खांसते हैं तो थूक भी कालिख सी निकलती है

  • 7 मार्च 2017

जयश्री शर्मा सोनभद्र के रहने वाले है और चंदासी कोयला मंडी में पिछले दो सालों से काम कर कर रहे हैं.

मंडी के एक कोने में वो दिन का खाना खा रहे थे.

दुबली कद काठी. चेहरे से लेकर पांव कालिख से पुता हुआ. सामने रखी थाली में चावल दाल.

जयश्री दिन का 50, 100 या 200 रुपए मज़दूरी करके कमा लेते हैं. उनका काम है मध्य प्रदेश, झारखंड आदि प्रदेशों से आ रहे कोयले को उतारकर आगे जाने वाले ट्रकों में लादना.

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Image caption जयश्री शर्मा

एक टन उठाने पर उन्हें 40 रुपए मिलते हैं. काम होता है सीढ़ी लगाकर ट्रक पर चढ़ना और भारी कोयले के पत्थरों को एक ट्रक से उठाकर दूसरे ट्रक में डालना.

उनके चारों से ज़मीन कालिख से पटी थी. ये कालिख हवा में भी तैर रही थी. कुछ कालिख उनकी प्लेट से होती हुई उनके फेफड़ों, उनके शरीर तक पहुंच रही थी. न मास्क, न आस पास कोई डॉक्टर.

जयश्री जब खांसते हैं तो थूक भी कालिख बन कर निकलती है. ये कालिख उनकी चमड़ी का हिस्सा है. रोआं खींचो तो काला मैल निकलता है. लैट्रिन भी काली निकलती है. पसीने से भी कोयला निकलता है.

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उन्हें पता है कि उनकी ज़िंदगी हर दिन छोटी हो रही है.

वो कहते हैं, "गांव में ज़मीन पर बंधुआ मज़दूरी करता था. मजबूरी में यहां ज़हर निगल रहा हूं."

Image caption कोयला मंडी के अध्यक्ष धर्मराज यादव

चंदासी कोयला मंडी देश की सबसे बड़ी कोयला मंडी है. मंडी अध्यक्ष धर्मराज यादव के मुताबिक़, यहां हर महीने 50 करोड़ रुपये का व्यापार है लेकिन अनाधिकारिक आंकड़ा बहुत ज़्यादा है.

धर्मराज यादव के अनुसार, मास्क खरीदने की ज़िम्मेदारी कांट्रैक्ट पर काम कर रहे मज़दूरों की है.

वो कहते हैं कि मंडी में हर दिन 300 गाड़ियां आती हैं. एक अन्य मज़दूर ने बताया यहां 1500 गाड़ियां कोयला लेकर आती हैं और हर ट्रक पर दो लाख का कोयला होता है जिसमें सस्ती राख मिलाकर उसे बेचा जाता है.

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चंदासी चंदौली विधनासभा में आता है जहां आखिरी सातवें चरण में आठ मार्च को मतदान होगा.

इस आखिरी चरण में उत्तर प्रदेश की 40 विधानसभा सीटों के लिए मतदान होना है.

चंदासी पहुंचते ही कोयले की राख चारों ओर दिखती है. सड़क के दोनों तरफ़ ट्रक कोयले से भरे हैं. यहां करीब 600 रजिस्टर्ड व्यापारी हैं.

दुकानों में खुली रखी मिठाइयों पर भी पतली सी काली पर्त जम गई थी.

हमने एक गली का रुख किया. हर कदम रखते ही काला गर्दा उड़कर हमारे कपड़ों तक पहुंच रहा था.

चारों ओर गाड़ियों पर कोयला लादा जा रहा था. एक आंकड़ा है कि यहां करीब 10,000 मज़दूर काम करते हैं.

चलते चलते हम एक कंपाउंड पहुंचे जहां एक कोठरी में कुछ मज़दूर बैठे थे. यहां हमें 52 वर्षीय नारायण राम मिले.

इस छोटी सी कोठरी में अंधेरी रात में 15 से 20 लोग सोते हैं.

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मच्छरों और मोमबत्ती के साथ रात कटती है. लोग खांसते खांसते अपनी बात रखते हैं. अगर आप काम करेंगे तो आपको रोटी मिलेगी नहीं तो नहीं.

Image caption नारायण राम

नारायण राम बिहार के हैं. पिछले 35 सालों से यहां काम कर रहे हैं. कोठरी में इंट के स्लैब पर एक पुराना काले मैले कपड़े पर वो लेटे हुए थे.

बारिश के समय कोठरी भी टपकती है.

गर्मी में बाहर काली ज़मीन पर नीचे गमझा बिछा कर ये लोग सो जाते हैं.

उन्होंने कहा, "कोयले ने यहां हर चीज़ को काला कर दिया है."

राजनाथ ने बताया बीमार पड़ते हैं तो गुड़ और अज्वाइन खा लेते हैं तो उससे राहत मिलती है, गर्दा काटता है.

जब यहां हवा चलती है तो पूरी मंडी को धुआं ढक लेता है. जब कोयले की राख से किसी मज़दूर के जीवन का दीपक बुझाने के क़रीब पहुंचता है तो उसे वापस घर भेज दिया जाता है.

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एक स्थानीय मज़दूर ने बताया, "चुनाव से हमारी ज़िंदगी में कोई सुधार नहीं होता. पैसा बड़े-बड़े बाबू लोगों के पास जाता है. मज़दूरों के लिए मच्छर हैं."

मोटे मोटे मच्छरों के काटने से मज़दूरों के शरीर पर दाग पड़ गए हैं.

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खाना पास ही किचन में बनता है. तीन पतीलों में चावल, दाल और सब्ज़ी बनी थी. किचन का खर्च भी मज़दूर खुद उठाते हैं.

प्रदूषण के कारण इस मंडी को हटाने की बात कुछ समय पहले उठी थी, लेकिन मंडी अध्यक्ष ने इसे निरस्त कर दिया.

कारण यहां से स्टेशन नज़दीक है, बैंक नज़दीक है और हटाने का खर्चा बहुत आएगा.

धर्मराज कहते हैं कोयला उनकी ज़िंदगी को भी छोटा कर रहा है लेकिन क्या करें, ये काम है और प्रदूषण कम करने की ज़िम्मेदारी सरकार की है.

नारायण राम का एक लड़का हैदराबाद में बीटेक कर रहा है. कमाई से जो बचता है, उसे घर भेज देते हैं.

कम से कम उनके बच्चे इस काम को करने के लिए मजबूर न हों और उनकी ज़िंदगी ये कालिख छोटी न कर दे.

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