नज़रिया: चुनाव में पैसे के छिड़काव से वोट पैदा होता है?

वाराणसी में चुनाव प्रचार करते सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी. इमेज कॉपीरइट Getty Images

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शनिवार को बनारस के पास भदोही में एक रैली में बुनकरों से कहा कि चुनाव में बहुत पैसा बंट रहा है. पैसा कोई भी दे रख लेना, लेकिन वोट साइकिल को ही देना.

पिछले महीने गोवा के चुनाव में 'आप' के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी ठीक यही कहा.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने तो वोटरों को दी जाने वाली घूस की रकम का भी उल्लेख किया. इसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा.

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मणिपुर में भी पैसा बांटने की बात सामने आई है जहां भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुख्यमंत्री इबोबी सिंह का उपनाम ही 'मिस्टर टेन परसेंट' रख दिया है.

पैसा और शराब बांटकर चुनाव जीतना अखिल भारतीय बीमारी है जो बढ़ती जा रही है. इस बार 2012 के चुनाव की तुलना में तीन गुना से ज़्यादा रुपया और शराब चुनाव आयोग ने जब्त की है.

जिस समय चुनाव विशेषज्ञ टीवी चैनलों पर बैठकर जाति, मुद्दे, विचारधारा, नेताओं के व्यक्तित्व वगैरह के आधार पर अनुमान लगा रहे होते हैं, ठीक उसी वक्त साज़िशन लालची और भ्रष्ट बनाया जाता वोटरों का बड़ा तबका किसी और हवा में बह कर फैसला कर रहा होता है.

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अब स्थिति ऐसी हो गई है कि यह चलन लोकगीतों में झलकने लगा है. इसे बढ़ावा देने के कॉम्पिटीशन के चलते राजनीतिक दलों के लिए भी अधिक चुप रह पाना मुश्किल हो गया है.

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कुछ अरसा पहले नरेंद्र सिंह नेगी का गाया एक गढ़वाली लोकगीत का वीडियो हिट हुआ था जिसके बोल थे.

'हाथ ने हुसुकी पिलाई फूल ने पिलाई रम

छोटा दल, निरदली दिदौं कच्ची मां टरकाया हम।।

इस चुनाव में मजो ही मजो

दारू भी रूपया भी ठम्म।।

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चुनाव आयोग इसे बूथ कैप्चरिंग जैसा ही लोकतंत्र को धता बताने वाला अपराध मानता है.

चुनाव आयोग ने क़ानून मंत्रालय को फिर से एक बार प्रस्ताव भेजा है कि उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में अलग से एक स्पष्ट प्रावधान कर वोटरों को घूस देने की स्थिति में चुनाव रद्द करने का अधिकार दिया जाए.

इससे पहले भी आयोग दो बार यह मांग उठा चुका है. लेकिन केंद्र सरकार ने ठुकरा दिया. चुनाव में वोटर को लालच देने का रिवाज पुराना है, लेकिन उदारीकरण के बाद स्थिति तेजी से बिगड़ी है.

इस दौर में आर्थिक अपराध ही मुख्य अपराध हो गए हैं, गैर क़ानूनी तरीकों से पैसा बनाने वाले नौदौलतिए वीआईपी के कवच के पीछे खुद को सुरक्षित करने के लिए राजनीतिक पार्टियों के टिकट खरीद कर बड़ी तादाद में चुनाव में उतर रहे हैं.

हर पार्टी में पैठ गए इस नौदौलतिया तबके को वोटर का दिमाग़ फेरने के लिए पैसा फेंकने के सिवा और कुछ नहीं आता.

सिर्फ यूपी के सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे उम्मीदवार पहला चुनाव लड़ रहे हैं जिनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है, जिन्हें भाषण देना तक नहीं आता लेकिन जीत का आत्मविश्वास भरपूर है क्योंकि वोटरों को पटाने का काम प्रोजेक्ट के तहत उन्होंने बहुत पहले शुरू कर दिया था.

राजनीतिक पार्टियों के लिए ऐसे गूंगे प्रत्य़ाशी बहुत काम के साबित होते हैं क्योंकि एक बार चुनाव जीत जाने के बाद वे हमेशा हां में हां मिलाते हैं, कोई समस्या नहीं खड़ी करते, उनके समर्थन का मैनेजमेंट आसान होता है.

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वोटर एक ही चुनाव क्षेत्र में ऐसे सभी प्रत्याशियों से बेहिचक पैसे लेता है, ऐसा करने के पीछे उसका जो तर्क है वह हमारे लोकतंत्र की पोल बहुत मार्मिक ढंग से खोलता है.

ऐसे वोटरों का सादा-सा तर्क होता है, "ये एमपी एमएलए बनके करोड़ों बटोरेंगे हमको तो यही हजार दो हज़ार और दस दिन तक पीने-खाने को मिलता है. चुनाव ही एक ऐसा मौका है जब नेता बनने चले अमीरों की थैली खुलती है, हम क्यों चूकें."

वोटरों का यह विशाल तबका प्रधानी, बीडीसी, जिला पंचायत, नगर पालिका से लेकर संसद के चुनाव के मौसम में बहुत साफ पहचाना जाता है जिसे देखकर लगता है कि उसे वोट का अधिकार अभी नहीं मिलना चाहिए था.

यही वह आदमी है जो मनरेगा में बिना काम किए आधी पौनी मजदूरी लेकर चुप्पी खींचे रहता है ताकि सरकारी अफ़सर और ग्राम प्रधान फर्जी मस्टर रोल भर सकें.

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वह इतना दरिद्र और गाफ़िल है कि वोट समेत अपने हर अधिकार को पहला मौका हाथ आते ही बेच देता है.

बुरा यह है कि राजनीतिक दल और दूसरे इदारे उसे जागरूक बनाने के बजाय जानबूझ कर और अधिक लालची बना रहे हैं ताकि ख़रीदी हुई "जनता" के नाम पर मनमानी की जा सके.

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