उत्तर प्रदेश विधानसभा नतीजे: "अखिलेश-राहुल से बड़े 'यूथ-आइकन' नरेंद्र मोदी"

  • 11 मार्च 2017
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मतगणना के रुझानों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को काफ़ी झटका लगा है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरॉन के मुताबिक ये साफ़ हो गया है कि अखिलेश यादव औऱ राहुल गांधी के मुकाबले "नरेंद्र मोदी बड़े 'यूथ आइकन' हैं".

बीबीसी बातचीत में उन्होंने कहा, "2014 में भी युवा वर्ग ने नरेंद्र मोदी को पसंद किया और अब एक बार फिर ये साबित हो गया है कि अखिलेश-राहुल की सीमित लोकप्रियता है और मोदी उनके सामने पूरे युवा वर्ग को खींचने में सफल हुए हैं."

हालांकि कई इलाकों में युवा वर्ग अखिलेश यादव के काम की तारीफ़ करता हुआ भी मिलता है लेकिन राहुल के साथ आने से इसमें कोई इज़ाफ़ा नहीं हुआ.

गठबंधन के तहत सपा ने 298 सीटों पर और कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा.

अखिलेश-राहुल के पास मोदी का जवाब नहीं था

गठबंधन फॉर्मूला, सपा 298 और कांग्रेस को 105 सीटें

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता के मुताबिक अखिलेश और राहुल मोदी के आक्रामक भाषण और 'शमशान', 'कसाब' से जुड़े जुमलों का जवाब नहीं दे पाए.

वो कहती हैं, "बिहार में जब ऐसा हुआ तो नितीश और लालू दोनों ने ठीक तरीके से ठोस जवाब दिए और उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी जगह पर राजनीतिक स्तर पर सजग वोटर भाषणों को ध्यान से सुन, विश्लेषण कर मापता रहता है."

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सुनीता ऐरॉन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ आने के फ़ैसले को उस व़क्त की राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक सही बताती हैं.

वो कहती हैं, "अखिलेश के सामने ऐंटी-इनकम्बंसी एक बड़ा फ़ैक्टर थी साथ ही बहुजन समाज पार्टी की वजह से वोट खिसकने का डर था."

हालांकि बिहार से अलग, इस गठबंधन में राहुल गांधी ने जो छह-सात रैलियां की वो उन्हीं इलाकों में थी जहां कांग्रेस के प्रत्याशी लड़ रहे थे.

बिहार में भारतीय जनता पार्टी को टक्कर देने के लिए जनता दल युनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस साथ आए.

स्मिता गुप्ता के मुताबिक, "बिहार का गठबंधन पूरा था, पर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा को या तो बसपा या फिर आरएलडी, पीस पार्टी को भी साथ में लाना चाहिए था."

स्मिता याद दिलाती हैं कि 1993 में जब सपा और बसपा ने एक साथ चुनाव लड़ा था तो दलित, यादव, मुसलमान और काफ़ी हद तक पिछड़ी जाति भी उस गठबंधन से आकर्षित हो गए थे.

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सुनीता ऐरॉन के मुताबिक कांग्रेस को अब और सजग होना होगा क्योंकि पार्टी उत्तर प्रदेश में खुद को दोबारा खड़ा नहीं कर पाई है वहीं यादव परिवार की आपसी कलह ने भी मतदान पर असर डाला.

वो कहती हैं, "अखिलेश यादव को समझना होगा कि उन्हें पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और परिवार के लोगों को साथ लेकर चलने का तरीका निकालना है."

स्मिता गुप्ता भी मानती हैं कि अखिलेश यादव को पहले अपनी पार्टी को संभालना पड़ेगा क्योंकि शिवपाल यादव ने कहा था कि मार्च में वो अपनी पार्टी बनाएंगे और विधानसभा चुनाव में हार के बाद इसकी संभावना बढ़ जाती है.

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स्मिता के मुताबिक कांग्रेस के अंदर से विरोध की आवाज़ें अब और बुलंद होंगी, "ये हार राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े करेगी, लगता है कि पार्टी के कार्यकर्ता तो हैं पर उन्हें अपने नेता पर यकीन नहीं है."

उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे का असर 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव पर भी होगा और भारतीय जनता पार्टी को टक्कर देने के लिए कांग्रेस को गठबंधनों का सहारा लेना होगा.

सुनीता ऐरॉन कहती हैं, "इस असफल प्रयोग के बाद भी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन जारी रखेगी, बल्कि बहुजन समाज पार्टी से भी जुड़ने की सोच सकती है, उसे 2019 के लिए ज़्यादा से ज़्यादा समर्थन चाहिए होगा."

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