लंदन- न्यूयॉर्क नहीं, बेगूसराय- बनारस की धूम

  • 2 मार्च 2017

न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस की शान-ओ-शौकत से चौंधियाया हुआ बॉलीवुड अचानक आरा, बरेली और अलीगढ़ जैसे छोटे शहरों की ख़ाक छानता नज़र आ रहा है.

सलीम की 'अनारकली' अब आरा में जलवाफ़रोज़ है, तो कल तक बरेली में झुमका ढूंढ रही हसीनाएं अब 'बरेली की बर्फी' पर फ़िदा है.

फ़रहान अख्तर का दिल अब 'लखनऊ सेन्ट्रल' पहुंचना चाहता है.

बॉम्बे, कोलकाता, दिल्ली और गोवा जैसे शहर में लोकेशन ढूंढने वाले फिल्ममेकर्स अब नक़्शे में बनारस, बेगूसराय, सज्जनपुर और वासेपुर खोज रहे हैं.

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क्या हिंदी सिनेमा की सुई ने दिशा बदल ली है ? आख़िर ऐसी क्या वजह है कि विदेशी लोकेशनों और फ़िल्मी टाइटल पर अब हमारे छोटे शहर के नाम, किरदार और जीवन शैली हावी होती नज़र आ रही है?

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स्वरा भास्कर की फ़िल्म 'आरा की अनारकली' के निर्देशक अविनाश दास के मुताबिक़, "सिनेमा की सुई उल्टी दिशा में नहीं बल्कि सही दिशा में घूम रही है. हिंदी सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने वाले फ़िल्ममेकर्स ने हमेशा छोटे शहरों को उपेक्षित रखा. महानगरों से जी भर गया तो विदेशों में घूमने लगे. 'लव इन पेरिस', 'सिंगापुर' टाइटलवाले जिस सिनेमा को भारतीय सिनेमा के नाम पर बेचा जा रहा था उसमें भारतीयता थी ही कहाँ ? बॉलीवुड में अब छोटे शहरों से आए फ़िल्ममेकर्स का वर्चस्व बढ़ रहा है. ज़ाहिर है हम तो अपनी ही देश-दुनिया की बात कहेंगे. टाइटल के ज़रिए हम हर शक-सुबहे की गुंजाईश ही ख़त्म कर देते हैं."

हिंदी सिनेमा का बड़ा दर्शक वर्ग अब भी छोटे शहरों में ही बसता है. लेकिन फ़िल्मों की दिशा तो बड़े शहरों के फ़िल्मेकर्स और दर्शक ही तय करते हैं.

कारोबारी नज़रिए से भी इन दर्शकों को ही अहम माना जाता है. तो क्या छोटे शहरों की कहानी एक कारोबारी जोखिम साबित हो सकता है ?

Image caption फ़िल्म 'बुलेटराजा'

'हासिल', 'बुलेटराजा' और 'पानसिंह तोमर' जैसी फ़िल्में निर्देशित करने वाले तिग्मांशु धुलिया के मुताबिक़, "महानगरों का सिनेमा ही हिंदी सिनेमा नहीं है. अब तक उनके पास विकल्प ही नहीं था. सच तो ये है कि लोग छोटे शहरों की कहानियों को पसंद कर रहे हैं, इसलिए ऐसी फ़िल्में बन रही हैं."

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सिनेमा की फ़ितरत 'लार्जर देन लाइफ़' वाली रही है. लोग परदे पर अपनी फैंटेसी की ताबीर होते देखना चाहते हैं. जीवन की मुश्किलों से उकताया हुआ आदमी अगर परदे पर भी अपने शहर की वही किचकिच देखेगा तो क्या उन्हें रास आएगा ?

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इस सवाल पर 'निल बटा सन्नाटा' की निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी कहती हैं, "सिनेमा का मिज़ाज बदल रहा है. लोग अब सिनेमा में अपनी पहचान ढूंढ़ना चाहते हैं. सपने और हकीकत के बीच के फ़र्क को आज के दर्शक बखूबी समझते हैं. दरअसल ये दर्शकों का दबाव ही है कि आज बॉलीवुड ऐसी फ़िल्में बनाने के लिए बाध्य है."

अश्विनी अय्यर तिवारी इन दिनों 'बरेली की बर्फी' की तैयारियों में जुटी हैं.

बॉलीवुड में अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धुलिया, आनंद एल राय जैसे कई फ़िल्मकार इस नई सिनेमाई धारा की बहुत पहले से ही वकालत करते रहे हैं.

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Image caption फ़िल्म 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया'

इन निर्देशकों ने जो ज़मीन तैयार की उसका आकर्षण और दर्शकों का दबाव ही है कि अब करण जौहर जैसे निर्मातों को भी अपना जौहर दिखाने के लिए 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' का सहारा लेना पड़ रहा है?

फ़िल्म विशेषज्ञ अजय ब्रहात्मज कहते हैं, "हिंदी सिनेमा का मौजूदा ट्रेंड कोई नया नहीं है. गाँव और छोटे शहर ही इस सिनेमा के उद्गम स्थल रहे हैं. बीच में सिनेमा को विदेशी भारतीयों से जोड़ने की कोशिशें शुरू हुई तो चलन बदल गया. आज सिनेमा फिर से अपनी जड़ों में खाद पानी तलाश रहा है.

वजह जो भी हो हकीकत यही है कि दर्शकों का सर्वहारा वर्ग अब सिनेमा की दिशा तय करने की हैसियत हासिल कर चुका है.

छोटे शहरों की कहानी और टाइटल उनकी इसी नई सत्ता को दिखाते हैं.

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