नज़रिया: अंधेरे भविष्य और ईवीएम के मायाजाल में उलझीं मायावती

  • 12 मार्च 2017
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एक महीने तक आत्मविश्वास से दमकते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहीं बड़ी रैलियां संबोधित करने के बाद जब यूपी चुनाव के नतीजे आए तो बसपा प्रमुख मायावती के दु:ख और हैरानी का कोई अंत नहीं था.

कहां तो सत्ता में वापसी एक कदम दूर दिख रही थी और कहां पार्टी 19 अदद विधायकों के रूप में, सिमट कर हाथों और पैरों की उंगलियों में समा गईं.

अब मायावती जो कह रही हैं, उसमें छिपी यह अनुगूंज भयानक है कि जो काम पहले दबंग नेताओं के लठैत और बंदूकधारी दलितों और दूसरे कमजोर तबकों को पोलिंग बूथ तक पहुंचने से रोक कर करते थे, उसे अब ईवीएम मशीन में 'तकनीकी षडयंत्र' के ज़रिए किया जा रहा है.

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कहां गए मुस्लिम वोट

मुस्लिम बहुल इलाक़ों में भाजपा के उम्मीदवारों के जीतने के पीछे लोकतंत्र का गला घोंटने की साज़िश के उनके आरोप को यूं ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

एक भी मुसलमान को टिकट न देने वाली और उनके प्रति अपनी घृणा को न छिपाने वाली भाजपा की पचास फीसदी से भी अधिक मुस्लिम वोटरों वाले धार्मिक रंगत के कस्बे देवबंद से जीत की कोई राजनीतिक व्याख्या संभव नहीं है.

इस बीच वक़्त बदला है लेकिन नतीजा एक है, तब चुनाव जीतने वाला उनका भी नेता बन बैठता था जिन्हे पोलिंग बूथ तक पहुंचने नहीं दिया जाता था.

आने वाले दिनों में, भाजपा की कामयाबी का हश्र भी कुछ इसी तरह किया जाने वाला है.

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'ईवीएम षडयंत्र'की जांच?

मायावती के आरोपों की सच्चाई का पता तब चलेगा जब केंद्र की भाजपा सरकार जांच कराने की ज़हमत उठाएगी लेकिन वे फिलहाल ऐसी सच्चाई को जानते हैं जिसमें उनका नेतृत्व, उनकी पार्टी और दलित आंदोलन (चाहे जिस हाल में हो) संकट में घिरे दिखाई दे रहे हैं.

यह संकट बहुत दिनों से मंडरा रहा था लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में सतह पर आया जब यूपी ने मायावती को 'ईवीएम षडयंत्र' के बारे में बताया था लेकिन उन्होंने इसे मोदी लहर में उनके बह जाने का कारनामा समझा था.

ईवीएम षडयंत्र हो या मोदी पर प्यार बरसाती यूपी की जनता का फैसला, मायावती के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को टूटने से बचाने की है.

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मायावती की चुनौती

इस चुनाव में, मायावती ने बड़ी तादाद में ऐसे नौदौलतिया करोड़पतियों को उम्मीदवार बनाया था जिनका न कोई राजनीतिक अतीत है, न दलित आंदोलन से लेना-देना है.

ये नई प्रजाति के नेता मायावती की सत्ता में वापसी की प्रबल संभावनाओं को देख कर अपना कारोबार और राजनीति चमकाने के लिये आए थे.

नेता नहीं सत्ता के प्रति प्रतिबद्धता के कारण वे अब अपनी सहूलियत की जगहों का रुख करेंगे.

टिकट बांटने की कुख्यात मायावती शैली के कारण, बसपा में ऐसे नए नेताओं की संख्या उन नेताओं से ज्यादा हो चुकी है जिनका सरोकार बसपा संस्थापक कांशीराम और बहुजन आंदोलन से था.

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बागियों से नुकसान

राजनीति की इसी मायावती शैली ने स्वामी प्रसाद मौर्य (पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष) जैसे नेताओं को भी बदल दिया जो अपने बेटे-बेटियों को टिकट ना मिलने के कारण बगावत कर भाजपा में चले गए.

कांशीराम के सहयोगी रहे दलित आंदोलन से प्रतिबद्धता वाले नेताओं की संख्या अब पार्टी में गिनी-चुनी रह गई है.

बसपा मूलत: वोटों का गठजोड़ कर चुनाव प्रबंधन करने वाली एक सत्तामुखी पार्टी में बदल गई है और दूसरी तरफ उसका वोट आधार सिकुड़ता जा रहा है.

सत्ता से बढ़ती दूरी के कारण, मायावती के नेतृत्व को चुनौती मिलने लगी है और बगावत अक्सर होने लगी है.

आए दिन मायावती का कोई करीबी नेता पार्टी को 'टिकट बेचने की दुकान' बताते हुए बाहर चला जाता है.

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क्या अखिलेश को भी है षडयंत्र का शक़?

इसी बीच, अपने काम के जरिए बोलने के दावे के बावजूद यूपी के मतदाताओं द्वारा खामोश करा दिए गए पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी 'ईवीएम षडयंत्र' से इनकार नहीं किया है.

बल्कि मायावती के आरोप पर वज़न रखते हुए भाजपा की केंद्र सरकार से जांच की मांग की है.

साथ ही यह भी कहा है कि वे इस दिशा में चुनावी नतीजों के निजी विश्लेषण के बाद पहल करेंगे.

ग़ौर करने की बात यह है कि अखिलेश यादव और मायावती का हर मुद्दे पर एक-दूसरे से छत्तीस का आंकड़ा है लेकिन दोनों नेता, भाजपा की ख़ुद अपनी उम्मीदों को भी झुठलाती जीत से हैरान होते हुए षडयंत्र देख रहे हैं.

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यह समानता उग्र हिंदुत्व की विकराल होती राजनीति के ख़िलाफ़ पिछड़ा-दलित मोर्चा बनाने की संभावना खुद में छिपाए हुए है.

हो सकता है ईवीएम इंजीनियरिंग की मंडराती आशंकाएं पहले आजमाई जा चुकी सोशल इंजीनियरिंग के नए पैकेजिंग में वापसी का कारण बने.

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