मोदी और अमित शाह से बड़े इवेंट मैनेजर नहीं हैं पीके

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प्रशांत किशोर यानी पीके 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत का श्रेय ले रहे थे, उनका दावा था कि चाय पर चर्चा जैसे उनके आइडिया की वजह से नरेंद्र मोदी सत्ता में आए.

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उसके बाद भाजपा से उनकी खटपट हो गई, उन्होंने बिहार में भाजपा को हराने की सुपारी ली.

उन्होंने लालू और नीतीश की जोड़ी को जीत दिलाने के लिए पोस्टरों के रंग बदलवाने से लेकर, डीएनए सैंपल तक दिल्ली भिजवाए.

इसके बाद लगा कि पीके के पास कोई जादू की छड़ी है, वो जिस पार्टी के रणनीतिकार बनेंगे उसकी जीत के रास्ते बन जाएँगे.

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यही वजह है भंवर में फँसी कांग्रेस ने अपनी नैया पार लगाने के लिए उनका सहारा लेने का फ़ैसला किया.

बिना किसी पार्टी के साथ वैचारिक जुड़ाव या प्रतिबद्धता के सिर्फ़ अपनी प्रोफ़ेशनल फ़ीस के लिए काम करने वाले पीके एक बार फिर चर्चा में थे.

पीके ने एक तरह से कांग्रेस की कमान संभाल ली, पार्टी के नेताओं की बैठक की अध्यक्षता करने लगे, उन्हें काम बाँटने लगे.

चुनाव और इवेंट मैनेजमेंट

यह चर्चा चल पड़ी कि अब चुनाव भी पूरी तरह इवेंट मैनेजमेंट बन चुके हैं.

उनकी खाट सभा के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने तंज़ करते हुए कहा था कि उनकी खाट खड़ी हो जाएगी, और वही हुआ भी.

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एक बार फिर साबित हुआ कि अगर चुनाव इवेंट मैनेजमेंट है तो मोदी और शाह कहीं बड़े इवेंट मैनेजर हैं.

लोग सपा-कांग्रेस गठबंधन की हार के बाद पूछ रहे हैं कि पीके कहाँ हैं?

यूपी के साफ़ रुझान सामने आते ही बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पीके को 'भाड़े का सैनिक' कहा.

पीके के पिछले कारनामों को भी लोग अब नए ढंग से देख रहे हैं.

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2014 की बीजेपी का जीत का क्रेडिट पार्टी के लोगों ने उनको कभी नहीं दिया, लेकिन बिहार की जीत का श्रेय उन्हें मोटे तौर पर मिला था.

लेकिन इस बार के बाद उनकी प्रोफ़ेशनल सर्विस के कितने ग्राहक मिलेंगे, कहना मुश्किल है.

पीके नेता नहीं हैं, लेकिन राजनीति को अच्छी तरह से समझते हैं, इस बार उन्हें अच्छी तरह समझ में आया होगा कि इस खेल के नियम हर बार बदल जाते हैं.

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