मायावती और अखिलेश के साथ आने में पेंच क्या?

  • 10 मार्च 2017
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में खंडित जनादेश मिलने की स्थिति में क्या प्रदेश के कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मायावती और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी में दोस्ती हो संभव है? इस सवाल पर बीबीसी हिंदी को दिए अखिलेश यादव के दिए इंटरव्यू के बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं.

अखिलेश यादव ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वह प्रदेश में राष्ट्रपति शासन नहीं चाहेंगे क्योंकि बीजेपी रिमोट कंट्रोल से यहां सत्ता चलाएगी.

अखिलेश के इस बयान को बिहार में लालू और नीतीश के साथ आने की तर्ज पर देखा जा रहा है. हालांकि लालू और नीतीश ने बिहार में चुनाव से पहले ही गठबंधन कर लिया था. क्या नीतीश और लालू की तर्ज पर मायावती और अखिलेश के बीच गठबंधन संभव है?

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दरअसल, यह बहुत ही पेचीदा और मुश्किल सवाल है. इस सवाल पर समय से पहले विचार किया जा रहा है क्योंकि अभी चुनावी नतीजे कुछ घंटे दूर हैं. ऐसे में इस बात का केवल अनुमान लगाया जा रहा है और केवल अनुमान के दम पर ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं.

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ये कयास इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश के बाहर कई ऐसे नेता हैं जो 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी के ख़िलाफ़ गोलबंदी को मजबूत करना चाहते हैं.

इन नेताओं में ममता बनर्जी और लालू प्रसाद यादव जैसे नेता हैं. ये नेता सभी बीजेपी विरोधी दलों को एक मंच पर लाना चाहते हैं. ये कोई महागठबंधन बनाना चाहते हैं.

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इस तरह की ख़बरें हैं कि ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव और मायावती दोनों से बात की थी. इस बातचीत में इन्होंने कोई नकारात्मक रुख नहीं दिखाया है. राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता.

दोनों पार्टियां एक दूसरे के लिए अछूत नहीं हैं क्योंकि 1993 में दोनों मिलकर सरकार बना चुकी हैं. उसके बाद बहुजन समाज पार्टी का तीन बार भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन हुआ. इसलिए असंभव कुछ भी नहीं है, लेकिन निर्भर इस बात पर करेगा कि किसको कितनी सीटें मिलती हैं.

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सबसे बड़ा पेंच क्या है?

मायावती और अखिलेश के साथ आने में सबसे बड़ा पेंच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर होगा. इसके अलावा और कई पेंच हैं. मायावती तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, वह सीनियर नेता हैं.

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अखिलेश भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं. ऐसे में दोनों के लिए एक-दूसरे का मातहत होकर काम करना आसान नहीं होगा. ऐसे भी संबंध नहीं हैं कि एक मुख्यमंत्री रहे और दूसरा उपमुख्यमंत्री पर संतोष कर ले.

दोनों नेताओं के स्वभाव में पावर शेयरिंग की प्रवृत्ति नहीं है. यदि पावर शेयरिंग का स्वभाव होता तो पहले जो गठबंधन हुए वे बीच में ही नहीं टूटते. इसी तरह से यदि अखिलेश में पावर शेयरिंग की प्रवृत्ति होती तो उनकी पार्टी के भीतर भी झगड़ा नहीं होता.

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अखिलेश ने दिए मायावती के साथ जाने के संकेत

यह काफी मुश्किल पेंच है. एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 2019 में लोकसभा का चुनाव होना है. ऐसे में मायावती का बीजेपी के साथ जाना मुश्किल है.

यदि किसी को बहुमत नहीं मिलता है तो अखिलेश नहीं चाहेंगे कि राष्ट्रपति शासन लागू हो क्योंकि यह बीजेपी के हक़ में होगा. खंडित जनादेश की स्थिति में 1996 में भी ऐसा हो चुका है.

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बहुमत नही आने की सूरत में बीजेपी चाहेगी कि राष्ट्रपति शासन लगे और जो विधायक करोड़ों खर्च कर जीते हैं उन्हें तोड़कर अपने पक्ष में लाया जा सके.

बीजेपी को बहुमत नहीं मिलता है तो इसका मतलब यह भी नहीं है कि वह बहुमत से बहुत दूर रहेगी. यदि बीजेपी को थोड़े बहुमत की ज़रूरत होगी तो वह आराम से जुटा सकती है.

2012 के कैंपेन में मुलायम सिंह ने मूर्तियां तुड़वाने की बात कही थी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. दोनों के बीच अब वैसी कोई दुश्मनी नहीं है. ये पब्लिक को दिखाने के लिए होता है और यह कोई बाधा नहीं है.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा के साथ बातचीत पर आधारित)

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