मोदी राज में कितना बदल गया है जेएनयू

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ऑटोवाले ने कहा पाकिस्तान छोड़ देता हूं

''तब जेएनयू के होस्टल में कोई कमरा खाली नहीं था. हम दोनों मुनिरका में किराए के कमरे में रहते थे. नौ फ़रवरी के बाद हालात ऐसे बदले कि मानों हम इस देश के नागरिक ही नहीं हैं. मकान मालिक ने तत्काल कमरा खाली करा दिया. एक दिन एक ऑटो वाले ने कहा कि आपलोग को पाकिस्तान ही छोड़ देता हूं.''

जेएनयू के लातिन अमरीकी विभाग में एमफिल कर रहीं प्रियदर्शिनी और अनिता जब यह बात बताती हैं तो उनके चेहरे पर हंसी और ग़ुस्सा दोनों एक साथ महसूस किया जा सकता है.

मोहम्मद फ़हीम जेएनयू में अरबी की पढ़ाई कर रहे हैं. फ़हीम ने कहा, ''जेएनयू के बारे में बहुत सुना था. यहां के खुलेपन और आज़ादख्याल माहौल की खूब तारीफ़ होती थी. अब इसे लेकर मन में शक घर कर गया है. नजीब के ग़ायब होने के बाद से मन में दहशत और ख़ौफ़ है. इसके बावजूद मुझे इस यूनिवर्सिटी पर काफी भरोसा है. अब भी यहां रहने में अच्छा लगता है क्योंकि अभी बहुत कुछ बचा है.''

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'नजीब के बाद डर लगता है'

क्या केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की पहचान बदली है? अभी जेएनयू कई तरह के प्रशासनिक बदलावों के दौर से भी गुजर रही है.

जेएनयू: 'नजीब को ढ़ूढ़ने में प्रशासन लापरवाह'

Image caption जेएनयू की दीवार पर लगा पोस्टर

यहां के कई छात्रों का कहना है कि मोदी सरकार आने के बाद 26 फ़रवरी 2016 तक सब कुछ ठीक रहा. 27 फ़रवरी 2016 जेएनयू के तत्कालीन वीसी सुधीर कुमार सोपोरी का आख़िरी दिन था. इसके बाद देश की तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी की सिफारिश पर जगदीश कुमार को जेएनयू का वीसी बनाया गया.

जेएनयू: 'राष्ट्रवाद' बनाम 'देशद्रोह' की बहस

छात्रों का कहना है कि जेएनयू में सारी उठापटक जगदीश कुमार के आने के बाद से शुरू हुई. प्रियदर्शिनी और अनिता ने कहा कि जगदीश कुमार जैसा कर रहे हैं ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया.

दोनों छात्राओं ने कहा कि जगदीश कुमार सब कुछ अपने मन से नहीं कर रहे हैं बल्कि उन्हें ऊपर का आदेश मानना पड़ रहा है. प्रियदर्शिनी ने कहा कि इस सरकार के साथ समस्या है कि वह जेएनयू पर हावी रहना चाहती है.

Image caption वीसी के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे जेएनयू छात्र

जब जगदीश कुमार के वीसी बनने पर मुहर लगी तो यह बात भी सामने आई थी कि उनका आरएसएस से जुड़े एक संगठन विज्ञान भारती से संबंध है.

उन्होंने इस संगठन के कार्यक्रम में शामिल होने की बात भी मानी थी लेकिन औपचारिक सदस्य होने की बात को ख़ारिज कर दिया था.

जगदीश कुमार के हाथ में जेएनयू की कमान आने के ठीक 10 दिन बाद ही 9 फ़रवरी 2016 को संसद पर हमले के दोषी अफज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर एक कार्यक्रम में कथित रूप से राष्ट्रविरोधी नारे लगाने की बात कही गई. अभी तक साफ़ नहीं है कि नारे किसने लगाए थे.

इन नारों का हवाला देकर बीजेपी के सुब्रमण्यन स्वामी ने जेएनयू को बंद करने की सलाह दी और दिल्ली से बीजेपी सांसद महेश गिरी ने जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बताया था. इसके बाद उन संदिग्ध नारों को देश भर के मीडिया में दिखाया गया और जेएनयू की प्रगतिशील पहचान राष्ट्रविरोधी के रूप में लोगों के बीच फैली.

हालांकि जेएनयू में एबीवीपी के नेता सौरभ शर्मा इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हैं. उनका कहना है, ''जेएनयू में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां कोई नई बात नहीं है. ऐसा पहले भी होता था लेकिन तब कोई उंगली उठाने वाला नहीं होता था. जब इनका असल चेहरा देश के सामने आया तो अनाप-शनाप आरोप लगा रहे हैं.''

सौरभ ने कहा, ''जेएनयू की छवि ख़राब हुई इसका दुख हमें भी है, लेकिन यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि स्थापित छवि पर शक करने का मौका किसने दिया. जब वीसी छात्र विरोधी फ़ैसला लेते हैं तो हम भी विरोध करते हैं लेकिन राष्ट्रविरोधी कार्यक्रमों का हम साथ कैसे दे सकते हैं.''

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'बीजेपी और आरएसस को जेएनयू से समस्या'

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष और वामपंथी छात्र संगठन आइसा के नेता मोहित पांडे का कहना है कि जेएनयू की पहचान को एजेंडे के तहत ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है.

वो कहते हैं, ''बीजेपी और आरएसएस के लिए जेएनयू कोई नई समस्या नहीं है. इनके हाथ में सत्ता आई तो यहां भी हिन्दुवादी कार्यक्रमों को लागू करना शुरू कर दिया. कैंपस के भीतर जो एक लोकतांत्रिक स्पेस थी वह सिमट रही है. प्रतिरोध के स्वरों को राष्ट्रवाद के नाम पर दबाया जा रहा है.''

मोहित ने कहा कि वीसी जिस तरह से बिना कोई चर्चा के एकतरफा प्रशासनिक फ़ैसले ले रहे हैं उसका आने वाले वक़्त में यूनिवर्सिटी पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है.

उन्होंने कहा कि पीएचडी और एमफिल में सीटें कम होंगी और यहां की पढ़ाई महंगी हो जाएगी. मोहित की इस बात से जेएनयू की राजनीतिक विज्ञान की प्रोफ़सर निवेदिता मेनन भी सहमति जताती हैं. उन्होंने कहा कि जेएनयू अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है.

हालांकि जेएनयू के प्रोवीसी चिंतामणि महापात्रा ने कहा कि जो भी आरोप लगाए जा रहे हैं उनमें सच्चाई नहीं है. महापात्रा ने कहा कि यहां जो भी बदलाव हो रहे हैं वे नियमों के तहत किए जा रहे हैं.

Image caption जेएनयू में वामपंथी छात्र संगठनों का विरोध-प्रदर्शन जारी

मोदी राज में जेएनयू में हुए ये पांच बड़े बदलाव

  • यूनिवर्सिटी ने पब्लिक मीटिंग के नए नियम बना दिए हैं. जो भी पब्लिक मीटिंग का आयोजन करेंगे उन्हें उसमें भाग लेने वालों की विस्तृत जानकारी देनी होगी. इसमें नाम, मोबाइल नंबर और पता देने की बात है. इसके साथ ही कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग भी की जा सकती है.
  • दिसंबर में जेएनयू ने ऐडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के पास किसी भी तरह के विरोध-प्रदर्शन को बैन कर दिया गया. छात्रों को कहा गया कि विरोध-प्रदर्शन वहां से 20 मीटर की दूरी पर करना होगा. इसे रोकने के लिए एक लोहे का गेट लगा दिया गया.
  • दिसंबर में ही जेएनयू प्रशासन ने फैकल्टी सदस्यों के लिए एक नोटिस जारी किया. प्रशासनिक भवन के पास विरोध-प्रदर्शन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही गई. इस नियम का उल्लंघन करने पर उन शिक्षकों को ख़िलाफ़ जांच के लिए कमेटी बनाई जाएगी.
  • जेएनयू का 24X7 ढाबा पूरी रात खुला रहता था लेकिन अब 11 बजे ही बंद हो जाता है. ब्रह्मपुत्र के पास प्रमोद ढाबा बंद हुआ.
  • कैंपस में योग का आयोजन हुआ और इस साल से आयुष की पढ़ाई शुरू की जा सकती है.

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