'बोडो युवक संस्कृत पढ़ने पर पंडित थोड़े ही बन जाएगा?'

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असम सरकार के सरकारी स्कूलों में आठवीं कक्षा तक संस्कृत भाषा को अनिवार्य करने के एक फैसले का जम कर विरोध हो रहा है.

राजनीतिक पार्टियां इस फैसले के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का गुप्त एजेंडा होने का आरोप लगा रही है.

मुख्ममंत्री सर्वानंद सोनोवाल की कैबिनेट ने 28 फरवरी को एक बैठक में राज्य बोर्ड के स्कूलों में संस्कृत अनिवार्य करने का फैसला लिया था.

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता और लोकसभा सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने बीबीसीसे कहा, "सरकार ने संघ के ऐजेंडे के तहत यह काम किया है. यह काम संघ के लोगों को फायदा पहुंचाने तथा एक खास धर्म के बच्चों की मदद करने और उन्हें सरकारी नौकरियों में लगाने के लिए किया जा रहा हैं. अगर ऐसा नहीं हैं तो सरकार संस्कृत के साथ स्कूलों में अरबी और उर्दू को भी लागू करें ताकि सबके साथ इंसाफ हो."

उन्होंने कहा, "यह देश धर्म की बुनियाद पर नहीं चलने वाला. सरकारी स्कूलों में मुसलमान बच्चे भी पढ़ते हैं और सरकार को धर्म के आधार पर कोई काम नहीं करना चाहिए."

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इस फ़ैसले का विरोध कर रहे छात्र संगठनों का कहना है संस्कृत की बजाए सरकारी स्कूलों में असमिया, भूगोल और इतिहास को अनिवार्य करना ज्यादा ज़रूरी है.

आल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य कहते हैं, "हम इसके विरोध में नहीं हैं, लेकिन सरकार को बताना चाहिए कि क्या अन्य राज्यों में चल रहे त्रिभाषा फॉर्मूले वाली नीति की जगह क्या अब असम में चार भाषा फॉर्मूला लागू होगा."

छात्र मुक्ति संग्राम समिति जैसे संगठन इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रहें हैं. जबकि ताई आहोम युवा परिषद इसके ख़िलाफ़ सोमवार को जिला उपायुक्त कार्यालयों का घेराव करने की बात कह रहें है.

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Image caption बीते साल दिसंबर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल की मुलाकात हुई थी

ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष प्रमोद बोड़ो का कहना है, "असम में शिक्षा की स्थिति बेहद खराब है. प्रदेश में करीब छह हजार ऐसे स्कूल है जिन्हें केवल एक शिक्षक चला रहा हैं. जबकि कुछ ऐसे स्कूल हैं जिनमें कोई शिक्षक ही नहीं है. ऐसी स्थिति में सरकार का फैसला समझ से परे है."

वो कहते हैं, "हमें अपनी भाषा (बोड़ो) को बचाए रखना है. ऐसे में सरकार के फैसले को हम नहीं मानेंगे. सरकार इसके ज़रिए छात्रों में हिंदूत्ववादी विचारधारा पैदा करना चाहती जो की गलत है. क्या बोड़ो युवक संस्कृत पढ़ने पर पंडित थोड़े ही बन जाएगा?"

प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष तथा राज्यसभा सांसद रिपुन बोरा पूछते हैं, "असम में संस्कृत स्कूलों की स्थिति पहले से बेहद खराब है. उनको सुधारने की बजाए सरकार ने आनन-फानन में ये फैसला ले लिया. ये फैसला केवल सरकारी स्कूलों के लिए ही क्यों? प्रदेश में सैकड़ों गैर-सरकारी स्कूल है उनमें भी लागू होना चाहिए."

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Image caption रिपुन बोरा

इसके जबाव में प्रदेश बीजेपी के महासचिव विजय गुप्ता ने कहा, "राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बनाए रखने तथा भारत को एक सूत्र में पिरोने के लिए सरकार ऐसे कदम उठा रही है. संस्कृत हमारे पूर्वजों की भाषा है और इस पर किसी को एतराज नहीं होना चाहिए."

उन्होंने कहा, "जहां तक सवाल मुसलमान छात्रों का है तो भाषा का ज्ञान हासिल करना किसी भी तरह गलत नहीं हैं. सरकार सभी धर्मों का बराबर सम्मान करती है."

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Image caption प्रदेश बीजेपी के महासचिव विजय गुप्ता

इससे पहले प्रदेश में भाषा को लेकर हिंसक आंदोलन हुआ था. साल 1960 के भाषा आंदोलन में हुई हिंसा में 39 लोग मारे गए थे और सैकड़ों लोग घायल हुए थे.

असम में उस समय कांग्रेस की सरकार थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री बिमला प्रसाद चालिहा ने असमिया को सरकारी भाषा के तौर पर मान्यता दिलाने के लिए प्रस्ताव रखा था.

लेकिन प्रदेश के बांग्लाभाषी इलाकों में इसका जोरदार विरोध हुआ. हिंसा के कारण ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे 50 हजार से अधिक बांग्लाभाषी लोगों को अपना घरबार छोड़ना पड़ा. कुछ लोग प्रदेश के दक्षिणी क्षेत्र बराकघाटी चले गए और कुछ लोगों ने पश्चिम बंगाल में शरण ली.

बराकघाटी में बांग्लाभाषी समुदाय बहुसंख्यक है इसलिए वहां के लोगों ने तीन जिलों में असमिया भाषा को अधिकृत भाषा के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया.

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इसके बाद मुख्यमंत्री चालिहा ने असमिया को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू करने के लिए विधानसभा में विधेयक पारित कर दिया.

बराकघाटी में इसका ज़ोरदार विरोध हुआ. मई 1961 को सिलचर में पुलिस फायरिंग में 11 आंदोलनकारियों की मौत हो गई. तब से लेकर आज तक बराकघाटी के सरकारी कार्यालयों में बांग्ला भाषा को आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता मिली हुई है.

असम में करीब 56 हजार सरकारी स्कूल है जिनमें अधिकतर स्कूल शिक्षकों की कमी से जूझ रहे है. अब तक प्रदेश के किसी भी स्कूल में कोई भी भाषा अनिवार्य नहीं थी.

असम में 25 से अधिक ऐसी जनजातियां है जो ज्यादातर रोमन लिपि का इस्तेमाल करती है.

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