नज़रिया: 'करोड़ों बच्चे ना पढ़ पाएंगे, ना मिटा पाएंगे भूख'

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28 फ़रवरी, 2017 को एक ही आदेश से भारत सरकार ने देश के करोड़ों बच्चों की खाद्य सुरक्षा और शिक्षा को ख़तरे में डाल दिया है. इस आदेश के अनुसार उन्हीं बच्चों को मिड डे मील दिया जाएगा जिनके पास आधार कार्ड है.

आंकड़ों से पता चलता है कि दोपहर का भोजन चालू करने के बाद स्कूलों में नामांकन एवं उपस्थिति दोनों में ही इज़ाफ़ा हुआ है. यह ऐसी पहल रही है जिसे सारे नीति निर्माताओं का समर्थन मिला है.

आधार कार्ड अनिवार्य क्यों?

आधार कार्ड प्राप्त करके बायोमेट्रिक रिकॉर्ड को काम में लाना सबसे ग़रीब और कामकाजी परिवारों के लिए सबसे मुश्किल होता है.

ग़रीब बच्चे ऐसे परिवारों से होते हैं जहां स्कूल के अलावा माता-पिता का काम में हाथ बंटाने ज़रूरत रहती है. इनमें से कई बच्चों का बायोमेट्रिक चिन्ह प्रभावित होने की संभावना होती है जिससे मशीन को पहचान करने में दिक्क़त होती है.

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सरकारी अधिकारियों का कहना है कि अब तक 20 करोड़ बच्चों के आधार कार्ड नहीं बन पाए हैं और उनके बनते ही दोपहर का भोजन पाने का अधिकार उन्हें मिल जाएगा.

इस आदेश के साथ सरकार ने एक बार फिर दिखा दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के छह आदेशों को नकारती रहेगी.

उन आदेशों में शीर्ष अदालत ने ये स्पष्ट किया है कि आधार अनिवार्य नहीं हो सकता है.

मिड डे मील मामला: प्रिंसिपल को 17 साल की सज़ा

सरकार पहले ही गैस कनेक्शन, राशन और नरेगा जैसे जन कल्याणकारी योजनाओं सहित 36 कार्यक्रमों में आधार को अनिवार्य कर चुकी है.

ख़बर है कि सरकार 50 और कार्यक्रमों में आधार को अनिवार्य बनाने वाली है. सरकार किसी भी तरीके से हर भारतीय को आधार नंबर दिलाने पर तत्पर है.

लेकिन इतनी तत्परता क्यों?

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सरकार का कहना है कि आधार से तीन लाभ होंगे.

पहला लाभ - ये भ्रष्टाचार पर रोक लगाएगा. दूसरा - आधार के इस्तेमाल से सरकारी कार्यक्रम ज़्यादा अच्छी तरह लागू किए जा सकेंगे और तीसरा - जो लोग अभी तक आधार से नहीं जुड़े हैं उन्हें भी इससे जोड़ा जा सकेगा ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल सके.

अब ज़रूरी है कि ये देखा जाए कि जिन कार्यक्रमों में आधार को अनिवार्य किया गया है उनमें ये उद्देश्य किस हद तक पूरे हुए हैं.

आधार कोई पहचान पत्र नहीं है बल्कि यह लोगों को प्रमाणित करने का यंत्र है.

बिना बायोमेट्रिक प्रमाण को काम में लिए आधार एक बिल्कुल फ़र्ज़ी दस्तावेज़ हो सकता है. आधार कार्ड का तो कहीं से भी प्रिंट आउट लिया जा सकता है. आधार नंबर प्रमाणित तभी होता है जब वह व्यक्ति अपनी उंगलियों या आंखों के निशान से इसकी पुष्टि करे.

राजस्थान में पिछले लगभग एक साल से बायोमेट्रिक पुष्टि के आधार पर राशन बांटा जा रहा है.

राजस्थान में सितंबर, 2015 से तीन चरणों में राशन की दुकानों में बायोमेट्रिक पुष्टि के लिए मशीनें बंटने लगीं. सितंबर, 2016 से राशन लेने के लिए यह अनिवार्य हो गया कि लाभान्वित परिवार के सदस्य को अपना अंगूठा या निशान प्रमाणित करना पड़ेगा.

राजस्थान में खाद्य सुरक्षा क़ानून के तहत लगभग एक करोड़ परिवार लाभान्वितों की सूची में हैं. लेकिन सरकार की वेबसाइट के अनुसार सारी कोशिशों के बाद लगभग 25 लाख परिवार राशन नहीं ले पा रहे हैं. इसके कई कारण हैं- जैसे कि कई लोगों की उंगलियों और अंगूठे के निशान प्रमाणित होते ही नहीं हैं.

ऐसे मामलों में पूरा गांव साक्ष्य देने को खड़ा हो सकता है कि दावा कर रहा व्यक्ति सही है, लेकिन बायोमेट्रिक पहचान की समस्या ये है कि वहां मशीन ही भगवान है. मशीन ख़राब हो जाए तो पूरे गांव के राशन का हक़ ख़तरे में पड़ जाएगा.

'सरकारी स्कीमों के लिए आधार कार्ड ज़रूरी नहीं'

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मशीन ही है सर्वेसर्वा

हर व्यक्ति को यूआईडी के सर्वर से ही प्रमाणित करना होगा. जब दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में नेट नहीं मिलता तो दूरदराज़ के गांवों का क्या कहना?

राशन डीलर के पीछे-पीछे लोग पहाड़ों और रेत के टीलों और पेड़ों पर चढ़कर नेट का कनेक्शन ढूंढते हैं. कई लोगों ने तो इससे थक कर राशन की दुकान में जाना ही बंद कर दिया.

उनका आंकड़ा उन 25 प्रतिशत लोगों में जुड़ गया. यह है समावेश की कहानी- 25 प्रतिशत लाभार्थी वंचित.

''आधार' कार्ड कितना ज़रूरी, कितना ग़ैरज़रूरी?

जिनको मिल रहा है उनमें भी उतना ही भ्रष्टाचार जारी है जितना पहले था. कुछ जगह तो राशन डीलर पैसा कमाने के लिए और भी ज़्यादा चोरी करने लगे हैं.

अंगूठा लगवाकर भी राशन की चोरी हो रही है जहां डीलर उस ग़रीब व्यक्ति को यह कह कर भगा देता है कि तुम्हारी पुष्टि नहीं हुई है.

कई डीलर रसीद देते ही नहीं हैं. ऐसे में लाभार्थी के पास पहले के राशन कार्ड में जो लिखित प्रमाण होता था, वह भी आज नहीं मिल पाता.

जहां तक कार्यक्रम को चुस्त और सफल बनाने की बात है तो किसी भी दुकान में आधा घंटा बिताने के बाद पता चलेगा कि राशन बांटने में कितना ज़्यादा वक्त लग रहा है और कितनी बार और कितना समय बर्बाद हो रहा है.

किसी भी गांव में पूछो तो एक आवाज़ में लोग कहेंगे कि इस मशीन को हटाओ.

यही कहानी पेंशन की है और ऐसी ही कहानी नरेगा में दिख रही है. फिर भी हम उस मशीन को बच्चों, उनके पोषण और उनकी शिक्षा के बीच में बाधा बना रहे हैं.

इस आदेश को तुरंत वापस लेने की ज़रूरत है. कई लोग सुप्रीम कोर्ट जाने की सोच रहे हैं. एक तरफ़ सरकार कोर्ट और संसद में कहती है कि आधार अनिवार्य नहीं है और दूसरी तरफ़ आदेश निकालती है कि आधार का प्रमाण ज़रूरी है.

भारत के लोगों को समझ लेना चाहिए कि ये सारे क़दम कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने तथा भारत की जनता पर निगरानी रखने के लिए उठाए जा रहे हैं.

जन कल्याणकारी योजनाओं को बचाना है तो इस निराधार यूआईडी (आधार) की अनिवार्यता को हर हालत में ख़त्म किया जाना चाहिए.

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