रामजस विवाद: वामपंथियों से क्या नाराज़ हैं छात्र?

  • 2 मार्च 2017

दिल्ली विश्वविद्यालय में आज अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की बड़ी रैली और भारत के झंडों के बीच में कई और पोस्टर्स भी दिखे.

रामजस कॉलेज में पिछले हफ़्ते जेएनयू के छात्र उमर ख़ालिद के भाषण और उनके जैसे अन्य 'देश-द्रोही' आवाज़ों के ख़िलाफ़ एबीवीपी ने ये 'सेव डीयू' रैली निकाली थी.

ख़ास रैली के दिन लगाए गए इन पोस्टर्स में कई बेहद विचलित करनेवाली तस्वीरें थीं जिनमें ख़ून से लथपथ एबीवीपी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता थे और ऊपर लिखा था 'वामपंथी हिंसा'.

कई और पोस्टर्स भी लगाए गए थे जिनपर लिखा था, "देश 1947 से आज़ाद है पर वामपंथियों की सोच से नहीं."

एबीवीपी के प्रदर्शन से फेसबुक लाइव

उमर ख़ालिद से बातचीत

वामपंथियों से एबीवीपी की राजनीतिक दुश्मनी समझ में आती है पर कैंपस में कई ऐसे छात्रों से मुलाक़ात हुई जो खुद को 'न्यूट्रल' बताते रहे और वामपंथियों से नाराज़गी जताते रहे.

कई को इस बात से परेशानी थी कि अपने ही देश से आज़ादी की मांग की जा रही है.

संचिता ने कहा कि, "अभिव्यक्ति की आज़ादी तो ज़रूरी है पर उसकी आड़ में भारत के विरोध में नहीं बोलना चाहिए, देश की राजधानी में देश के ख़िलाफ़ नारे नहीं लगाने चाहिए."

ये एक बात बार-बार दोहराई गई.

एबीवीपी के हिंसा का सहारा लेने की और भाषण देने से उमर ख़ालिद को रोकने की निंदा तो हुई पर देशभक्ति का ये रूप भी ख़ूब ज़ाहिर हुआ.

निखिल ने बताया कि वो एक सैनिक के परिवार से हैं, इसलिए उन्हें ये और चुभता है.

वो बोले, "एक टीवी चैनल की बहस में एक प्रोफ़ेसर से कहा गया कि वो बस इतना कह दें कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग हैं पर उन्होंने ये कहने से मना कर दिया, आप बताइए ये इतना मुश्किल क्यों हैं?"

कुछ दिन पहले जब मैं पुलिस हेडक्वार्टर के सामने किए जा रहे प्रदर्शन में उमर ख़ालिद से मिली तो उनसे पूछा था कि बस्तर और कश्मीर के लिए कैसी आज़ादी के नारे लगाए जा रहे हैं?

उमर ने कहा, "पढ़ने-लिखने, भूख मिटाने, रोज़गार औऱ सुरक्षा की आज़ादी की मांग कर रहे हैं हम, जो सब हमें दिल्ली जैसे शहरों में मिली हुई है पर इन इलाकों में ये तक नहीं है."

पर ये बताने के बाद भी छात्र अपनी बात पर अड़े रहे.

निखिल के मुताबिक ये अलगाववादियों की सोच है, "वही कश्मीर में है, वही जेएनयू में हैं और वही ये यहां करने की कोशिश रहे हैं."

एक रिसर्च स्कॉलर ने कहा कि जहां बहुसंख़्यक हैं वहां अल्पसंख़्यक को आवाज़ उठाने नहीं दिया जाता रहा है, इसीलिए अब ये ग़ुबार निकल रहा है.

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, "भारत का इतना जाना-माना शोध संस्थान, नेहरू मेमोरियल एंड लाइब्रेरी में पिछले 40 साल में दक्षिणपंथी विचारधारा वाले किसी प्रोफेसर को आने नहीं दिया गया है."

वामपंथ को राष्ट्रवाद और देशहित से एकदम अलग देखा जा रहा था.

हैदराबाद से दिल्ली पढ़ाई करने के लिए आए बी. साईचरन ने कहा कि वो राष्ट्रवाद के हक़ में हैं इसलिए वो एबीवीपी की रैली का समर्थन कर रहे हैं.

वो बोले, "क्या ज़रूरत है ऐसे व्यक्ति को कहीं बोलने के लिए न्योता देने कि जो 'धोखेबाज़' है, जिसके ख़िलाफ़ कोर्ट में देश-द्रोह का मामला चल रहा है, जिसे 'फ़ंगल इंफ़ेक्शन' कहा गया है."

पहले से गर्म माहौल में ख़ून से लथपथ पोस्टर लगाना क्या भावनाएं भड़काने की कोशिश है?

जब मैंने ये सवाल रैली की अगुवाई कर रहे एबीवीपी के 'नेशनल मीडिया कोऑर्डिनेटर' साकेत बहुगुणा के सामने रखा तो उन्होंने इनकार किया.

वो बोले, "हम पर जो हिंसा का तमगा लगाया जा रहा है ये उसपर सफ़ाई देने की कोशिश है, हम केरल और बंगाल की ये तस्वीरें लगाकर दिखा रहे हैं कि जहां भी वामपंथी सरकार में हैं वो ही हिंसा करते हैं."

पर तनुका सेन को ऐसा नहीं लगता, वो बोलीं, "ऐसे पोस्टर लगाकर वो सिर्फ़ ये दिखा पा रहे हैं कि वो किस तरह की हिंसा में लिप्त हो जाते हैं, हिंसा से हिंसा ही बढ़ती है और इस सबको अभी नहीं रोका गया तो ये इसी दिशा में बढ़ता जाएगा."

Image caption तनुका सेन

साफ़ हो रहा था कि ये अनुमान लगाना ग़लत होगा कि हर छात्र जो वामपंथ के ख़िलाफ़ हैं वो दक्षिणपंथ के साथ है.

मैं निकलने लगी को एक छात्रा पर्सिस शर्मा ने कहा, "राष्ट्रवाद कोई टैग नहीं जिसे किसी एक पार्टी के साथ जोड़ा जा सके, चाहे कोई नक्सलवादी हो या कुछ और, हर कोई राष्ट्रवाद का समर्थक हो सकता है, वंदे मातरम का नारे लगाने से या तिरंगा फ़हराने से ही राष्ट्रवादी नहीं बन जाते."

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