विवेचना: श्रीलंका में भारतीय सेना का वो नाक़ामयाब ऑपरेशन

  • 4 मार्च 2017
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
किन परिस्थितियों में भारतीय कमांडो ने महिला पर गोली चला दी.

भारतीय सेना में एक रवायत है कि वहाँ जब कमांडोज़ को ट्रेन किया जाता है तो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने के सभी गुरों के साथ-साथ सांप को मार कर खाना भी सिखाया जाता है. ऐसा विश्वास है कि अगर एक कमांडो ने सांप को मार कर खा लिया, तो वो इस दुनिया में कुछ भी कर सकता है.

11 अक्तूबर 1987 की रात पलाली, श्रीलंका में मौजूद 10 पैरा कमांडोज़ को जाफ़ना विश्वविद्यालय में एलटीटीई के मुख्यालय पर नियंत्रण करने की ज़िम्मेदारी दी गई. उड़ान भरने से पहले सभी कमांडोज़ ने अपना युद्ध नारा, 'दुर्गे भवानी की जय' लगाया और रात 1 बजे दो एमआई हेलिकॉप्टरों ने 50 सैनिकों के साथ जाफ़ना के लिए उड़ान भरी.

रूसी स्कीयर को बचाया भारतीय सेना ने

भारतीय सेना के स्टार अफ़सर थे जनरल जैकब

वो मात्र 200 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे थे. अभियान को गुप्त रखने के लिए हेलिकाप्टर्स की सारी बत्तियाँ बुझा दी गई थीं. 'मिशन ओवरसीज़-डेयरिंग ऑपरेशन ऑफ़ द इंडियन मिलिट्री' के लेखक और इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के सह संपादक सुशांत सिंह बताते हैं, "एक फ़ौजी टर्म होता है पाथ फ़ाइंडर. पैरा कमांडर्स को पाथ फ़ाइंडर की भूमिका दी गई थी. मुख्य भूमिका सिख एलआई को दी गई थी. पाथ फ़ाइंडर का काम होता है कि उस जगह पर उतर कर उसे मार्क करें और बताएं कि ये जगह उतरने के लिए ठीक है."

तेज फ़ायरों से मुक़ाबला

"दो-दो की कड़ी में चार हेलिकॉप्टरों को वहाँ उतरना था. जब पहले दो हेलिकॉप्टर उतरने लगे तो उनकी तरफ़ तेज़ फ़ायर आया लेकिन वो हेलिकाप्टर्स की आवाज़ में सुनाई नहीं दिया. लेकिन जब उन्होंने दूसरे हेलिकॉप्टर्स के लिए रोशनी करने की कोशिश की तो उनपर इतना तेज़ फ़ायर आया कि उन्होंने ऐसा करने का इरादा छोड़ दिया."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"इसकी वजह से जब हेलिकॉप्टर्स की दूसरी टीम आई तो उन्हें दिखा ही नहीं कि उन्हें उतरना कहाँ है. उन्होंने वापस जाने का फ़ैसला किया. उन हेलिकॉप्टर्स पर 53 कमांडोज़ सवार थे. जब ये कुछ समय बाद वापस आए तो इन पर इतनी ज़बरदस्त गोलीबारी हुई कि हेलिकॉप्टर्स में बड़े-बड़े छेद हो गए. बाद में गिना गया कि उस हेलिकॉप्टर में 17 छेद थे, लेकिन वो इसके बावजूद सिख एलआई के 31 जवानों को वहाँ उतारने में सफल हो गए."

जैसे ही पहला हेलिकॉप्टर सतह के 10 मीटर ऊपर आया, सभी कमांडोज़ रस्सी के सहारे नीचे उतरने लगे. लेकिन जैसे ही कैप्टेन रनबीर भदौरिया नीचे कूदे उनका पैर लटकी हुई रस्सी में फंस गया. इस समय सीतापुर में रह रहे भदौरिया बताते हैं, "एयरबॉर्न ऑपरेशन में परंपरा है कि सबसे सीनियर व्यक्ति सबसे पहले नीचे छलांग लगाता है. हेलिकॉप्टरों के तेज़ चलते पंखों की वजह से उतरने वाली रस्सी मेरे पैरों में लिपट गई. मेरी पीठ के ऊपर मेरा पैक था जिसमें मेरा कमांडो डैगर था. लेकिन मैं उसे निकाल नहीं सकता था. मैं देख रहा था कि हमारे 35 आदमी नीचे उतर गए थे."

प्रभाकरण का ठिकाना

"जब अंतिम आदमी उतरने लगा तो मेरे पास सिर्फ़ दो ही विकल्प थे कि मैं रस्सी के सहारे हेलिकाप्टर में वापस चला जाऊँ या रस्सी पकड़े-पकड़े ही वापस बेस पर पहुंच जाऊं. मैंने सोचा मेरे साथी सोचेंगे कि साहब सबसे पहले तो नीचे कूदे, लेकिन फ़ायर से डरकर अंदर चले आए. मैं बहुत दुविधा में था कि क्या करूँ. लेकिन तभी ऊपर वाले ने मेरी मदद की और मेरे पैरों में लिपटी रस्सी निकल गई और मैं नीचे उतर गया."

उड़ी: 'जहां पत्थर हटाकर पाक सैनिक बचाए'

जिस दुश्मन की बहादुरी की कायल थी ब्रितानी फ़ौज

मेजर शेओनान सिंह और उनके साथी उस इलाके में बढ़ने लगे जहाँ अनुमान था कि प्रभाकरण अपने साथियों के साथ मौजूद था. रास्ते में उन्हें एक अलग-थलग घर दिखाई दिया. उन्होंने जब दरवाज़ा खटखटाया तो स्थानीय पॉलिटेक्निक में पढ़ाने वाले एक प्रोफ़ेसर ने दरवाज़ा खोला.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उन्होंने उनसे पूछा कि प्रभाकरण का ठिकाना कहाँ हैं. उस प्रोफ़ेसर ने उन्हें चेताया भी कि प्रभाकरण हमेशा 100-150 लोगों से घिरे रहते हैं. उनके सैनिक उनसे पार नहीं पा पाएंगे. मेजर शेओनान ने प्रोफ़ेसर से कहा कि वो उन्हें वहाँ पहुंचने का रास्ता बताएं. उन्होंने उनके दामाद को बंधक बना लिया और उनसे कहा कि वो उन्हें एलटीटीई के मुख्यालय की तरफ ले चले. उनके पीछे एक कमांडो को लगा दिया गया और साफ़ कर दिया गया कि अगर उनपर गोली चलाई जाती है तो वो उनके दामाद को गोली से उड़ा देंगे.

मेजर शेओनान सिंह बताते हैं कि अभी वो कुछ ही दूर गए होंगे कि उनपर तीन तरफ़ से गोलियाँ बरसने लगीं. प्रोफ़ेसर के दामाद के सिर पर राइफ़ल ताने कमांडो ने ट्रिगर दबाया और दामाद वहीं ढेर हो गया.

वो ख़ूनी संघर्ष

सुशांत बताते हैं कि जब भारतीय सैनिक पिरमपडी लेन में पहुंचे तो एक तमिल लड़ाका एक घर से निकलकर अचानक उनकी तरफ बढ़ा. जब वो सिर्फ़ तीन फ़ीट की दूरी पर था, शेओनान ने उस पर फ़ायर किया और उनकी पूरी वर्दी उसके ख़ून से तरबतर हो गई.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इसके बाद कैप्टेन रनवीर भदौरिया के साथ एक ऐसी घटना हुई जिसने उन्हें हिलाकर रख दिया. जब वो एक घर में घुसे तो उसकी रसोई में एक महिला अपने दो साल के बच्चे के साथ खड़ी थी. भारतीय कमांडोज़ ने रेफ़्लेक्स एक्शन में फ़ायर किया जिसमें वो महिला मारी गई. भदौरिया उसे दो साल के बच्चे पर गोली नहीं चला सके क्योंकि उन्हें अपना बेटा याद आ गया जिसकी उम्र भी करीब-करीब उस बच्चे जितनी ही थी. लेकिन उनके साथ चल रहे एक सैनिक ने उस बच्चे को हमेशा के लिए सुला दिया.

कर्नल रनवीर भदौरिया याद करते हैं, "जब एक बार फ़ायर खुल जाता है तो आदमी देखता नहीं कि किधर गोली जा रही है. मेरी तो हिम्मत नहीं हो रही थी कि किसी को मारो. मैं बाहर की तरफ़ निकल आया. जब मैं वापस गया तो वो बच्चा मरा हुआ था. जंग में ये सब चीजें हो जाती हैं जिसका दुख हमेशा रहता है. कई बार अकेले बैठ कर उस घटना के बारे में सोचता हूँ, लेकिन कई बार गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है."

भारतीय सैनिकों की हार

साढ़े दस बजे के आसपास भारतीय सैनिकों पर विश्वविद्यालय के मैदान से एमएमजी फ़ायर आने लगा. यो वही एमएमजी थी जिसे वो सिख एलआई के मेजर बीरेंद्र सिंह और उनके 31 सैनिकों के पास छोड़ आए थे. क्या इसका अर्थ ये हुआ कि क्या बीरेंद्र सिंह और उनके सैनिक मारे जा चुके थे?

कौन है एलओसी पार करने वाला भारतीय सैनिक

सुशांत सिंह बताते हैं, "आख़िर में सिर्फ़ तीन सैनिक ज़िंदा बचे..उन्होंने तय किया कि वो तभी बच सकते हैं जब वो एलटीटीई के सैनिकों पर धावा बोल कर उनके कब्ज़े में चली गई एमएमजी को वापस छीन लें. उनमें से दो ने उन पर संगीनों से हमला किया क्योंकि उनकी सारी गोलियाँ ख़त्म हो चुकी थीं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"एलटीटीई ने उन सैनिकों को गोली से उड़ा दिया और बचे हुए एक सैनिक गोरा सिंह को ज़िंदा पकड़ लिया. उन्होंने उसे इसलिए नहीं मारा क्योंकि वो उससे रॉकेट लाँचर चलाना सीखना चाहते थे जिन्हें उन्होंने भारतीय सैनिकों से छीना था." गोरा सिंह को नवंबर 1988 में एलटीटीई युद्धबंदियों के बदले रिहा किया गया. बाद में कई सालों तक उन्होंने 13 सिख एलआई में काम किया.

इस बीच मेजर शिओनान सिंह को ख़्याल आया कि पलाली में 54 आर्टिलेरी ब्रिगेड मौजूद है और उसके पास तोपें हैं. लेकिन जैसे ही उन्होंने आर्टिलेरी फ़ायर की मांग की, उनके पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गई जब उन्हें पता चला कि तोपें तो मौजूद हैं लेकिन उनका गोला बारूद भारत से वहाँ पहुंचा ही नहीं है. श्रीलंका की सेना ने उन्हें कुछ मोर्टार्स गन उपलब्ध कराई लेकिन उनके छोड़े हुए गोले ख़ुद भारतीय सेना के ऊपर जा गिरे.

'पाक युद्ध चाहता है तो यही सही'

कनेक्टीकट, अमरीका से फ़ोन पर बात करते हुए मेजर जनरल शिओनान सिंह ने बताया, "हमने किताबों में पढ़ा था कि गन को कैसे नियंत्रित करते हैं. हमारा श्रीलंका वालों से रेडियो पर राब्ता हो गया. हमने उनसे फ़ायर मांगा. हमने अपने कुछ लड़कों को छत पर चढ़ा दिया. मैं नीचे बैठा हुआ था. उन्होंने बताया कि गोला कहाँ गिर रहा है. हमने उनसे कहा कि आप 50 गज़ दक्षिण में गोला गिराइए."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"मुझे उस समय ये पता नहीं था कि मैं 25 गज़ भी कह सकता हूँ. मैंने 50 गज़ इसलिए कहा क्योंकि ऐसा ही हमारी ट्रेनिंग में कराया जाता था. नतीजा ये रहा कि वो गोला उसी घर पर आकर गिरा जहाँ हम बैठे हुए थे. इत्तेफ़ाक से वो घर के बाहर गिरा जहाँ हमारे तीन जवानों ने पोज़ीशन ले रखी थी जिसमें दो लोगों की मौत हो गई एक बुरी तरह से ज़ख्मी हो गया."

इस बीच कमांडोज़ को लड़ते 37 घंटे बीत चुके थे. उन्हें वापस लाने के लिए तीन टैंक भेजे गए, लेकिन उन टैंकों में भी कुछ न कुछ नुख़्स थे. मेजर जनरल शिओनान सिंह याद करते हैं, "उनमें से एक टैंक में गनर नहीं था. एक में लोडर नहीं था. तीन टैंकों में सिर्फ़ एक ही लोडर था. जब ये टैंक हमारे पास पहुंचे तो रास्ते में टैंक कमांडर अनिल कौल ने दुश्मनों को नुक़सान पहुंचाने के इरादे से फ़ायरिंग कर दी जिससे उनके सारे गोले ख़त्म हो गए. एक टैंक में गोला गन के अंदर फंस गया था."

टैंक ने बिगाड़ा खेल

"उसका ऑटो-एक्सट्रैक्टर काम नहीं कर रहा था. जब ये टैंक हमारे पास पहुंचे तो हमने इनसे कहा कि हमारे पास सारे दिन इस घर से फ़ायर आया है. चलते-चलते इनको बरबाद करते चलें. ऐसा करने में उन्हें 45 मिनट लग गए, क्योंकि गनर ने कहा मैं अपनी गन से फ़ायर करूंगा. दूसरे टैंक से गोला निकाल कर उसके टैंक में लोड कराया गया. जब उसने फ़ायर किया तो गोला भी उस घर के ऊपर से निकल गया. हमने कहा कि ये टैंक दुश्मन से ज़्यादा हमारा मनोबल गिरा रहे हैं."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
इस ऑपरेशन में लगभग 40 भारतीय कमांडोज़ मारे गए

"यहाँ से जल्दी से जल्दी निकला जाए, क्योंकि सुबह होते ही हम आसानी से निशाना बन जाएंगे. उसी समय एक टैंक रिवर्स करते हुए एक गारे में फंस गया. उसके जेसीओ ने कहा कि इसको निकालने के लिए रिकवरी की ज़रूरत पड़ेगी. मुझे चिल्लाकर कहना पड़ा कि हम आपको यहीं छोड़ कर चले जाएंगे."

"सुबह एलटीटीई वाले आएंगे और वही आपकी रिकवरी देंगे. वास्तव में टैंक का क्रू लड़ाई के मोड में ही नहीं था और न ही ये टैकों की लड़ाई थी. साफ़ था कि हमने ग़लत जगह पर ग़लत चीज़ को लगा रखा था. हमें इस बात का फ़ायदा ज़रूर हुआ कि टैंकों के डर की वजह से वो हमारे बहुत नज़दीक नहीं आए."

इस ऑपरेशन में लगभग 40 भारतीय कमांडोज़ मारे गए. कोई भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ और लुंगी पहने एलटीटीई के लड़ाकों ने बुरी तरह से भारतीय सैनिकों को परेशान किया.

जिन्हें मौत का डर नहीं था

जब मैंने मेजर जनरल शिओनान सिंह से पूछा कि आप एलटीटीई के लड़ाकों के युद्ध कौशल को किस तरह से आँकते हैं तो उनका जवाब था, "पहली बात तो ये थी कि वो मरने से नहीं डरते थे. जो इंसान मरने से नहीं डरता वो कुछ भी कर सकता है. किसी भी लड़ाई में नौजवान सैनिक ही आपको जिताते हैं न कि अनुभवी सैनिक. लड़ाई में अनुभवी वही होते हैं जो पहली लड़ाई में नहीं मरे होते और वो इस लड़ाई में भी मरना नहीं चाहते. जिनको पता ही नहीं होता कि मौत क्या है वो ही लड़ाई जितवाते हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"उनका अपने नेतृत्व पर पूरा यकीन था और उन्होंने उन्हें बेहतरीन हथियार उपलब्ध करा रखे थे. वो लोगों के बीच आसानी से घुलमिल सकते थे. उन्हें यकीन था कि अगर वो हथियार छोड़ कर लोगों के बीच जाएं तो उन्हें कोई भी पहचान नहीं पाएगा. जहां तक टेक्टिस की बात है छापामार युद्ध तो वो लड़ ही रहे थे श्रीलंका की सेना के ख़िलाफ़. उनको रास्ते पता थे. उनको पता था कि कहाँ छिपना है. सैनिक के रूप में उनका प्रशिक्षण आला दर्जे का था."

इसके बाद भारतीय सेना श्रीलंका में लगभग तीन सालों तक रही. जब 1990 में वो भारत लौटी, उसके 1155 जवान मारे जा चुके थे. आज पलाली हवाई अड्डे पर काले ग्रेनाइट का एक स्मारक बना हुआ है, उन भारतीय सैनिकों की याद में, जिन्होंने 12 अक्तूबर, 1987 को इस नाकामयाब ऑपरेशन में भाग लिया था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे