छठा चरण: सपा को सीटें बचाने की तो दूसरों को बढ़ाने की चुनौती

इमेज कॉपीरइट AFP, GETTY IMAGES

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब अपने आख़िरी दौर में है और राजनीतिक भाषणों का कथ्य विकास, कब्रिस्तान, श्मशान से होता हुआ अब घूँघट और बुर्के तक पहुंच गया है.

छठे चरण के लिए शनिवार को सात जिलों की 49 सीटों पर मतदान हो रहा है.

साल 2012 के विधान सभा चुनावों इन 49 सीटों में समाजवादी पार्टी को 27, बीएसपी को नौ, बीजेपी को सात और कांग्रेस को चार सीटें मिली थीं. इस चरण में मतदान के साथ ही 362 विधान सभा सीटों पर चुनाव संपन्न हो जायेगा. इन सीटों पर देश और प्रदेश के कई दिग्गजों का भी राजनीतिक इम्तिहान होना है.

मायावती उत्तर प्रदेश में रहेंगी या मिटेंगी?

इमेज कॉपीरइट AFP

छठे चरण में शनिवार को जहां मतदान हो रहा है, उनमें कई जिलों की सीमाएं बिहार से सटी हैं.

यही वजह है कि इस चरण में सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रचार के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी उतरे.

हालांकि इसी इलाक़े में सपा नेता मुलायम सिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आज़मगढ़ भी आता है लेकिन मुलायम सिंह यादव अपनी सत्तारूढ़ पार्टी के प्रचार में नहीं आए.

ये अलग बात है कि वो लखनऊ में अपनी बहू अपर्णा यादव और जसवंतनगर में शिवपाल यादव के प्रचार के लिए गए थे.

गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ राज्य के दूसरे इलाक़ों के साथ यहां भी सक्रिय रहे तो मऊ के चर्चित विधायक मुख़्तार अंसारी जेल से ही चुनाव लड़ रहे हैं.

उनका प्रचार कार्य उनके भाई अफ़ज़ाल अंसारी और बेटे देख रहे हैं. मुख़्तार अंसारी के बड़े बेटे भी घोसी सीट से बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं.

छठे चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की विधान सभा सीटों पर भले ही मतदान नहीं होना है, बावजूद इसके, उन्होंने रैलियों और सभाओं में कोई कमी नहीं की.

नज़रिया- 'दम पूरा लगाया, पर पश्चिमी यूपी में नहीं चल पाया हिंदू कार्ड'

वाराणसी में वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ गोकरण कहते है,"आखिरी दौर में सभी दल पूरी ताक़त लगाते हैं. चूंकि पांच चरणों में मतदान प्रतिशत लगातार कम होता रहा इसलिए राजनीतिक दलों में और बेचैनी है. ये स्थिति सभी राजनीतिक दलों के साथ है, किसी एक के साथ नहीं. सच्चाई ये है कि सभी एक-दूसरे से डरे हुए हैं."

छठे चरण में जिन 49 सीटों पर आज मतदान हो रहा है कि उनमें 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को 27 सीटें मिली थीं.

हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में आज़मगढ़ को छोड़कर इस इलाके की ज़्यादातर सीटें बीजेपी ने जीती थीं लेकिन विधान सभा चुनाव में मऊ, आज़मगढ़, महाराजगंज जैसे कई ज़िलों में उसका खाता तक नहीं खुला था.

जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के लिए अपनी सीटें बचाना सबसे बड़ी चुनौती है जबकि दूसरे दलों के सामने सीटें बढ़ाने की चुनौती है.

ज़ाहिर है, चुनौती समाजवादी पार्टी के लिए कहीं ज़्यादा बड़ी है क्योंकि एक तो उसने कई सीटें गठबंधन के चलते कांग्रेस के लिए छोड़ रखी हैं, दूसरे सत्ता में रहते हुए उन्हीं सीटों पर दोबारा जीतना आसान नहीं है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)