वाराणसी में बीजेपी दिग्गजों का जमावड़ा क्यों?

  • 4 मार्च 2017
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वाराणसी वो शहर है जिसे पूर्वांचल का केंद्र कहा जाता है. सांस्कृतिक दृष्टि से इसका जितना महत्व है, राजनीतिक दृष्टि से उससे कम नहीं है. शायद यही सोचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में यहां से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था और उस सोच के पीछे जो रणनीति थी वो ज़बर्दस्त क़ामयाब भी हुई थी.

लेकिन क़रीब तीन साल बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वही क़ामयाबी अब चिंता का सबब भी बनी हुई है.

वाराणसी ज़िले में वैसे तो कुल आठ विधानसभा सीटें आती हैं लेकिन 2012 में शहरी क्षेत्र की तीन सीटें ही उसके खाते में गई थीं. पार्टी के सामने इस बार इससे ज़्यादा सीटों को जीतने की जितनी चुनौती है, उससे कहीं ज़्यादा इन सीटों को बचाने की है.

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ऐसा इसलिए भी है क्योंकि इनमें से दो सीटों पर मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिए गए हैं और नेताओं की तमाम कोशिशों के बावजूद यहां पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराज़गी दिखती है. यही वजह है कि आखिरी चरण में होने वाले मतदान में प्रधानमंत्री समेत केंद्रीय मंत्रिमंडल के क़रीब दर्जन भर मंत्री पिछले कई दिनों से यहां कैंप हुए हैं और घर-घर जाकर वोट मांग रहे हैं.

वाराणसी में वरिष्ठ पत्रकार और आईनेक्स्ट अख़बार के संपादक विश्वनाथ गोकरण कहते हैं, "पार्टी दावा भले ही कर रही है कि उसने नाराज़ नेताओं को मना लिया है लेकिन ऐसा लगता नहीं है. बीजेपी के तमाम बड़े नेता भले ही यहां लगातार कैंप कर रहे हों लेकिन इन नाराज़ नेताओं को अभी तक किसी ने क्षेत्र में प्रचार करते नहीं देखा. इस बात से भी कोई इनकार नहीं किया जा सकता है कि ये गुपचुप तरीक़े से बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़ प्रचार कर रहे हों."

दरअसल, पार्टी अभी तक मानकर चल रही थी कि वाराणसी दक्षिण से सात बार के विधायक श्यामदेव राय चौधरी शायद अमित शाह समेत तमाम नेताओं के किसी कथित भारी-भरकम आश्वासन के चलते मान गए हैं. लेकिन विश्वनाथ गोकरण कहते हैं कि आश्वासनों से आप मतदाताओं को ही 'पढ़ा' सकते हैं, नेताओं को नहीं.

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यही हाल वाराणसी कैंट सीट का है. पार्टी ने वाराणसी कैंट सीट से मौजूदा विधायक ज्योत्स्ना श्रीवास्तव के बेटे सौरभ श्रीवास्तव को टिकट दिया है. हालांकि बीजेपी यह सीट भी लगातार कई सालों से जीतती आ रही है, लेकिन यहां परिवारवाद का मामला उठाकर पार्टी के अंदर काफी विरोध है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद चार मार्च से छह मार्च तक वाराणसी में मौजूद हैं और उनका रात्रि विश्राम का कार्यक्रम भी यहीं है.

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी पिछले कुछ समय से यहीं कैंप किए हुए हैं. स्थिति ये है कि पार्टी का राज्य मुख्यालय एक तरह से लखनऊ की बजाय वाराणसी में ही शिफ़्ट हो गया है.

पूर्वांचल से आने वाले तमाम मंत्रियों, जैसे- कलराज मिश्र, मनोज सिन्हा, महेंद्रनाथ पांडेय के अलावा गुरुवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली भी वाराणसी में मौजूद थे.

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वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी भी चुनावी जायज़ा लेने के लिए वाराणसी में थीं. उनका कहना था, "2014 के लोकसभा चुनाव में भी इस शहर की यही स्थिति थी. सारे होटल बीजेपी वालों ने बुक करा रखे थे. अब तो मोदी प्रधानमंत्री हैं, उनकी प्रतिष्ठा इस चुनाव से जुड़ी है. ज़ाहिर है बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती क्योंकि यहां यदि उसकी सीटें चली गईं तो इसका संदेश बहुत नकारात्मक जाएगा."

दरअसल, आख़िरी चरण में जिन चालीस सीटों पर चुनाव होना है, पिछले विधान सभा चुनाव में बीजेपी को उनमें से सिर्फ़ चार सीटें ही मिली थीं और उन चार में भी तीन सीटें वाराणसी शहर की थीं.

यही नहीं, ये सीटें लंबे समय से उसके क़ब्ज़े में रही हैं. इस बार जबकि वो राज्य भर में अपनी स्थिति ठीक मान रही है, नाराज़ नेताओं और कार्यकर्ताओं की वजह से उसे यही सीटें भारी लग रही हैं.

वाराणसी के एक अन्य पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि स्मृति ईरानी समेत कई मंत्रियों को यहां सभा करने की अनुमति नहीं मिल सकी तो वो मतदाता जागरूकता अभियान के नाम पर सड़कों पर निकले और मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की. जानकारों का ये भी कहना है कि जहां एक ओर इन सीटों पर जीत हासिल करने की चुनौती है तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री को 'खुश करने' या 'नाराज़ करने' का सवाल भी है.

जानकारों का कहना है कि पिछले पांच चरणों में मतदान प्रतिशत का लगातार घटना भी राजनीतिक दलों को बेचैन कर रहा है. हालांकि ये बेचैनी सिर्फ़ बीजेपी में ही नहीं, बल्कि दूसरे राजनीतिक दलों में भी है.

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बीजेपी के प्रदेश महामंत्री विजय बहादुर पाठक नाराज़गी की बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं, "पार्टी में किसी तरह की नाराज़गी नहीं है. सभी लोग मिलकर पार्टी को उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत दिलाने के लिए काम कर रहे हैं. नाराज़गी की ख़बरें सिर्फ़ अफ़वाह हैं जिसे कुछ लोग फैला रहे हैं."

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लेकिन विश्वनाथ गोकरण कहते हैं कि यदि नाराज़गी नहीं है तो दादा यानी श्यामदेव राय चौधरी अभी तक कहीं भी प्रचार में क्यों नहीं दिखे. वाराणसी के ही रहने वाले पत्रकार अनुराग तिवारी कहते हैं कि पार्टी ने न सिर्फ़ नेताओं को उतार दिया है बल्कि आरएसएस की वो टीम भी अब 'रक्षा' में उतर आई है जिसे 2009 के चुनाव में यहां से बीजेपी उम्मीदवार मुरली मनोहर जोशी को जिताने का श्रेय जाता है.

जानकारों का कहना है कि वाराणसी न सिर्फ़ प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है बल्कि पूर्वांचल की भी धुरी है. आख़िरी दो चरणों में यहीं चुनाव हैं. पार्टी को पता है कि इन पर जीत उसके लिए कितनी अहम है. वो जीत की हर कोशिश कर रही है क्योंकि उसे पता है कि इस बार का चुनाव उसके लिए 'अभी नहीं तो कभी नहीं' वाला है.

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