ELECTION SPECIAL: लगता है नेताओं ने यूपी के दुद्धी का नाम नहीं सुना!

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सोनभद्र ज़िले की दुद्धी विधानसभा क्षेत्र में एक गांव है कुस्महा. टूटी-फूटी सड़क से कुछ दूर बने छोटे से कच्चे घर के बाहर चारपाई पर बैठीं रामरती के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है साफ़ पानी.

ये उनके लिए चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि ज़िंदगी का मुद्दा है. रामरती की उम्र अभी कोई पचास-बावन साल की ही है, लेकिन उनकी पीठ झुक गई है.

दोनों टांगें धनुष का आकार ले चुकी हैं और हाथ किसी तरह से बांस के एक डंडे को पकड़ भर पाते हैं ताकि वो कुछ देर के लिए खड़ी हो सकें और चल सकें.

रामरती के पास ही उनकी देवरानी दुर्गा खड़ी थीं. उन्हें भी ऐसी ही दिक़्क़त है और चलने फिरने में असमर्थ हैं. रामरती बताने लगीं कि उनकी ये हालत पिछले छह-सात साल से है, पहले वो एक़दम ठीक थीं.

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दरअसल, ये समस्या न सिर्फ़ रामरती और दुर्गा की है बल्कि इस इलाक़े के कई गांवों में आम है. आस-पास के उद्योगों से निकलने वाले फ़्लोराइड की वजह से यहां का पानी प्रदूषित हो चुका है.

इसलिए सीधे तौर पर हैंडपंप या कुंओं का पानी पीने से फ्लोरोसिस नाम की ये बीमारी हो जाती है. इस बीमारी से बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक पीड़ित हैं.

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पास के हैंडपंप पर पानी पीने की कोशिश कर रहे कुछ बच्चे भी ऐसे ही मिले. इनमें कुछ के पैर तो इतने ख़राब थे कि वो चल भी नहीं पा रहे थे. फ्लोरोसिस का असर इन बच्चों के दांतों पर भी साफ़ दिखता है.

कुस्महा गांव के ही सीताराम घरों में सफेदी का काम करते हैं. देखने में हृष्ट पुष्ट हैं लेकिन पैरों से मजबूर.

बताते हैं, "पहले मैं गांव में अखाड़े का आयोजन कराता था, ख़ुद भी अखाड़ा लड़ता था लेकिन आज बड़ी मुश्किल से पैदल चल पाता हूं. कमर के ऊपर बिल्कुल ठीक हूं लेकिन पैरों की हड्डियां जैसे टेढ़ी होती जा रही हैं. जबकि घी-दूध खाने में कोई कमी नहीं है."

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छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्यप्रदेश की सीमाओं से लगे इस ज़िले में हिंडाल्को जैसी बड़ी एल्युमिनियम फ़ैक्ट्री के अलावा कई बड़े पॉवर प्लांट हैं. इसके बावजूद यहां के कई गांवों में अभी बिजली नहीं पहुंची है.

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स्थानीय पत्रकार जगत नारायण विश्वकर्मा कहते हैं, "पिछले एक दशक से यहां के लोग फ़्लोरोसिस से परेशान हैं. बीमारियों का मुख्य कारण यहां स्थापित क़रीब एक दर्जन पॉवर प्रोजेक्ट हैं, जो अपना कचरा सीधे रिहंद बांध में छोड़ते हैं. इसकी वजह से इलाक़े का पानी पूरी तरह प्रदूषित हो गया है."

वो कहते हैं, "इस प्रदूषित जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है जिसकी वजह से गांवों के लोग दांतों में धब्बे पड़ जाना, हाथ-पैर टेढ़े हो जाना, जोड़ों में दर्द, विकलांगता जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं."

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दरअसल, देश के बड़े पॉवर हब के रूप में जाना जाने वाला सोनभद्र ज़िला इस विकास की बड़ी कीमत चुका रहा है.

लोगों का आरोप है कि विकास का लाभ बाहर से आकर दूसरे लोग उठा रहे हैं जबकि स्थानीय लोगों के लिए विकास तो दूर की बात, वो विकास की क़ीमत अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगाकर दे रहे हैं.

हालांकि ऐसा नहीं है कि इसके लिए कोई कोशिश नहीं की गई. बल्कि कंपनियों और सरकार ने भी गांवों में पानी साफ़ करने के लिए आरओ प्लांट लगवाए हैं, लेकिन ये प्लांट किसी गांव को मिले और किसी को नहीं.

गांव वाले कहते हैं कि अधिकारियों और प्रधान की मर्ज़ी से कहीं-कहीं तो दो-दो, तीन-तीन प्लांट लग गए हैं और कहीं एक भी नहीं.

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पास के एक अन्य गांव गोविंदपुरी के दीनानाथ कहते हैं, "बीमारियों के चलते गांव के लोगों को अब शादी करने के लिए भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. कोई व्यक्ति हमारे गांवों में अपनी लड़कियों की शादी नहीं करना चाहता."

हालांकि प्रशासन की ओर से कई बार शिविर लगाकर यहां मरीजों का इलाज किए जाने के आदेश जारी हो चुके हैं, लेकिन गांव वालों के मुताबिक ये सब सिर्फ़ कागज़ी बातें हैं.

वहीं डॉक्टरों का कहना है कि इस समस्या इलाज नहीं है, सिर्फ़ इससे बचा ही जा सकता है.

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इलाक़े की ज़्यादातर आबादी जनजातियों की है. आगामी आठ मार्च को यहां विधान सभा चुनाव होने हैं.

दुद्धी और ओबरा विधानसभा को चुनाव आयोग ने इस बार अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर रखा है.

हालांकि इसके ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई लेकिन फ़िलहाल हाईकोर्ट ने यही व्यवस्था लागू रखने की बात कही है.

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चुनाव में राजनीतिक दलों की उपेक्षा के भी ये इलाक़े शिकार हैं.

क़रीब 150 किमी की दूरी पर स्थित वाराणसी में जहां रैलियों और रोड शो की भरमार रही, वहीं दुद्धी में 5 मार्च को सिर्फ़ एक बड़े नेता राहुल गांधी ने जनसभा की है.

बहरहाल, चुनाव में मुद्दे तलाशे और गढ़े जा रहे हैं, लेकिन सच में यदि मुद्दे ढूंढने हों तो ऐसे इलाक़ों का ही रुख़ करना होगा.

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