उस क़ैद से आज़ाद हो पाएँगी इरोम शर्मिला ?

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सोलह साल तक चली भूख हड़ताल ने उनके ख़्वाबों के उड़ान को कम नहीं किया, बल्कि उसकी लौ कुछ और तेज़ हो गई है.

'प्रेम, विवाह, घर, परिवार'; के वो सपने, वो हसरतें, इरोम शर्मीला के ज़बान से कुछ यूं बार-बार बयां हो रहे हैं कि कुछ को 'देवी इरोम शर्मिला' के मिट जाने का ख़ौफ़ सता रहा.

दस मणिपुरियों की मौत, सेना को मिले विशेषाधिकार पर विरोध, एक युवती का 16 साल लंबा उपवास.

चेहरे पर गिरे घुंघराले बालों के बीच से दिखती हुई नाक में घुसी वो नली - कोर्ट के हुक्म पर उन्हें भोजन देने के लिए...

इरोम शर्मिला को ज़मानत मिली

यही मेरा अस्तित्व है, एक क़ैदी का : इरोम

आखिर क्यों हो रही है मणिपुर में हिंसा

भारतीय शासन के ख़िलाफ़ विरोध का प्रतीक?

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Image caption इरोम शर्मिला को भारत के विरोध का प्रतीक माना जाता था, पर अब लोग सवाल उठाने लगे हैं

मणिपुरियों के लिए इरोम शर्मीला भारतीय शासन के ख़िलाफ़ विरोध का प्रतीक बन गईं.

दूसरों के लिए एक बेहद बहादुर औरत. बस!

लेकिन उस युवती का क्या, जो अस्पतालनुमा जेल में 'जो नहीं मिलता था उसे सपने में जीती थी,' और अब उन दबे ख़्वाहिशों को हक़ीक़त में जी लेना चाहती है!

लाल रंग के स्कर्ट, और उनके सुनहरे शॉल की तरफ़ इशारा करते हुए जब मैंने पूछा कि अपनी शॉपिंग क्या वो ख़ुद करती हैं, तो वो हंसते हुए कहने लगीं नहीं, स्कर्ट मेरी बड़ी बहन का है.

उन्हें लग रहा था कि उनकी उम्र के लिए ये बहुत शोख़ है तो उन्होंने ये मुझे दे दिया.

इबोबी सिंह को टक्कर दे रही हैं इरोम शर्मिला

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Image caption तीन बार के मुख्यमंत्री इबोबी सिंह को इरोम शर्मिला टक्कर दे रही हैं

बताती हैं कि एक दिन कैंपेनिंग के बीच रुककर उन्होंने अपने लिए कुछ ख़रीदा. मैंने पूछा क्या, वे बस मुस्कुरा भर देती हैं. गाड़ी में पीछे बैठी उनके साथ आईं दो लड़कियां ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगीं.

इरोम ने पिछले साल अपनी भूख हड़ताल ख़त्म करने के बाद एक राजनीतिक दल - पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलांयस की शुरुआत की है.

इसने तीन उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.

थौबाल में उनकी लड़ाई सूबे के तीन बार मुख्यमंत्री रहे इबोबी सिंह से है.

कल तक उनकी 'इमेज' के सहारे भारतीय ज़ोर-ज़ुल्म की बात करनेवाले मणिपुरियों में से कई अब इरोम शर्मिला को भारतीय इंटेलिजेंस के जाल में फंसा बता रहे है.

वे यह भी कह रहे हैं कि जब नया जीवन ही बनाना है तो जाएं. राजनीति में क्यों?

लेकिन इरोम हतोत्साहित नहीं दिखतीं. उन्होंने एक दिन चुनाव प्रचार में साइकिल पर ही 20 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगा डाला.

कहां से आती है इतनी ऊर्जा?

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आख़िर कहां से आती है उनमें इतनी ऊर्जा, मैं पूछता हूं.

अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में वे कहती हैं, "ये सब ज़हन और खानपान पर निर्भर करता है. हालांकि हम मणिपुरी लोग मुख्य भोजन के तौर पर चावल खानेवालों में से हैं, पर उसमें बहुत कार्बोहाइड्रेट होता है. इसलिए मैं आजकल ज़्यादातर सब्ज़ियों से काम चलाती हूं."

क्या खाना बना सकती हैं वे?

कहती हैं, "अपनी कुक ख़ुद बनना चाहती हूं मैं. लेकिन फिलहाल यह मुमकिन नहीं. समर्थक और जिस परिवार के साथ वे थौबाल में रह रही हैं वही करते हैं ये सब."

उनके टूटे हुए स्क्रीन वाले मोबाइल पर लगातार कॉल्स आते रहते हैं, वो सॉरी कहकर कॉल ले लेती हैं.

जब तक फ़ोन पर उनकी बात ख़त्म होती है, हमारी गाड़ी थौबाल के एक स्कूल में पहुंच जाती है. यहां बच्चों, टीचरों और गांव के कुछ लोग उनके इंतज़ार में जमा हैं.

इरोम पोलिंग एजेंट चुनने वाले फॉर्म पर दस्तख़त करती हैं. कुछ गांववाले भी उनसे मिलते हैं, जिनमें से कुछ को वे अपनी चुनाव सामग्री अपने झोले से निकाल कर देती हैं.

केजरीवाल का इतिहास मणिपुर में दोहराया जाएगा?

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उनके चुनाव प्रचार की रणनीति में दो युवतियां भी शामिल थीं, जो कभी राजनीति के चाणक्य माने जानेवाले प्रशांत किशोर की टीम में काम करती थीं.

पीआरजेए को अरविंद केजरीवाल की ओर से 50,000 रुपए की डोनेशन देने की ख़बर कई जगह छपी थी.

अरविंद केजरीवाल और उनकी दिल्ली में मुलाक़ात भी हुई थी और ये भी ख़बर थी कि वो आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकती हैं.

लेकिन फिर इरोम ने अपनी पार्टी लॉन्च कर दी.

मैंने पूछा कि क्या वे अरविंद केजरीवाल वाला इतिहास दोहराने की ख़्वाहिश रखना चाहती हैं मणिपुर में? वे कोई जवाब नहीं देतीं, चुप रहती हैं.

स्कूल के एक टीचर बच्चों को बार-बार कहते हैं, कम ऑन किड्स मीट हर.

कुछ बच्चे झिझकते हुए उनतक जाते हैं और उनसे मिलते हैं.

सोलह साल पहले की हिम्मत बची हुई है

शर्मिला से मिलने गए दो छात्रों से मैंने पूछा कि वो किससे मिलकर आए हैं.

कक्षा सातवीं में पढ़नेवाले विश्वनाथ मेरे सवाल के जवाब में इधर-उधर देखने लगते हैं.

दूसरे बच्चे को शर्मिला का नाम पता है, लेकिन वे कौन हैं, ये नहीं मालूम.

शर्मिला को बुलाने की बात पर स्कूल के संस्थापक एसबी सिंह कहते हैं, "हम देखना चाहते थे कि जो हिम्मत उनमें उन सोलह सालों में थी वो अब उनमें है कि नहीं."

इस कठिन लड़ाई के वक़्त जब कुछ उन्हें मानसिक रोगी तक कह रहे हैं, डेविड उनके साथ नहीं.

डेविड, जिनके साथ वो नई ज़िंदगी की शुरुआत करना चाहती हैं.

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