हॉर्मोन और लक्ष्मण रेखा पर मेनका को जवाब

  • 8 मार्च 2017
मेनका गांधी

केंद्र सरकार में बाल विकास एवं परिवार कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि लड़कियां शाम के बाद घर पर ही रहें क्योंकि इसके बाद उनका हार्मोनल आउटबर्स्ट होता है.

इस बयान की सोशल मीडिया पर आलोचना भी हो रही है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में लड़कियों को हॉस्टलों में शाम के बाद बाहर निकलने देने के लिए मुहिम चला रही पिंजड़ा तोड़ अभियान की एक सदस्य ने केंद्रीय मंत्री को ये चिट्ठी लिखी है.

प्रिय मेनका गांधी जी,

मीडिया और समाज को दी गई आपकी नसीहत के लिए मन से एक ही आवाज़ निकलती है, "मोहतरमा, अख़बार खोलिए या गूगल कीजिए- "वीमेन स्टूडेंट प्रोटेस्ट". आपके ख़्यालों पर अनेकों भाषाओं में सैकड़ों छात्राओं की विस्तृत टिप्पणी आपको अपने आप ही मिल जाएगी.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दो-तीन दिन पहले टीवी, अख़बारों और फ़ेसबुक पर, कहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी के आन्दोलन में महिलाओं के बड़े तबके की भागीदारी की तस्वीरें थीं, तो कहीं मुंबई यूनिवर्सिटी में आन्दोलन की मांगें पूरी होने पर छात्राओं के संघर्ष में एकजुटता भरे पोस्ट. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में छात्राओं का चल रहा आंदोलन भी बुलंद खड़ा है.

इस महिला दिवस की तैयारी हम इस उत्साह से कर रहे थे कि महिलाओं की आज़ादी और नारीवादी सोच के तर्क-वितर्कों की रेखा में थोड़ा ही सही परिवर्तन तो आया.

तभी आपके बयान ने हमें जैसे बचपन की रामायण की कहानियों में फिर धकेल दिया, जहाँ कोई हमें "लक्ष्मण रेखा" का हवाला देकर हमारे दायरे और उनका महत्व समझा रहा हो.

आप उसी सरकार की महिला और बाल कल्याण विकास मंत्री हैं जो "महिला सशक्तिकरण", "सेल्फी विद डॉटर" और "मेक इन इंडिया" जैसे कैंपेन के ज़रिए महिलाओं के विकास की बात करती है.

आपके बयान ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि इन आंशिक सफलताओं के बावजूद हम अब भी एक जाति और वर्ग विभाजित पितृसत्तात्मक समाज में जी रहे हैं, जहाँ लोगों के सोच, अधिकार और आज़ादी के पहरेदार सरकार में ही बैठे हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पिंजरा तोड़ अभियान

मंत्री महोदया, हमारे गुस्से के पीछे हमारे "हॉरमोंस" नहीं बल्कि आपकी भेद-भाव पूर्ण सोच है, जो आज शहर-शहर में छात्राओं को संघर्ष के रास्ते पर उतरने को मजबूर कर रही है.

साथ ही लक्ष्मण रेखा खींच कर, नस्ल की शुद्धता बरकरार रखने की चिंता को आप शांत कर लें क्योंकि छात्राओं के आन्दोलनों के साथ ही दलित छात्र-छात्राओं का आंदोलन भी कॉलेज दर कॉलेज ज़ोर पकड़ रहा है, और इन आन्दोलनों के बीच बातचीत भी.

रही बात "सुरक्षा" की. सड़कें तो तब सुरक्षित होती हैं जब ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं सड़कों पर होती हैं. जब उन पर अँधेरा नहीं स्ट्रीट लाइट्स होती हैं.

न की तब जब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली महिलाओं के उस तबके को, जिनको हॉस्टल मिला है उसे सात बजे प्रशासन ख़ुद बंद कर दे और दूसरे तबके को सबसे ज़्यादा सुरक्षित होने का दावा करने वाले पीजी ओनर्स भी रात को असुरक्षित बता कर कैद कर लें.

फिर जो बहुत कम महिलाएं बचें उनके लिए ऐसा माहौल बना दें कि वे अपनी आज़ादी को अपने होने का दावा कर के भी उसे अपना नहीं पायें.

एक बात तो आपने ठीक कही पर बहुत ख़राब ढंग से कही.

आपने कहा, "महिलाओं की सुरक्षा 'दो बिहारी सिक्योरिटी गार्ड के डंडों' पर नहीं छोड़ी जा सकती".

हाँ सच है. दो या बीस. बिहारी हों, तमिल हों, पंजाबी हों, आपकी अपनी दिल्ली के हों या "आपके अपने देश भारत" के किसी राज्य के हों. उनको गेट पर खड़ा करने से आज़ादी नहीं मिलेगी, न ही महिलाओं को क़ैद करने से.

आधी रात को सड़कों पर निकलती हैं ये औरतें

मगर आपका ये असम्मानजनक कमेन्ट दर्शाता है कि न ही आप छात्राओं की इज्ज़त करती हैं, न ही देश में आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की, न ही मेहनत करने वाले लोगों की.

अभी तक तो आठ मार्च को आप लोग महिलाओं को छुट्टी देकर, फूलों के गुलदस्ते देकर, कम से कम एक दिन नाममात्र उन्हें "सम्मान" देने की बात करते थे. पर अब शायद आपकी सोच आप ही की बनाई "लक्ष्मण रेखा" के अन्दर अटक गई है.

याद रखिएगा जिस यूनिवर्सिटी में महिलाओं के लिए यह रूढ़िवादी कानून आप बना रही हैं, इनकी नींव ही जाति, वर्ग व्यवस्थित और पितृसत्तात्मक समाज को दी गई सावित्री बाई की चुनौती में पड़ी है. शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी ऐसी तगड़ी संघर्षरत नींव पर बढ़ रही इमारत है.

आपकी संकीर्ण सोच के पिंजड़े इसे क़ैद नहीं कर सकेंगे. आप जो कहिए, जो करिए, हम तो ये पिंजड़े तोड़ेंगे, इतिहास की धारा मोड़ेंगे!

(पिंजरा तोड़ दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों की छात्राओं का आंदोलन है जो उच्च शिक्षा में महिलाओं की परिपूर्ण भागीदारी संभव बनाने के लिए संघर्षरत है.)

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