प्रसव का दर्द नहीं.... ऑपरेशन को हामी

  • 5 मार्च 2017
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"मैं प्रसूति के दर्द से फिर नहीं गुज़रना चाहती. मेरी पहली डिलीवरी नॉर्मल हुई थी. तो मैंने और मेरे पति ने डॉक्टर से कहा कि हम प्रसव पीड़ा का इंतज़ार नहीं करना चाहते और सिज़ेरियन ही कर लेते हैं. वैसे भी असली काम तो बच्चा आने के बाद शुरु होता है तो उसके आने के पहले इतनी पीड़ा क्यों उठाएँ?"

शिल्पी ने हाल ही में एक निजी अस्पताल में अपने दूसरे बच्चे के रूप में एक स्वस्थ लड़के को जन्म दिया है. ये एक सुनियोजित सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन के ज़रिए पैदा किया गया शिशु था.

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सी-सेक्शन में पेट के सबसे निचले हिस्से में अंग्रेज़ी के 'सी' के आकार का चीरा लगाते हैं और बच्चे का जन्म कराया जाता है इसलिए इसे बिकिनी कट भी कहते हैं.

सी-सेक्शन से परहेज नहीं

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ऐसे ही एक और मां अदिति ने भी अपनी बेटी अन्विता को पूर्वनिर्धारित दिन पर सी-सेक्शन से ही जन्म दिया है.

अदिति कहती हैं कि, "बड़ा बेटा सिज़ेरियन से हुआ क्योंकि बच्चा बाहर नहीं आ रहा था. मैंने लेबर पेन 24 घंटे कर सहन किया है. मैंने उसी दिन तय किया था कि दूसरे बच्चे में इतना परेशान नहीं होऊंगी, तो ऑपरेशन के एक दिन पहले मैंने पार्लर में अपॉन्टमेंट लिया, फेशियल और स्पा भी कराया, शॉपिंग की और गर्ल्स डिनर किया और फिर अगले दिन मैं हॉस्पिटल गई डिलिवरी के लिए."

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डेढ़ साल के कृष्णा की 40 वर्षीय मां सोनाली बताती हैं, "मेरी बहन न्यूमेरॉलॉजिस्ट है उसने कहा कि तुम अक्टूबर की नियत तारीख पर ही बच्चा पैदा करना, वो लकी बच्चा होगा. तो मैंने उसी दिन के लिए सी-सेक्शन करा लिया और आज ख़ुश हूं."

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आज की इन माओं की बातें सुन कर लगता है कि नॉर्मल डिलीवरी के झंझटों को दरकिनार करते हुए मांएं सी-सेक्शन के ऑप्शन को खुले दिल से अपनाने लगी हैं जो कुछ सालों पहले तक नहीं हुआ करता था.

इस पर मुंबई के ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनेकॉलॉजिस्ट डॉक्टर सुधीर नायक का कहना है, "प्रसूति और गर्भावस्था को लेकर लोगों की सोच बदल गई है. एक या दो ही बच्चे करने की चाह में लोग कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहते हैं. साथ ही हम पर तो ये दबाव हमेशा रहता है कि कहीं कुछ गड़बड़ हुई तो कह दो डॉक्टरों की लापरवाही है."

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"मैं भी अपने जूनियर्स को सलाह देता हूं कि अगर मां या बच्चे के जीवन का प्रश्न है तो सी-सेक्शन कर लो. लेकिन याद रखो नॉर्मल डिलीवरी जितनी कराओगे मरीज़ों का उतना ही भरोसा जीतोगे."

वहीं देश में एक तबका ऐसा भी है जो नॉर्मल डिलीवरी को ही अहमियत देता है. कहा जाता है कि नॉर्मल डिलीवरी होने पर आपके शरीर में कोई कट ना होने की वजह से शरीर पहले जैसे स्वरूप में लौट सकता है. माना जाता है कि आपका अपने बच्चे के प्रति लगाव भी ज़्यादा होता है.

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फ़ायदे नुकसान कितने?

हालांकि इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है लेकिन कई लोग ये भी मानते हैं कि सी-सेक्शन से जन्मे बच्चे की तुलना में नॉर्मल बच्चा स्वस्थ या ख़ुशमिज़ाज ज़्यादा रहेगा.

हां इस बात पर अनुभवी महिलाओं की चर्चा ज़रूर हो जाती है कि सी-सेक्शन में चूंकि योनि का इस्तेमाल ज़्यादा नहीं होता तो कई महिलाएँ इसलिए सेक्स में पहले जैसा ही आनंद पाती हैं जबकि नॉर्मल डिलीवरी में योनि के कसाव में अंतर आ जाता है.

डॉक्टरों का ये भी मानना है कि सी-सेक्शन के बाद अगली डिलीवरी भी सी-सेक्शन से ही करानी पड़ती है और कभी किसी और अंग का नॉर्मल सा आपरेशन करना हो तो महिला के सीज़ेरियन का ध्यान रखना पड़ता है.

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आंकड़ों की हक़ीकत

हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक याचिका मिलने के बाद देशभर के अस्पतालों के प्रसूति विभाग को सी-सेक्शन और नॉर्मल (वैजाइनल) डिलीवरी के डेटा सार्वजनिक तौर पर मुहैया कराने की बात की है.

याचिका के अनुसार भारत में पिछले कुछ सालों में सी-सेक्शन कराने की संख्या बढ़ गई है. तेलंगाना में ये आंकड़े 74.8% हैं, केरल में 41% और तमिलनाड़ में 58%. वहीं नेशनल हेल्थ फैमिली सर्वे 4 (साल 2015-16) के अनुसार पिछले पांच सालों की जन्म दर के अनुसार देश के शहरों में सी-सेक्शन 28.3% है, वहीं गावों में 12.9% यानी कुल 17.2%. 2005-6 में कुल सीज़ेरियन का आंकड़ा 8.5% था.

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इनमें से निजी संस्थानों में सी-सेक्शन के आंकड़े- शहर में 44.8% तो गावों में 37.8% और कुल 40.9% हैं, जो 2005-6 में 27.7% था. सरकारी संस्थानों के आंकड़े कहते हैं कि शहरों में 19.9% गावों में 9.3% यानी कुल 11.9% जो 2005-6 में 15.2% रहा है.

इस याचिका के बारे में पूछने पर डॉक्टर सुधीर बताते हैं, "कुछ अस्पतालों में जोख़िम वाले पेशेंट जैसे उच्च रक्तचाप वाली गर्भवती महिला या मधुमेह से पीड़ित महिला को रेफ़र किया गया है तो सी-सेक्शन के हालात बढ़ जाते हैं."

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डाक्टर सुधीर पूछते हैं, "तो क्या हम रुक जाएं कि इस महीने हमने पहले ही इतने सी-सेक्शन कर दिए हैं तो अब हम और ऑपरेशन ना करें. अब ये तो हर मरीज़, उसकी हालत और उसके हम पर किए विश्वास पर निर्भर करेगा. हां मैं प्रोफेशन में ग़लत प्रैक्टिस से इंकार नहीं करता."

कहा जाता है कि सी-सेक्शन में कई खर्चे आते हैं और डॉक्टर और हॉस्पिटल खूब कमाई करते हैं. इसमें ऑपरेशन थिएटर, सहायक कर्मचारी, दवाईयां, सहायक डॉक्टर्स और हॉस्पिटल में रहने का खर्चा सभी बढ़ जाता है. मरीज़ को पांच से सात दिन तक हॉस्पिटल में रखा जा सकता है. जबकि नॉर्मल में एक से तीन दिन तक ही अस्पताल में रहना होता है. इसमें बाकी खर्चे भी कम होते हैं.

याचिकाकर्ता सुबर्ना घोष का कहना है कि "अभी तो हमने सिर्फ़ आंकड़े ही मांगे हैं. कारणों की बात बाद में होगी."

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