दीदी का ढाबा जहां एक बार खाएं, बार-बार आएं

  • 2 मार्च 2017
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"अब तमाम आशंकाएं पीछे छूट गई हैं. अच्छा लगता है, हौसले-हुनर के बूते घर-परिवार की ज़िंदगी बदल रही है."

"वक्त को लेकर दिन- रात और काम को लेकर आपस में कम-बेसी का फ़र्क नहीं करते. हमारी प्राथमिकता है एकजुट रहें और यहां जो एक बार खाए, वो बार-बार आए."

फिर मुस्कराते हुए पूनम कहती हैं, "झोल (रसा) वाली मछली चख न लीजिए. मसाले में देहाती सरसों जो डाली है."

इस सफ़र में पूनम अकेली नहीं. गांव की चार आदिवासी महिलाएं हैं जिनके दम पर तीन महीने पहले खुला दीदी का ढाबा चल निकला है.

वो गांव जहां बेटियां ही पहचान हैं!

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झारखंड की राजधानी रांची से क़रीब 25 किलोमीटर दूर कुटे बस्ती के पास दो नेशनल हाइवे को जोड़ने वाली पक्की सड़क के किनारे यह ढाबा खाने के शौक़ीनों को लुभाता है. साथ ही दूसरे इलाके की आदिवासी महिलाओं के बीच इसी काम से जुड़ने का रूझान बढ़ने लगा है.

रंगे हुए बांस और टाली खपड़ों से होटल की सुंदर डिज़ाइन की गई है. अंदर रंग-बिरंगे परदे टंगे हैं. हालांकि होटल के सामने बोर्ड पर अंग्रेज़ी में दीदीज़ कैफे के नाम से बोर्ड टंगा है, लेकिन लोगों के बीच ये दीदी का ढाबा के नाम से ज़्यादा लोकप्रिय है.

कर्ज़ लेकर शुरू किया कारोबार

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Image caption पूनम अपने ढाबे में फ़िश करी तैयार कर रही हैं

इन महिलाओं ने डेढ़ लाख का कर्ज़ लेकर इस कारोबार को स्थापित किया है. यहां शराब, सिगरेट पीने तथा अड्डे जमाने की सख़्त मनाही है. लिहाजा ट्रक, बस वाले बहुत कम रूकते हैं.

पूनम ने दसवीं तक पढ़ाई की है. ढाबा खोलने के ख़्याल पर बताती हैं कि वो कुछ लोगों के साथ गांव में स्वयं सहायता समूह चलाती हैं तथा सरकार के आजीविका कार्यक्रम से जुड़ी हैं. समूह से जुड़ी महिलाओं के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. पति मजदूरी करते हैं.

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उसके बाद वो पंचायत की बैठक या गांवों में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों के लिए वो महिलाएं नाश्ते- भोजन का ऑर्डर लेने लगीं. इसके लिए घर के बर्तनों का इस्तेमाल करतीं और कई मौके पर लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकातीं.

अक्सर डर रहता कि कई साहब भी आने वाले हैं, खाना ठीक से तैयार होगा या नहीं. लेकिन उनकी वाहवाही होती तो हाथों को गौर से देखतीं कि क़िस्मत की लकीर ज़रूर बदलेगी.

सरकार के आजीविका कार्यक्रम से जुड़ीं स्टेट रूरल पर्सन सीमा तिर्की और कुछ महिला अधिकारियों ने गांव की देहरी से बाहर निकलने को प्रेरित किया. पैसों का इंतज़ाम कैसे होगा इसके रास्ते बताए. सीमा बगल के मठटोली गांव की रहने वाली हैं और उन्होंने इंटर तक पढ़ाई की है. ये लोग भी दीदी के नाम से जानी जाती हैं.

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Image caption दायीं ओर प्रतिमा तिर्की, बीच में पूनम और बायीं ओर बुलबुल तिर्की

सीमा बताती हैं कि शुरू के दिनों में डगर कठिन था, लेकिन अब इन दीदियों के जलवे देखकर कई जगहों की आदिवासी महिलाएं इस काम से जुड़ने की पेशकश कर रही हैं. हाल ही में आदिवासी इलाके लिट्टीपाड़ा में आदिवासी महिलाओं ने कैफ़े खोला है. उनके गांव की आदिवासी महिलाओं ने रांची के एक बड़े मॉल में भी कैफ़े खोला है.

दूसरी महिलाओं को भी मिला रास्ता

हम किचन के अंदर गए. चिकन (कड़ाही) की सोंधी महक ने एकबारगी हमें ललचा दिया. इन महिलाओं के हाथ और अंदाज़ इतना सधा है कि बर्तन धोने, खाना पकाने, ग्राहकों को परोसने, पैक करने से लेकर रजिस्टर पर बिक्री, खर्च का हिसाब एक साथ निपटाती हैं.

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क्या सिर्फ नानवेज बनाती हैं. इस सवाल पर वे एक साथ बोल पड़ती हैं- ''ना- ना, झारखंडी व्यंजनों को कैसे छोड़ दें. वही हमारी पहचान हैं. मसलन चावल का धुसका, छिलका, मड़ुआ पीठा, उरद दाल के बर्रे.'' इडली-सांभर भी उन्हें भाता है. वो बताने लगीं कि कोल्हान की आदिवासी दीदियों ने केरल में आयोजित इंडिया फूड फ़ेस्टीवल में झारखंडी व्यंजनों के बूते ही परचम लहराया है.

ग्राहकों की संख्या कम होने के सवाल पर बुलबुल तिर्की बताती हैं कि रविवार है, स्थानीय लोगों का आना- जाना कम है और इस दिन ऑर्डर का काम ज़्यादा होता है.

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Image caption दीदी ढाबा में ग्राहकों को खाना सर्व करती हुई बुलबुल तिर्की

सामने में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआरपीएफ) का कैंप है. लिहाजा दूसरे राज्यों के जवान और अधिकारी भी आदिवासी महिलाओं के हाथों के बने कई किस्म के व्यंजन का स्वाद लेते रहे हैं.

मुकेश सिंह इस ढाबे के नियमित ग्राहक हैं. वे बताने लगे, "बर्तनों की साफ- सफाई और इनकी मीठी बोली बहुत भाती है. फिर बीस रुपए में चार रोटियां, दाल-सब्ज़ी कौन खिलाएगा."

घर का काम और ढाबा संभालना इन दोनों कामों में कैसे तालमेल बैठाती हैं - यह पूछने पर बुलबुल बताती हैं, ''चार बजे भोर में जग जाती हूं. घर का काम पूरा करना, बच्चों को स्कूल भेजना और फिर नौ बजे तक यहां पहुंचना. घर वापस होते रात के आठ नौ बज जाते हैं. रोज़ाना दो सौ रुपए की मज़दूरी पर एक ग्रामीण पुरूष को काम दे रखा है जो रात में यहां रहते हैं और दूसरे काम में भी साथ देते हैं.

कारोबार में डर कैसा?

वो बताने लगीं कि चीज़ों के दाम ज़्यादा रखना दिल को गंवारा नहीं होता. क्या सोचेंगे गांव वाले. पांच से छह हज़ार रुपए महीने की कमाई सभी दीदियों को हो जाती है. वो कहती हैं कि जब कर्ज़ ख़त्म हो जाएगा, तब यह हिस्सा ज़्यादा हो सकता है.

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Image caption रांची के ग्लैक्सिया मॉल तक पहुंच गया है दीदी कैफ़े

गांव के दकियानुसी ख़्याल और फिर दिन भर पुरूष ग्राहकों का सामना आसान नहीं होता है.

प्रतिमा कहती हैं कि उनके पतियों ने बहुत साथ दिया है. गांव वाले अक्सर यहां से व्यंजन ले जाते हैं. ग्राहकों के साथ वे निहायत भद्रता से पेश आती हैं. फिर क्यों कोई परेशान करेगा. सच यह भी है कि वे डरती नहीं हैं.

दूसरे दिन हम राजधानी के ग्लैक्सिया मॉल के दीदी कैफ़े पहुंचे. आदिवासी महिला मंजूषा तिर्की और भग्यमणि ढेर सारे पकौड़े तैयार कर रही थीं. बताया कि 75 लोगों के लिए ऑर्डर मिला है.

क्या आप इन दमदार औरतों को जानते हैं?

वे बताने लगीं, ''पूनम दीदी ग्रुप का ढाबा देखकर उनलोगों ने शहर की ओर बढ़ने का फ़ैसला लिया. इस कैफे में इडली, स्नैक्स, टॉफी, चाय, कॉफ़ी, मोमो, मटर की कचौरियां भी उपलब्ध होती हैं. हालांकि मॉल में कैफ़े का किराया, बिजली बिल, सफ़ाई का ख़र्च कठिन है. फिर रोज़ साठ किलोमीटर का सफ़र करना होता है. कभी मन घबरा जाता है, लेकिन तेज़ी से खुद को संभालती हूं.''

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Image caption मंजूषा तिग्गा अपने कैफ़े में ग्राहकों के ऑर्डर लेती

ग़रीबी और बेबसी के पलों की चर्चा करते हुए मंजूषा रूआंसी हो जाती हैं. वो बताती हैं कि अब थोड़े हालात बदले हैं. पति गोपाल तिग्गा का हर क़दम पर साथ मिलता है तभी हिम्मत रहती है.

कई युवा इनके हाथों के बने पकौड़े, मोमो, मटर भरी कचौरियां के मुरीद हैं. दीनानाथ गुप्ता बताते हैं, ''गांवों की ये आदिवासी महिलाएं वाक़ई सफ़लता की नई कहानियां लिख रही हैं. कुछ भी खाएं, लगेगा घर की मां- बहनों ने बनाया है. ''

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