नज़रिया: मोदी ने 2019 की दौड़ में बाकियों को पछाड़ दिया?

  • 11 मार्च 2017
बीजेपी, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट EPA

राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ बेजीपी की निर्णायक जीत को साफ़ तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में जनमत के तौर पर देखा जा रहा है.

यह वही प्रदेश है जिसने देश को नौ प्रधानमंत्री दिए हैं, जो राज्यसभा में 80 सांसद भेजता है और राजधानी से बिल्कुल सटा हुआ है.

हालांकि इस चुनाव में किसी भी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के बिना पूरे चुनावी अभियान में नरेंद्र मोदी ही चेहरा रहे.

अपनी भाषण शैली के साथ विकास को मिलाकर उन्होंने समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन और दलित नेता मायावती के रूप में अजेय विपक्ष के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त प्रचार अभियान चलाया.

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तो बीजेपी और उनकी पार्टी के लिये इस जीत के क्या मायने हैं?

सत्ता संतुलन

भारत में अब सत्ता संतुलन निर्णायक रूप से बीजेपी के पक्ष में जा चुका है और यह पार्टी भारतीय राजनीति की धुरी बना गई है.

इस जीत का मतलब है कि बीजेपी बिहार, बंगाल और दक्षिणी राज्यों को छोड़कर राजनीतिक रूप से अधिकांश महत्वपूर्ण राज्यों में सत्ता में आ गई है.

इसके अलावा ऐसा लगता है कि पार्टी भारतीय चुनावों के सामाजिक गणित के खेल में ऊंची, मध्यवर्ती और पिछड़ी जातियों के बीच एक गठबंधन क़ायम करने में सफल रही है.

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दिल्ली के एक थिंकटैंक सेंटर ऑफ़ पॉलिसी रिसर्च के भानु जोशी कहते हैं, "जातीय गणित से वो आगे निकलने में कामयाब रहे. ज़मीन पर बीजेपी को जातीवादी पार्टी नहीं माना जाता है."

नोटबंदी पर मुहर

दूसरी बात है, ऐसा लगता है कि मोदी की पार्टी विवादित नोटबंदी से उबर चुकी है, जिसने अधिकांश लोगों के लिए मुश्किलें पैदा कीं और ग़रीबों और छोटे व्यवसायों को नुकसान पहुंचाया.

राजनीतिक विज्ञानी मिलन वैष्णव का मानना है कि असल में वोट नोटबंदी पर मुहर जैसा है.

वो कहते हैं, "इस नीति के लागू किए जाने को लेकर वोटर परेशान हुए या नहीं, उन्होंन साफ तौर पर फैसला कर लिया था कि प्रधानमंत्री काम करने में विश्वास रखते हैं. जैसा एक पुरानी कहावत है, आप किसी चीज को ऐसे ही मात नहीं दे सकते."

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तीसरे, अपने कार्यकाल के बीच में मोदी 2019 के आम चुनावों में दूसरे कार्यकाल की दौड़ में आगे निकल गए हैं. और यह तब हुआ है जब आर्थिक मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन और सामाजिक तनाव बढ़ने की आलोचनाएं हुईं.

गांधी परिवार

कई में से एक कारण तो विपक्ष था. मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस, पंजाब में जीत हासिल करने के बावजूद पस्त था. लेकिन पार्टी का सर्वेसर्वा गांधी परिवार वोट हासिल करने में असफल रहा.

राजनीतिक विश्लेषक शेखर गुप्ता कहते हैं, "अब कोई भी राज्य गांधी परिवार के लिए वोट नहीं करेगा."

चौथी बात ये कि इस जीत से बीजेपी को राज्य सभा में काफी बढ़त मिलेगी और इससे उन महत्वपूर्ण क़ानूनों को पास करने में मदद मिलेगी, आलोचक जिनमें से कुछ को बढ़िया और कुछ को औसत मानते हैं.

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और अंत में, जनता से संवाद का मोदी का तरीक अभी भी कारगर है. डॉक्टर वैष्णव कहते हैं, "आज भारत में मोदी अकेले सबसे लोकप्रिय नेता हैं. इस समय भारतीय राजनीति में उनके निजी ईमानदारी और साख का करिश्मे के आगे कोई नहीं ठहरता."

मोदी विरोध

उनके अनुसार, "जब तक विपक्ष बिना किसी सकारात्मक दृष्टि के जितना ही उनका विरोध करना जारी रखेगा, वो और मजबूत होते रहेंगे."

संभवतः भारत के हताश विपक्ष की यह सबसे बड़ी समस्या हैः यानी, मोदी पर निशाना साधते हुए उनके पास अपना कोई वैकल्पिक उम्मीद का न होना.

स्वराज इंडिया पार्टी के संस्थापक योगेंद्र यादव जैसे अधिकांश लोगों का मानना है कि यूपी में हार से हिला हुआ विपक्ष 2019 में मोदी विरोधी एक महागठबंधन बनाने को मजबूर होगा.

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रुझानों में शुरुआती बढ़त मिलने के बाद बीजेपी कार्यकर्ता खुशी में अबीर गुलाल खेलते हुए.

वो कहते हैं, "यह आत्मघाती हो सकता है, क्योंकि विशुद्ध मोदी विरोधी राजनीति काम नहीं करेगी."

लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है और सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता. किसी ने भी नहीं अंदाज़ा लगाया था कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 2004 का चुनाव शांत पड़ी कांग्रेस गठबंधन के सामने हार जाएंगे.

लेकिन 2017 की गर्मियों तक तो मोदी की रेटिंग ऊंची बनी हुई है.

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