कई मामले हमने हाईकोर्ट में पेश किये. हम तो बस्तर पुलिस को धन्यवाद देंगे कि उनके कारण हम अब हाईकोर्ट में भी मुक़दमे लड़ रहे हैं."

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ईशा खंडेलवाल चाहती हैं कि बस्तर में ज़िला स्तर पर भी उनका समूह काम करे और आदिवासियों को न्याय मिले. बस्तर से चार सौ किलोमीटर दूर बिलासपुर में रह कर बस्तर के लिये काम करना मुश्किल हो रहा है.

ईशा कहती हैं, "मैं जल्दी बस्तर लौटना चाहती हूं. हमारी लड़ाई अभी बाक़ी है."

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