यूपी में मोदी की 'सुनामी' में बचे ये 7 कांग्रेसी

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उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के गठन के समय कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस के 28 विधायक थे.

17वीं विधानसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस दहाई के आंकड़े को भी नहीं छू पाई. पार्टी ने प्रचार अभियान की शुरुआत में उम्मीदें तो बंधाई पर नतीजे उम्मीदों के उलट रहे.

अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ हुए चुनावी गठबंधन में कांग्रेस के हिस्से 105 सीटें आई थीं जिन पर पार्टी ने चुनाव लड़ा.

लेकिन यूपी विधानसभा में पार्टी का नाम लेने के लिए केवल सात लोग ही चुनाव जीत पाए.

पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले रायबरेली और अमेठी के इलाके में गांधी परिवार अपनी साख बचाने में नाकाम रहा. इस इलाके में कांग्रेस सिर्फ रायबरेली और हरचंदपुर की सीटें बचा सकी.

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Image caption अदिति सिंह रायबरेली से चुनी गई हैं

1. अदिति सिंह (सीटः रायबरेली)पांच बार के विधायक रहे धाकड़ नेता अखिलेश सिंह की बेटी अदिति​ सिंह ने अपने पहले ही चुनाव में जीत दर्ज की है.

रायबरेली में उनकी जीत के अंतर का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनके निकटतम प्रतिद्वंदी बीएसपी के शाहबाज़ ख़ान 89 हज़ार वोटों से पीछे रह गए.

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Image caption अराधना मिश्रा कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं

2. अराधना मिश्रा मोना (सीटः रामपुर खास)

अदिति सिंह की कड़ी में ही अराधना मिश्रा मोना का भी नाम आता है. वे भी विरासत की लड़ाई लड़ रही थीं.

रामपुर खास सीट से जीतीं अराधना मिश्रा मोना के पिता प्रमोद तिवारी कांग्रेस के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं.

2012 में राज्यसभा के लिए चुने जाने से पहले तक प्रमोद तिवारी रामपुर खास सीट से लगातार नौ बार जीत चुके हैं.

अराधना ने इस सीट पर 2014 में पहली बार जीत दर्ज की थी.

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Image caption सपा के एमएलए का टिकट काटकर गठबंधन ने राकेश सिंह को मौका दिया था

3. राकेश सिंह (सीटः हरचंदपुर)

रायबरेली की ही एक और सीट हरचंदपुर में कांग्रेस के राकेश सिंह ने बीजेपी की कंचन लोधी को हराया.

हरचंदपुर सीट पर राकेश सिंह के प्रचार के लिए आरजेडी नेता लालू यादव भी रायबरेली आए थे.

हरचंदपुर की सीट पर सपा के विधायक थे पर गठबंधन के समझौते में ये सीट कांग्रेस के खाते में गई और सुरेंद्र विक्रम सिंह का टिकट कट गया.

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Image caption पिछली बार नरेशी सैनी मामूली अंतर से एमएलए बनने से चूक गए थे

4. नरेश सैनी (सीटः बेहट, सहारनपुर)

राजनीतिक रूप से संवेदनशील कहे जाने वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की बेहट सीट पर कांग्रेस के नरेश सैनी ने जीत दर्ज की है.

नरेश सैनी ने बीजेपी और बसपा के उम्मीदवारों को एक तिकोने मुकाबले में 26 हज़ार वोटों से हराया.

पिछली बार सैनी मामूली अंतर से विधानसभा पहुंचने से चूक गए थे.

इस सीट पर बसपा और बीजेपी 71 हज़ार वोट पाकर लगभग बराबरी पर रही और बाज़ी गठबंधन के पक्ष में चली गई.

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Image caption मसूद अख़्तर कांग्रेस से बीएसपी होते हुए पिछले साल ही कांग्रेस वापस लौटे थे

5. मसूद अख़्तर (सीटः सहारनपुर देहात)

सहारनपुर देहात की सीट से चुनाव जीतने वाले मसूद अख़्तर का कभी कांग्रेस तो कभी बीएसपी से साथ बना रहा.

कांग्रेस से बीएसपी होते हुए पिछले साल ही उनकी घर वापसी हुई थी.

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Image caption सुहैल अख्तर अंसारी

6. सुहैल अख़्तर अंसारी (सीटः कानपुर कैंट)

कानपुर कैंट की सीट पर चुनावी पंडितों की ख़ास नजर थी. इस सीट पर गठबंधन की दोनों पार्टियां सपा और कांग्रेस एक-दूसरे से मुक़ाबला कर रही थीं.

बाज़ी कांग्रेस प्रत्याशी सुहैल अख़्तर अंसारी के पक्ष में गई. उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को तकरीबन दस हज़ार वोटों से हराया.

समाजवादी पार्टी के मोहम्मद हसन रूमी चौथे स्थान पर रहे.

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Image caption अजय कुमार लल्लू पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं

7. अजय कुमार उर्फ लल्लू (सीटः तमकुहीराज)

तमकुहीराज के कांग्रेस विधायक अजय कुमार उर्फ लल्लू को कभी यूपी का सबसे गरीब विधायक करार दिया गया था.

उनके बैंक खाते में भले ही ज्यादा पैसा न हो लेकिन दर्ज आपराधिक मुकदमों के लिहाज से वे 'रईस' कहे जा सकते हैं.

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