अमित शाह की एक और शह, कई हुए मात

  • 11 मार्च 2017
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जनवरी 2016 की एक शाम अमित शाह अपने सरकारी बंगले के लॉन में कुछ पत्रकारों से एक सरकारी योजना पर बात कर रहे थे.

माहौल थोड़ा हल्का हुआ तो मैंने पूछा, "अमित जी, भाजपा अध्यक्ष पद के लिए चयन कब होने को है?"

जवाब मिला, "जब चुनाव की तारीख़ घोषित होगी, मैं अपना नामांकन भर दूंगा."

जवाब एकदम संतुलित था, लेकिन मेरे साथ-साथ कुछ दूसरे पत्रकारों के ज़हन में भी यही सवाल था.

वजह थी आरएसएस और ख़ुद भाजपा के भीतर हाल के चुनावी नतीजों पर बढ़ती सुगबुगाहट.

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कुछ ही महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव हुए थे और भाजपा की करारी शिकस्त हुई थी.

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अमित शाह के लिए ये बड़ा ही नहीं 'निर्णायक झटका' भी कहा जा रहा था.

2014 के आम चुनाव में भाजपा की और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कैम्पेन में अमित शाह की प्रमुख भूमिका थी.

उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों के जो अप्रत्याशित परिणाम दिखे थे उसके लिए अमित शाह के बूथ मैनेजमेंट और संगठन मज़बूत बनाने की कोशिश को श्रेय दिया गया था.

लेकिन तुरंत बाद हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, अमित शाह की रणनीति को धाराशाई करने में कोसों आगे रही.

इसके बाद नरेंद्र मोदी के 'ख़ास प्रतिद्वंद्वी' नीतीश कुमार के बिहार में चुनाव होने थे.

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ज़ाहिर था, मोदी अपने सबसे ख़ास 'सलाहकार' अमित शाह को इसकी भी कमान सौंपते और शाह पार्टी अध्यक्ष भी थे.

महीनों बिहार में डेरा डालने, मोदी की तमाम रैलियों और बिहार को 'हज़ारों करोड़ रुपए के केंद्रीय पैकेज' की घोषणा के बावजूद बिहार नितीश और लालू की झोली में गया.

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अब तो आलम 'करो या मरो' की लड़ाई का था.

2019 में भारत में आम चुनाव होने हैं और भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में जाने के लिए यूपी का 'सहारा' चाहिए था.

दोबारा दारोमदार अमित शाह के कन्धों पर था, लेकिन कुछ चुनावी शिकस्तों के बोझ तले.

अमित शाह ने वही किया जो उन्होंने 2013 में यूपी में आज़माया था.

उन्होंने दो लोगों को ठीक वही काम 2014 में ही थमा दिया जो लोकसभा चुनाव में थमाया था.

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ओम माथुर और सुनील बंसल भाजपा के ऐसे लोग रहे हैं जिन्हें पर्दे के पीछे रह कर काम करने में मज़ा आता है.

इन दोनों ने अमित शाह के साथ मिलकर 2014 के आम चुनावों में एक-एक बूथ पर रिसर्च की थी और बूथ प्रभारी नियुक्त किए थे.

इनमें से ज़्यादातर प्रभारियों का मिशन 2017 में जीत भी था.

जैसे-जैसे अमित शाह के पास बूथों का फ़ीडबैक आता गया उनका भरोसा बढ़ता गया कि चुनाव 'नरेंद्र भाई मोदी' के नाम पर ही लड़ना है.

न किसी सीएम उम्मीदवार का नाम उछालने की 'ग़लती' करनी है और न ही किसी 'बड़े कद्दावर' नेता को मिशन यूपी की कमान 'पूरी तरह' सौंपनी है.

गठबंधनों पर भी विचार होता रहा.

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बिहार के जातीय समीकरण में 'मात' खाने के बाद यूपी के दलित वोटरों, पिछड़े वर्ग के मतदाताओं और किसानों तक पहुँचने की अलग रणनीति बनाई गई.

अगर मतदाताओं के दिमाग़ से 'सर्जिकल स्ट्राइक की कथित सफलता' उतर गई थी तो भाजपा के कोर ग्रुप में ये बातें हो रहीं थीं कि 'नोटबंदी' का फ़ायदा तो मिलेगा ही.

अध्यक्ष अमित शाह ने अपने स्टार प्रचारकों से नोटबंदी, भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम और विकास करने की कटिबद्धता जैसी बातों को वोटरों तक पहुँचाने के लिए कहा.

उत्तराखंड और यूपी में अमित शाह की निर्णायक रणनीति शायद ये भी रही कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ठीक उसी तरह प्रचार करने के लिए मना लिया जैसा प्रचार मोदी ने 2014 में किया था.

नतीजा एक और 'मोदी लहर' के रूप में सामने आया जिसे खुद भाजपा के लोग भी पूरी तरह भांप नहीं पाए थे.

अमित शाह को एकाएक 2019 क़रीब भी लग रहा होगा और पहुंच में भी.

अगली मुलाक़ात में मैं अमित शाह से 2019 की रणनीति पर सवाल करूँगा.

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