नज़रिया: मोदी के ख़िलाफ़ लालू की लालटेन में तेल नहीं

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लगभग डेढ़ साल पहले की बात है. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और कांग्रेस महागठबंधन की सरकार बन रही थी. नीतीश कुमार को उसका नेतृत्व सौंपा जा रहा था.

उस समय राजद के नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की एक घोषणा मीडिया में सुर्ख़ी बनी थी.

उन्होंने कहा था, ''नीतीश जी बिहार संभालें, मैं अब लालटेन लेकर सबसे पहले बनारस जाऊंगा, वहीं से बीजेपी और नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ देशव्यापी मुहिम छेड़ूंगा.''

ऐसा क्या हुआ कि लालू अपने इस बहुचर्चित ऐलान पर अमल नहीं कर पाए ?

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Image caption लालू लालटेन लेकर बनारस गए, पर तब तक काफ़ी देर हो गई

इस बात की याद आज इसलिए आई कि लालू सपा-कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करने बनारस गए थे.

यह सवाल तो उठता ही है कि लालू नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस से बीजेपी विरोधी मुहिम शुरू क्यों नहीं कर पाए ?

पहले से ज़मीन बनी रहती तो आज उनका चुनावी प्रचार ज़्यादा असरदार होता.

अपनी लालटेन (चुनाव चिह्न) को कमंडल की तरह थामे हुए 'लालू बाबा' भोलेनाथ की नगरी में पहले घूमे होते तो बात कुछ और ही होती.

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ख़ैर, ऐसा नहीं हो पाने के कई कारण हो सकते हैं. पहला यह कि उन्हें इस बीच सत्ता की लड़ाई में राजद-जदयू की अंदरूनी तनातनी संभालना पड़ा.

मंत्री बने उनके दोनों बेटे सियासत में इतने सक्षम नहीं हैं कि अपने पिता के बिना जदयू-कांग्रेस जैसे सत्ता-साझीदार के साथ तालमेल बिठा लें.

ख़ासकर तब, जब नीतीश कुमार जैसे कुशल-परिपक्व नेता के हाथ में सत्ता की बागडोर हो.

दूसरा कारण यह है कि नीतीश कुमार देश भर में घूम-घूम कर नरेंद्र मोदी विरोधी ताक़तों को अपने नेतृत्व में एकजुट करने की संभावना तलाशने लगे.

यह और बात है कि इसमें उन्हें अब तक सफलता नहीं मिल पाई है. लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर लालू जी के सक्रिय होने से पहले ही नीतीश सक्रिय हो गए.

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Image caption लालू प्रसाद यादव अपने दामाद और मुलायम सिंह यादव के साथ

अपने परिवार को सियासी हैसियत वाले पदों पर बिठाने में लगे लालू यादव को राष्ट्रीय राजनीति वाली अपनी खोई ज़मीन फिर से हासिल नहीं हो पाई है.

इधर कई ऐसे हालात बने, जब सत्ता-वर्चस्व और ज़मीनी सियासत के सबब लालू और नीतीश आमने-सामने टकराने से बाल-बाल बचे.

नोटबंदी के सवाल पर नरेंद्र मोदी विरोध से नीतीश का मुकरना लालू और कांग्रेस, दोनों को चुभ गया.

लालू यादव और कांग्रेस के दबाव से मुक्त रहने के लिए ही नीतीश कुमार बीच-बीच में अपना भाजपाई रुझान वाला भ्रम फैलाए रखना चाहते हैं.

उधर लालू यादव भी रघुवंश प्रसाद सिंह के ज़रिए नीतीश कुमार पर सियासी हमला करवाते रहते हैं.

यानी जब अपने गठबंधन वाले घर के झगड़े से ही लालू यादव को फ़ुर्सत नहीं है, तब देश भर में बीजेपी विरोधी अभियान वह क्या चलाएंगे ?

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Image caption लालू-नीतीश में दोस्ती बनी हुई है, पर तनाव भी है

इसलिए मौक़ा मिलते ही बयानबाज़ी कर वे संघ-भाजपा के ख़िलाफ़ अपना तीखा तेवर दिखाते रहते हैं. फ़िलहाल वे इसी से काम चला रहे हैं क्योंकि स्वास्थ्य भी तो पहले जैसा नहीं रहा.

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उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए उन्हें जाना पड़ा. नहीं जाते तो राष्ट्रीय हलचल वाली सियासत में अप्रासंगिक मान लिए जाते.

नीतीश कुमार पर आरोप लग रहा है कि इस चुनाव से अपने दल को अलग रख कर वह बीजेपी को परोक्ष लाभ पहुँचा रहे हैं.

लालू यादव इसलिए भी ख़ुद को मुस्लिम-यादव बुनियाद की मज़बूती में प्रासंगिक दिखाने के लिए वहाँ गए.

फिर भी, लालटेन ले कर बनारस जाने वाली उनकी डेढ़ साल पुरानी घोषणा सवाल बन कर उनके सामने आज भी खड़ी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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