दिल्ली विश्वविद्यालय के निलंबित प्रोफ़ेसर साईबाबा को उम्र क़ैद

  • 7 मार्च 2017
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Image caption जीएन साईंबाबा

महाराष्ट्र की एक अदालत ने दिल्ली विश्वविद्यालय के निलंबित प्रोफ़ेसर जीएन साईबाबा और चार अन्य को माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है.

इसके अलावा एक अन्य अभियुक्त विजय तिर्के को दस साल की सज़ा हुई है.

साईंबाबा के वकील सुरेंद्र गडलिंग ने नागपुर से फ़ोन पर बीबीसी को बताया कि महाराष्ट्र की गढ़चिरौली अदालत ने यूएपीए के सेक्शन 13, 18, 20 और 39 के तहत इन्हें दोषी पाया था.

उन्होंने बताया कि कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद ही सभी अभियुक्तों को हिरासत में ले लिया गया और उन्हें नागपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया.

गडलिंग ने साईबाबा के इलाज और मददगार देने को लेकर अदालत में एक अपील की थी, लेकिन अदालत ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा कि उन्हें जेल मैनुअल के मुताबिक दवा और अन्य सुविधाएं दी जाएंगी.

उनका कहना है कि जल्द ही इस फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में अपील की जाएगी.

साईबाबा की पत्नी वसंथा ने बीबीसी से कहा कि उन्हें इस फैसले से हैरानी हो रही है.

उन्होंने कहा, "मैं इस मामले में रिहाई की उम्मीद कर रही थी. क्योंकि जो आरोप लगाए गए उनमें कोई दम नहीं था."

वसंथा ने कहा, "मेरे पति की सेहत अभी बहुत खराब है. दो साल तक जेल में रहने के कारण उनके किडनी में स्टोन हो गया है और उनका बायां हाथ भी सुन्न पड़ गया है. पिछले हफ्ते ही डॉक्टर ने ऑपरेशन कराने और पूरी तरह बेड रेस्ट लेने की सलाह दी है."

कन्हैया, उमर और अनिर्बान पर अभिमान:

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आजीवन कारावास की सज़ा पाने वाले अन्य लोगों में जेएनयू के पूर्व छात्र हेम मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार एवं मानवाधारिकार कार्यकर्ता प्रशांत राही, आदिवासी महेश तिर्के और पांडु नारोट का नाम शामिल है.

हेम मिश्रा और प्रशांत राही को 2013 में गढ़चिरौली और उत्तराखंड से गिरफ्तार किया गया था. इन पर माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप थे.

अंग्रेज़ी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को दिल्ली में उनके घर से महाराष्ट्र पुलिस ने 2014 में गिरफ्तार किया था.

वो पक्षाघात के मरीज़ हैं और 90 प्रतिशत विकलांगता की श्रेणी में आते हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता साईबाबा के घर पुलिस छापा

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बिगड़ती सेहत के आधार पर उन्हें जुलाई 2015 में जमानत पर रिहा किया गया था.

साईबाबा बतौर सामाजिक कार्यकर्ता, रेवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की भी एक संस्था से जुड़े रहे हैं.

जानी मानी लेखिका अरुंधती राय ने साईबाबा के बारे में लिखे एक लेख में न्यायपालिका की आलोचना की थी, जिस पर विवाद बढ़ गया था.

इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने उन्हें अवमानना का नोटिस भेजा था.

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