जब एक ब्लाइंड लड़की से लड़के को प्यार हुआ...

  • 5 मार्च 2017
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Image caption निधि गोयल ने एक विकलांग लड़के से प्यार करने का साहस किया तो उन्हें क्या कुछ झेलना पड़ा, उनके अनुभव

अगर किसी विकलांग लड़की से कोई लड़का प्यार करे तो क्या उस लड़की को अपनी भावनाओं को अहमियत दिए बग़ैर उसका प्यार स्वीकार लेना चाहिए क्योंकि वो विकलांग है?

दृष्टि बाधित निधि गोयल के सामने यही सवाल था. पढ़िए उन्हीं की ज़बानी कैसे उन्होंने इसका जवाब ढूंढा.

"मैं नहीं जानती थी कि नए साल की एक पार्टी में केक काटने की साधारण सी घटना मेरी ज़िंदगी में एक नया अध्याय जोड़ देगी. ऐसा अध्याय जो मेरे लिए अहम् बन जाएगा, जिसे मैं कभी नफ़रत,प्यार और कभी खुशी से याद करूंगी. यह पार्टी मेरी कॉलेज की एक दोस्त के घर पर थी और यह केक उसका एक सहकर्मी लेकर आया था.

जब उस सहकर्मी को समझ आया कि मैं देख नहीं सकती तो उसने केक पर लिखे संदेश को पढ़ना शुरू कर दिया. इस पर उसके कुछ दोस्त दबी ज़बान में मेरी विकलांगता की खिल्ली उड़ाने लगे.

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मुझे अहसास हुआ कि उनकी इस बद्तमीज़ी पर उसे गुस्सा आ रहा था. उसने सबको चुप करा दिया और इस तरह हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ.

यह वाकया एक दशक पहले का है, लेकिन ऐसा लगता है कि जैसे यह कल की ही बात हो. आपसी दोस्तों के साथ मिलने-जुलने के एक महीने के अंदर ही, हॉट चॉकलेट के कुछ कप के साथ व़क्त बिताते हुए, उसने पहले इशारे, फिर साफ़ शब्दों में, दोहराते हुए मेरे लिए अपने आकर्षण की बात कह डाली.

पर यह आकर्षण था या प्यार? उसे मैं बुद्धिमान, समझदार, सुंदर और प्यारी लगी. कुल मिलाकर उसने मेरे लिए वो सबकुछ महसूस किया जो एक लड़की अपने साथी से खुद के लिए चाहती है.

ज़िंदगी में रंग भरने वाला दोस्त

फोन पर हमारी लंबी बातें होती थीं और ऐसी ही एक बातचीत में, रात के एक बजे, उसने मुझसे रिश्ता बनाने के लिए पूछ लिया. मैं ख़ामोश रही,'ना' कहने का ये मेरा तरीका था. मुझे लग ही नहीं रहा था कि हमारे बीच वो क़शिश, वो अहसास है.

इसलिए हम कभी दोस्ती से आगे नहीं बढ़े. लेकिन वो एक ऐसा दोस्त था जिसने मेरी ज़िंदगी में कई रंग भरे, और उन अनुभवों को मैं आज भी याद करती हूं.

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मेरे कुछ दोस्त इस बात को नहीं समझ सके कि उसके आकर्षण को मैंने क्यों नहीं अपनाया. आखिरकार, मेरी जिंदगी में ऐसा पहली बार हो रहा था कि एक आदमी ने कहा कि वो मुझ में रुचि रखता है.

वो बिल्कुल भी नहीं समझ पाए कि क्यों मैं एक तथाकथित 'नॉर्मल' या बिना किसी विकलांगता वाले स्वस्थ आदमी का साथ नहीं चाहती थी. उनकी इन प्रतिक्रियाओं ने मुझे परेशान किया और उलझन में डाला.

हाथ-पांव नहीं, फिर भी सफलता के शिखर पर

मैं उसके साथ उस तरह से बातचीत करना पसंद नहीं करती थी, ना ही उसके साथ रहते हुए कोई चाहत महसूस करती थी. वो मेरा जितना भी ख़याल रखे, उसकी दोस्ती से मिलनेवाली ख़ुशी वैसी नहीं थी जैसा मैं एक पार्टनर से उम्मीद करती थी.

मैं उसे अपने दिल की हर बात नहीं बताती थी ना ही हमेशा मेरा साथ देने की उम्मीद रखती थी जैसा मैं एक पार्टनर से चाहती.

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लेकिन क्या मेरे लिए समझौता करना ठीक नहीं होता, जब कोई मुझे 'स्वीकार' करने के लिए तैयार थे? एक दृष्टि-बाधित लड़की होते हुए, क्या मेरे पास सचमुच कोई विकल्प था? क्या मुझे दोबारा कोई और ऐसे चाहेगा?

मेरे आसपास यही बातें, यही पूर्वाग्रह थे, कुछ कहे, कुछ अनकहे. लोग क्या कह रहे थे और क्या बिना कहे समझाना चाहते थे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, मुझे लगता है कि मेरे दिल को जवाब पता थे.

साथ बिता कर ख़ुश था

मुझे लगता है कि मेरे इनकार से उसे ठेस पहुंची, लेकिन या तो वो फिर भी उम्मीद रखता था या वो नहीं चाहता था कि इसकी वजह से हमारी दोस्ती पर कोई असर पड़े. मेरे साथ समय बिताने में ही वो खुश था. वो बराबरी से मेरे साथ बहस करता था.

आधी रात को चुपके से पाव भाजी खाने जैसी हरकतों में भी वो मेरा जोड़ीदार था. जब वो अपने काम की दिक्कतों या अपनी आध्यात्मिक मान्यताओं के बारे में बात करता तब मुझसे बिल्कुल भी कोई अलग व्यवहार नहीं करता.

ना ही तब, जब मैं अपनी महत्वकांक्षाओं और भविष्य की योजनाओं के बारे में उससे बात करती.

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मेरी विकलांगता को स्वीकार करने में वो बहुत ही सहज था. उसने ये कभी नहीं समझा ना जताया कि ये कोई बहुत बड़ी बात है. एक बार, जब हम दोस्तों के साथ एक 'डिस्कोथेक' में थे, मैं मस्त होकर नाच रही थी.

आमतौर पर ऐसी शोरगुल भरी जगह पर दोस्तों के बीच होते हुए भी खुद मैं को अकेला ही समझती हूं, क्योंकि बिना देखे कदमों के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल होता है.

लेकिन मेरे शानदार दोस्त ख़याल रखते हैं और डांस के कुछ हिस्सों में स्पर्ष के ज़रिए मुझे अपने साथ शामिल करते हैं और उस रात उसने भी ये किया.

लेकिन उस रात उसने ऐसा कुछ किया जो बाक़ि जान भी नहीं पाए. वो हर दस मिनट में मेरा हाथ थाम लेता था. मैं कहूंगी कि ये आंखों से एक-दूसरे को इशारा करने जैसा था, सिर्फ़ ये कहने के लिए कि,'मैं यहीं हूं'.

उसने मुझे कम नहीं समझा

वो मुझसे उम्र में बड़ा था और एमबीए था. उसे कोई विकलांगता भी नहीं थी. वो एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था जबकि मैं एक पोस्टग्रेजुएट स्टूडेंट के तौर पर संघर्ष कर रही थी.

लेकिन उसने कभी इसे जताया नहीं ना ही कभी मुझे कम समझा. वैसे मैं उसे ऐसा करने भी नहीं देती. उसे मेरे साथ यूंही व़क्त बिताना पसंद था वैसे ही जैसे वो अपने किसी 'नॉर्मल' दोस्त के साथ बिताता.

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एक दिन उसने कहा कि वो मुझे गाड़ी में घुमाते-घुमाते थक गया है और ये कि अब गाड़ी चलाने करने की बारी मेरी है. मैंने समझा कि वो मज़ाक कर रहा है पर उसने सचमुच मेरे हाथ में'स्टीयरिंग' थमा दिया.

क्या वाकई वो मुझे अपने पहले प्यार -अपनी कार- की ज़िम्मेदारी दे रहा था? इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती, उसने 'ड्राइविंग' के बारे में निर्देश देने शुरू कर दिए और मैं उन पर अमल करने लगी. भले ही वो सड़क खाली और सीधी थी, पर बिना दृश्टि के 'ड्राईविंग' का अनुभव अद्भुत था.

वक्त के साथ हमारी दोस्ती बढ़ी और परिपक्व हुई. शायद मेरे प्रति उसका प्यार और गहरा होता गया. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, उसने जैसा समझा था उससे उलट, ये साफ हो गया कि मैं उसे पार्टनर नहीं बनाना चाहती थी.

उसकी ज़िद उसके घर पर भी दिखी होगी, क्योंकि उसकी मां हमारे बीच बढ़ती दोस्ती को लेकर बहुत नाराज़ थीं.

अस्तित्व पर सवाल

उसने उनकी ये नाराज़गी मुझसे साझा की. लेकिन इससे दुखी होने या असहज महसूस करने के बजाय मैं खुशी से मुस्करा रही थी.

किसी को मेरा यह रवैया ख़राब लग सकता था पर ये पहली बार था जब एक लड़के की मां ने सोचा कि उसका बेटा मेरे प्रेम में भी पड़ सकता है. और मैं महज़ एक विकलांग बेस्ट फ़्रेंड नहीं हूं जिसका मानो कोई 'जेंडर' ही ना हो.

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Image caption ये तस्वीर निधि गोयल के जीवंत अंदाज़ को दर्शा रही है

तबतक उसके परिवार ने तय कर लिया था कि उसकी शादी हो जानी चाहिए. मेरे इनकार के बावजूद, उसने उनके सामने मुझे जीवनसाथी बनाने की इच्छा जताई. इसके बाद जो हुआ वो शायद उम्मीद के मुताबिक ही था पर मुझे बहुत दर्द दे गया.

मैं उसे प्यार नहीं करती थी पर जब उसके मां-बाप ने मुझे नापसंद किया तो मुझे बहुत ठेस लगी. इनकार की वजह से नहीं, इनकार के कारण की वजह से. वो मुझे पसंद करते थे और मुझ में वो सब गुण थे जो वो अपनी बहू में चाहते थे.

लेकिन उनके लिए उनके बेटे का एक विकलांग लड़की से शादी करना सोच के भी परे था. वो मान के चल रहे थे कि मैं एक बोझ साबित होऊंगी और वो अपने बेटे को हमेशा के लिए देखरेख की ऐसी ज़िम्मेदारी की बेड़ी नहीं पहनाना नहीं चाहते थे.

उनके इनकार से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था, क्योंकि इनकार तो मैंने भी किया था. लेकिन उस व़क्त एक 24 साल की लड़की को जिस बात ने तोड़ दिया वो थी उनके इनकार की वजह.

मैं अच्छी तरह जानती थी कि विकलांग लड़कियों की शादी के बारे में समाज में कैसी सोच थी, लेकिन इस बार यह मेरी सच्चाई थी और यह सच्चाई मुझे चुभ रही थी.

साथ आना सही नहीं होता

शायद, इस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा ठेस पहुंचाई कि उसने तब हठ पकड़ा जब मैंने 'ना' कहा पर उस समय नहीं जब उसके मां बाप ने मेरे बारे में ग़लत धारणाएं बनाईं.

इसने मुझे ये सोचने पर मजबूर किया कि आख़िर में उसने मेरे साथ कितनी बराबरी के साथ व्यवहार किया!

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इस घटना को सात साल बीत चुके हैं और हम अब भी संपर्क में हैं. कभी स्नेह के साथ और कभी असहजता से हम अब भी 'हॉट चॉकलेट' पीते हुए उन दिनों को याद करते हैं.

लेकिन अब हम दोनों जानते हैं कि हमारा साथ आना सही नहीं होता. उसकी ओर मेरी भावनाओं का मेरा शुरुआती आंकलन ही सही था और शुक्र है कि मैं लोगों के दबाव में नहीं आई.

जहां तक उसका सवाल है आज वो भी ये मानता है कि हमारा मेल ठीक नहीं होता क्योंकि उसने कल्पना नहीं की थी कि सात सालों में ऐसी सशक्त महिला बन जाऊंगी.

लेकिन इनकार का वो पहला सबक भूलाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. इसलिए नहीं कि उस लड़के ने मुझे पसंद नहीं किया, बल्कि इसलिए कि मेरी विकलांगता से जुड़ी ग़लत धारणाओं को बाक़ी सब बातों से ज़्यादा अहमियत दी गई."

(ये ब्लॉग पहले 'सेक्सुआलिटी एंड डिसएबिलिटी' पर छपा था.)

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