इसराइली दौरे से नई लकीर खींचने जा रहे मोदी!

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसराइल के दौरे पर जाने वाले हैं. इस यात्रा को अंतिम रूप देने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल पिछले हफ्ते इसराइल में थे. उन्होंने इस मामले में इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश मंत्रालय से यात्रा की रणनीतियों पर चर्चा की.

हालांकि इस दौरे की तारीख की घोषणा अभी नहीं की गई है, लेकिन कहा जा रहा है कि यह दौरा जुलाई में हो सकता है.

पीएम मोदी दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 25 साल पूरे होने पर तेल अवीव पहुंचेंगे. यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इसराइल दौरा होगा. इसे दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक दौरे के रूप में देखा जा रहा है.

इसराइल जाने वाले पहले पीएम होंगे मोदी

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Image caption मोदी सरकार आने के बाद से और करीब आ रहे हैं दोनों देश

मोदी की इस यात्रा की सबसे अहम बात यह है कि वह भारत के अतीत की विदेश नीति से अलग लकीर खींचने जा रहे हैं.

मोदी इस यात्रा में फ़लस्तीनी इलाक़े का दौरा नहीं करेंगे. भारतीय प्रधानमंत्री का दौरा इसराइल तक ही सीमित होगा. इससे पहले बीजेपी और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विदेश मंत्रियों ने जब भी इसराइल का दौरा किया तो उसमें फ़लस्तीनी इलाक़े का दौरा भी शामिल रहता था.

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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब 2015 में इसराइल के दौरे पर गए थे तो उन्होंने फ़लस्तीनी इलाक़ों और जॉर्डन का भी दौरा किया था. मोदी के हाथों में कमान आने के बाद से ही ऐसा माना जा रहा था कि इसराइल को लेकर उनकी नीति बिल्कुल अलग होगी. भारत अब तक फ़लस्तीन की स्थापना और दो राष्ट्र सिद्धांत का बड़ा समर्थक रहा है.

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Image caption नरेंद्र मोदी इसराइल जाने वाले पहले प्रधानमंत्री होंगे

केंद्र की मौजूदा सरकार भी अलग फ़लस्तीनी राज्य का समर्थन करती है और मध्य-पूर्व में विवादों के शांतिपूर्ण निपाटारे की वक़ालत करती है. वक़्त के साथ इसराइल और भारत के रिश्तों में गर्माहट आई है. करगिल युद्ध के बाद भारत की रक्षा प्रणाली में इसराइल की भूमिका बढ़ती गई. आज की तारीख में भारत इसराइल से रक्षा उपकरण ख़रीदने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है.

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सीमा सुरक्षा प्रणाली, राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से मुक़ाबला करने में इसराइल भारत की मदद कर रहा है. इसके साथ ही डेयरी, सिंचाई, ऊर्जा, इंजीनियरिंग और विज्ञान के क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच सहयोग तेजी से बढ़ा है.

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Image caption इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू

राजनीतिक रूप से देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी शुरू से ही इसराइल का खुलकर समर्थन करती रही है. भारत में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो मध्य-पूर्व में टकराव को लेकर इसराइल से हमदर्दी रखता है. वक़्त के साथ इसराइल से स्वाभाविक रूप से संबंधों में आई गर्माहट के कारण दोनों देश और करीब आए हैं.

भारत कुछ महीने पहले संयुक्त राष्ट्र संघ में इसराइल के ख़िलाफ़ मानवाधिकार उल्लंघन प्रस्ताव पर तटस्थ रहा था. भारत का यह क़दम स्पष्ट रूप से इसराइल के समर्थन में था. इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच बातचीत का रुकना, अरब में अनिश्चितता और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दो राष्ट्र समाधान नीति का विरोध के बाद से इसराइल के प्रति भारतीय रुख में बड़ा परिवर्तन आया है.

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप और इसराइली पीएम नेतन्याहू

भारत की सरकार इसराइल से अपने संबंध को इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष से अलग व्यावहारिक और फ़ायदे के लिहाज से पारिभाषित कर रही है. आज की तारीख में इसराइल और भारत केवल करीब ही नहीं आए हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय अलगाव के वक्त में भारत अमरीका के बाद इसराइल का सबसे बड़ा सहयोगी बनकर उभरा है.

भारत का कहना है कि इसराइल से निकटता का मतलब यह नहीं है कि वह फ़लस्तीनियों का समर्थन नहीं करता है या अरब देशों से उसके संबंध बदल रहे हैं. मोदी सरकार ने इसराइल से बढ़ते संबंधों को लेकर इन कयासों को ख़ारिज कर दिया है.

सरकार का कहना है कि वह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में व्यावहारिक और यथार्थवादी रुख अपना रही है.

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