गांवों की स्कूली लड़कियां सीख रहीं कानून के पेंच

  • 1 मार्च 2017
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साधारण किसान की बेटी संजोता ने अभावों भरी ज़िदगी को करीब से देखा है. अपने स्कूल में लीगल लिट्रेसी क्लब की सक्रिय सदस्य संजोता, कानून जागरूकता से जुड़ी किताबों को पढ़ने में खासी दिलचस्पी दिखाती है. ख्वाहिश वकील बनने की है और उसे खुशी है कि स्कूल की कई सहेलियां मजबूत बनकर घर- समाज की बेबसी और दकियानुसी पर परदे डालना चाहती हैं.

डायन हत्या, मानव तस्करी, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, बलात्कार को लेकर सुर्खियों में रहने वाले झारखंड के गांवों में स्कूली लड़कियां अब कानून के पेंच सीख रही हैं.

झारखंड के पांच सौ स्कूलों में लीगल लिट्रेसी क्लब खोले गए हैं. राज्य विधिक सेवा प्राधिकार, मानव संसाधन विकास तथा कल्याण विभाग की पहल पर स्थापित क्लबों में इन्हीं विषयों पर तीन दर्जन किताबें उपलब्ध कराई गई हैं.

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ज़िला स्तर पर वकीलों का पैनल है, जो छात्र- छात्राओं को कानून की जानकारी देते हैं.

इन क्लबों में राज्य के 203 कस्तूरबा आवासीय विद्यालयों को भी शामिल किया गया है, जहां आखिरी कतार में शामिल लड़कियों के लिए मुफ्त में छठी से बारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है. जबकि इन स्कूलों में आदिवासी, पिछड़ी, दलित और समुदायों की तादाद काफी हैं.

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Image caption प्रधानाध्यापक अनिता सुमन बाड़ा लिट्रेसी क्लब में लड़कियों को पढ़ाते हुए

झारखंड की राजधानी रांची से करीब तीस किलोमीटर दूर मांडर कस्तूरबा स्कूल जब हम पहुंचे थे, तो स्कूल की प्रधानाध्यापक अनिता सुमन बाड़ा लिट्रेसी क्लब में लड़कियों को पढ़ा रही थीं.

अनिता बताने लगी कि सुदूर गांवों और अनपढ़ मां- बाप की कई लड़कियां चुनौतियों को अवसर में बदलने की कोशिशों में जुटी हैं.

लड़कियों ने बड़ी उत्सुकता के साथ हमें क्लब में मौजूद किताबें दिखाई. कैसा लगता है कानून की पढ़ाई करना, इस सवाल पर, नवीं की छात्रा काजल कुमारी कहती है कि उसने चार- पांच किताबों को ध्यान से पढ़ा है और बाल श्रम का मामला उन्हें खटकता है. वो इसे रोकना चाहती हैं.

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Image caption संजोता

स्कूल की शिक्षिका लिली कुजूर लड़कियों को जानकारी देती हैं कि दूसरी पाली में कानून के जानकार उन्हें पढ़ाने के लिए आने वाले हैं, लिहाजा वे टास्क ठीक कर लें.

लिली बताती हैं कि लिट्रेसी क्लब खोले जाने से लड़कियों के सवाल और ख्यालात बदल रहे हैं.

हाल ही में इन लड़कियों को शिक्षा विभाग की ओर से फिल्म 'दंगल' दिखाई गई है. इस फिल्म ने इन लड़कियों में ऊर्जा भरी है. रांची के शिक्षा पदाधिकारी रतन महावर कहते हैं कि कस्तूरबा की लड़कियों से पूरे महकमे को काफी उम्मीदें हैं और वे लगातार सशक्त हो रही हैं.

दसवीं की छात्रा दीपसूर्या के पिता विकलांग हैं, पर मां ने घर- गृहस्थी संभालते हुए एमए पास किया है.

दीपसूर्या कहती हैं कानून की किताबें पढ़ना अच्छा लगता है और उसे मां की आर्थिक मदद के लिए नौकरी करनी है. उन्हें यह लगता है कि कानून जागरूकता से लड़कियां गांवों की मानसिकता बदल सकती हैं.

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Image caption नमिता कुमारी

इस बीच नवीं की छात्रा नमिता कुमारी ने कहा, "मुझे दीजिए कैमरे, आपकी ज़रूरत की तस्वीरें खींच देती हूं."

नमिता की नज़रें मानव तस्करी से जुड़ी किताबें पर टिकती रही. वजह पूछने पर धीरे से कहा, "मानव तस्करी की जाल से निकालकर उसे इस स्कूल में दाखिला दिलाया गया है."

चाईबासा की रहने वाली इस लड़की के सर से पिता का साया कब उठा, पता नहीं. मां कभी मिलने नहीं आती. ज़िंदगी के इन झंझावातों को वे याद नहीं करना चाहती. उसकी इच्छा पुलिस अफसर बनने की है, ताकि मानव तस्करों को सबक सिखा सकें. नमिता के मुताबिक गांव के ही लोग तस्करी के जरिए लड़कियों की जिंदगी बिगाड़ने पर तुले हैं.

कानून और अधिकारों की किताबों को पढ़कर रानी कुमारी भी मुखर हो चली है. उसने अपने टोले के उस लड़की को स्कूल में दाखिला दिलवाया है, जिन्हें घर वाले बाहर तक नहीं निकलने नहीं देते थे.

रानी के सवाल हैं, " आखिर लड़कियां क्यों नहीं आगे बढ़े और पढ़े."

आठवीं की छात्रा अनवरी ने बाल विवाह प्रतिषेध किताब कई पन्ने जेहन में उतारे हैं. अनवरी ने अब्बा से साफ कह दिया है अठारह साल से पहले शादी बिल्कुल नहीं.

सुमंती अपने टोले की इकलौती लड़की है, जो हाईस्कूल में पढ़ रही हैं. उनका मकसद कानूनी किताबों के ज़रिए लोगों के इरादे बदलने का है.

बातों में कई आदिवासी छात्राओं को डायन हत्या और बलात्कार की घटनाएं विचलित करती रही.

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गौरतलब है कि साल 2015 में मांडर में ही पांच आदिवासी महिलाओं को डायन करार देकर एक साथ हत्या कर दी गई थी.

जबकि पिछले दो सालों में डायन के नाम पर पूरे राज्य में 96 हत्याएं और बलात्कार की 2300 घटनाएं हुई हैं. मानव तस्करी के 237 मामले दर्ज किए गए तथा 173 बच्चों को तस्करी के जाल से निकाला गया है.

आरक्षी महानिरीक्षक, संगठित अपराध संपत मीणा कहती है," बेशक इन मामलों को सुलझाने तथा हालात बदलनें में ये कार्यक्रम भविष्य में कारगर होगा. जन-जागरूकता के ज़रिए ही आदिवासी इलाकों में अंधविश्वास खत्म हो सकते हैं. ये लड़कियां सशक्त होकर घर- गांव की परिस्थतियां बदल सकती हैं."

इस बीच जिला विधिक जागरूकता प्राधिकार से जुड़े वकील नित्यानंद सिंह स्कूल पहुंचते हैं. धूप में दरियां बिछाई जाती है और शुरू होती है पढ़ाई "कैसे दर्ज कर कराएं एफआइआर और कैसे बढ़कर हासिल करें अधिकार."

लड़कियों की आवाज़ें गूंजती हैं इसके लिए हम हैं तैयार....

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