खिसकाया जा रहा है टीपू सुल्तान का शस्त्रागार

  • 10 मार्च 2017
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ये एक ऐसा अभियान है जिसे भारत में पहले कभी अंजाम नहीं दिया गया. 220 साल पुराने एक ऐतिहासिक ढांचे को 150 मीटर दूर खिसकाया जा रहा है.

इसका वज़न 850 टन है. दरअसल ये ढांचा एक रेल लाइन के रास्ते में आ रहा था और इसे बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है.

इस ढांचे की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये मैसूर के शेर कहे जाने वाले टीपू सुल्तान का शस्त्रागार था.

1799 के ब्रिटिश-मैसूर युद्ध में टीपू ने हथियारों के इसी जख़ीरे की मदद से अग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग लड़ी थी. विज्ञान के विकास में टीपू का योगदान इतिहास का हिस्सा है.

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वे टीपू ही थे जिन्होंने युद्ध में पहली बार रॉकेट का इस्तेमाल किया था, लेकिन ये बात बहुत कम लोगों को पता है कि टीपू ने मैसूर से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में हथियारों के आठ भंडार बनवाए थे.

गोला बारूद

टीपू की इस निशानी को एक अमरीकी और एक भारतीय कंपनी मिलकर 30 फ़ुट लंबी और 40 फुट चौड़ी इमारत को खिसका रही हैं. ये ढांचा ज़मीन में 12 फुट गहरा है.

इसका मक़बरे जैसा एक हिस्सा ज़मीन के ऊपर दिखता है. ज़मीन में गहरे धंसे होने की इसकी वजह भी कम दिलचस्प नहीं है.

इसका मक़सद गोला-बारूद को ठंडा रखना था ताकि इसे कभी भी इस्तेमाल में लाया जा सके. पिछले तीन दिनों में इस ढांचे को 37 लिफ्टिंग जैक्स के जरिए 100 मीटर खिसकाया गया है.

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दक्षिण पश्चिमी रेलवे के डिप्टी चीफ़ इंजीनियर रवि चंद्रन ने बीबीसी हिंदी को बताया, "ढांचे की बुनियाद पत्थर से बनी है. हम इसे नहीं उठा सकते थे. इसलिए हमने इसके नीचे जगह बनाकर इसमें बीम डाल दिया ताकि एक फ़्रेम जैसी आकृति बन जाए. बिल्डिंग के नीचे इस फ़्रेम को तैयार करने के लिए पांच प्रमुख बीम और 11 क्रॉस बीम डाली गई है. फ़्रेम के नीच जैक्स फ़िट किए गए हैं ताकि बिल्डिंग को उठाकर खिसकाया जा सके."

रेलवे का रोल

इस इमारत को बनाने में चूना-पत्थर, अंडे, गुड़ और रीठे का इस्तेमाल किया गया है. ढांचे के नीचे बीम फ़िट करने की प्रक्रिया कुछ हफ्ते पहले ही शुरू कर दी गई थी.

रेलवे अधिकारियों ने ये स्वीकार किया कि बिल्डिंग के आस-पास की जगह को खाली करने में थोड़ा वक्त लग गया. बिल्डिंग को खिसकाने के लिए लगाए गए जैक्स उसके 14 फुट नीचे फ़िट किए गए हैं.

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इसका हाइड्रॉलिक सिस्टम इसे एक घंटे में तीन फ़ुट तक खिसका सकता है.

टीपू की निशानी

ये काम संभाल रही अमरीकी कंपनी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर जैमिन बकिंघम ने कहा, "इस परियोजना की अपनी चुनौतियां हैं. इमारत की दीवारें एक मीटर मोटी हैं और ये ज़मीन में गहरे तक धंसी हुई हैं. हमें इसके आस-पास काफी खुदाई करनी पड़ी. हम इस बात का पूरा ख्याल रखना था कि हम क्या कर रहे थे. हमें इससे बहुत कुछ सीखने को मिला."

100 मीटर तक सीधे खिसकाए जाने के बाद अब इसे 30 मीटर दाहिनी ओर खिसकाया जा रहा है. वहां पर इसे रखने के लिए पहले से एक प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है.

रवि चंद्रन ने बताया कि हम शुक्रवार तक पूरी प्रक्रिया खत्म कर लेंगे. रेलवे बेंगलुरु-मैसूर रेलवे ट्रैक के दोहरीकरण की प्रक्रिया को जल्दी पूरा करना चाहती है और टीपू की निशानी को बचाने के लिए उसने 13.5 करोड़ रुपए खर्च किए हैं.

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प्रोजेक्ट से जुड़ी भारतीय कंपनी पीएसएल इंजीनियरिंग के डायरेक्टर मुकुट शर्मा कहते हैं, "इस इमारत को खिसकाने के लिए ज़रूरी मंजूरी मिलने में काफी वक़्त लगा. हमारी टेक्नॉलॉजी को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने मंज़ूरी दी."

लेकिन इतिहासकार और रिटायर शिक्षाविद प्रोफ़ेसर शेख अली टीपू की इस इमारत को खिसकाए जाने को अलग नज़रिए से देखते हैं.

वे कहते हैं कि श्रीरंगपट्टनम में टीपू के ऐसे सात शस्त्रागार और हैं. सभी की हालत ख़राब है और इसके अलावा भी ऐतिहासिक महत्व की दूसरी इमारतें है जिन्हें कोई देखने वाला नहीं है.

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