नज़रिया: केजरीवाल क्यों नहीं मार पाए छक्का?

  • 14 मार्च 2017
इमेज कॉपीरइट TWITTER @AAPPunjab2017

आम आदमी पार्टी पंजाब विधानसभा चुनाव के मैच में आखिरी गेंद पर छक्का मार कर जीतना चाहती थी, पर वह केवल चौका मार पाई. नतीजतन वह रनर अप रही.

अमरिंदर सिंह की कुशल रणनीति ('आप' को माँझा और दोआबा में पैर न जमाने देना और मालवा में भी उसे एक कहीं छोटे इलाके में सीमित कर देना) और अकाली दल के उम्मीद से कहीं अच्छे प्रदर्शन ने उसके वोट प्रतिशत को 2014 से आगे नहीं जाने दिया.

इस निराशा के बावजूद यह अपने आप में यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है, क्योंकि अब उसे अगले पाँच साल तक विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाने का श्रेय मिलेगा.

'...पर केजरी लंदन को दिल्ली बना सकते हैं'

नज़रिया: चुनाव में पैसे के छिड़काव से वोट पैदा होता है?

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान के साथ बीबीसी ने फेसबुक लाइव किया.

कांग्रेस के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को भीषण घाटे में डूबी हुई एक ऐसी अर्थव्यवस्था मिलेगी जिसे दुरुस्त करना कांग्रेस सरकार के लिए ख़ज़ाना खाली होने के कारण बहुत मुश्किल होगा.

कांग्रेस सरकार

केजरीवाल की पार्टी ने अगर विपक्ष की भूमिका ठीक से निभाई तो वह अगले चुनाव से पहले ही अपनी ज़मीन को पुख्ता कर सकती है.

इससे पहले कि कांग्रेस सरकार की विफलताओं के कारण अकाली दल को दोबारा उभरने का मौका मिले, आम आदमी पार्टी कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर सकती है.

लेकिन ऐसा करने के लिए उसे अपनी उस सबसे बड़ी कमी की भरपाई करनी होगी जिसके कारण वह छक्का नहीं मार पाई.

एक मेनिफ़ेस्टो जिसपर मोदी, मुलायम सब सहमत

केजरीवाल ने मांगी जेटली के बैंक खातों की डिटेल

इमेज कॉपीरइट TWITTER @ArvindKejriwal

यह कमी है पार्टी के पास एक पंजाबी (सिख) केजरीवाल के न होने की.

पंजाब में 'आप'

दिल्ली से आए हुए केजरीवाल पगड़ी पहन कर और हिंदी में भाषण दे कर पार्टी को केवल रनर अप ही बनवा सकते थे.

बिना स्थानीय नेतृत्व का विकास किए पंजाब में आम आदमी पार्टी अपनी सम्भावनाओं को ज़मीन पर नहीं उतार सकती.

यह कमी न तो भगवंत मान पूरी कर सकते हैं, न ही एच.एस. फुल्का और न ही गुरप्रीत सिंह.

पकड़े गए 'चिल्ड्रेन बैंक ऑफ़ इंडिया' के नोट

'बूढ़ी मां का सियासी दुरुपयोग कर रहे हैं मोदी'

इमेज कॉपीरइट TWITTER @AAPPunjab2017

यह ठीक है कि भगवंत और गुरप्रीत के कॉमेडी टैलेंट का पार्टी को लाभ हुआ है पर यह दल पंजाबी कॉमेडियनों और दिल्ली से आए नेताओं व चुनाव प्रबंधकों की पार्टी बन कर नहीं रह सकती.

विधायक दल

उसे एक नेता चाहिए और इसी दृष्टिकोण से 'आप' के विधायक दल के नेता का चुनाव होना चाहिए.

पंजाब में अपेक्षित नतीजे न निकाल पाने की एक बड़ी वज़ह यह भी थी कि इस पार्टी को वहाँ रिमोट कंट्रोल से चलने वाले संगठन के रूप में देखा जाने लगा था.

पार्टी अगर पंजाब में कांग्रेस को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाती तो केजरीवाल को राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के प्रमुख विपक्षी की छवि मिल सकती थी.

केजरीवाल के दो साल, क्या कुछ हुआ कमाल

सियासत और सरकार ने 'आप' को कितना बदला

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 'नोटबंदी' के मामले पर बीबीसी हिंदी से बात की.

दूसरे, इस जीत से उसकी दिल्ली की राजनीति को भी एक नया उछाल मिलता.

ज़बरदस्त पराजय

चूँकि पंजाब में ऐसा नहीं हो सका और गोवा में उसके नतीजे सिफर निकले, इसलिए अब उसे एक उल्टी समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

उसके विरोधियों और आलोचकों ने कहना शुरू कर दिया है कि इस पार्टी के लिए आगे का रास्ता बंद हो चुका है.

हालाँकि ये वही विरोधी हैं जिन्होंने लोकसभा चुनाव में उसकी ज़बरदस्त पराजय के बाद उसका शोकगीत लिख दिया था.

मोदी-शाह के किले को ढहा पाएंगे केजरीवाल?

मोदी, अखिलेश का नया SCAM: A फोर...

इमेज कॉपीरइट TWITTER @AAPPunjab2017

पर आम आदमी पार्टी ने विधानसभा में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके सभी को गलत साबित कर दिया.

एमसीडी चुनाव

'आप' एक बार फिर अपनी आसन्न मृत्यु का घोषणा करने वालों को गलत साबित कर सकती है, बशर्ते वह अप्रैल के मध्य में होने वाले राजधानी के तीनों नगर निगमों में ज़बरदस्त जीत हासिल करके दिखाए.

ऐसा उसे करना ही होगा. भाजपा इस समय नगर निगम की राजनीति में दस साल की एंटीइनकम्बेंसी का सामना कर रही है.

उसने अपनी एंटीइनकम्बेंसी को बेअसर करने के लिए रणनीतिक रूप से तय कर लिया है कि वह मौजूदा पार्षदों को टिकट नहीं देगी ताकि वॉर्ड स्तर पर काउंसिलरों के खिलाफ जड़ जमा चुकी नाराज़गी से बचा सके.

अरविन्द केजरीवाल क्या 'ख़तरनाक खेल' खेल रहे हैं?

जिसके घर केजरीवाल के रुकने पर हुआ बवाल

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
आम आदमी पार्टी का मिशन गुजरात, गोपाल राय को मिला प्रभार

प्रदेश अध्यक्ष स्तर पर भाजपा पहले ही बदलाव कर चुकी है और उसके नए अध्यक्ष ने झुग्गियों और पुनर्वास कॉलोनियों में अपना डेरा डाला है ताकि 'आप' के जनाधार में सेंध लगाई जा सके.

पंजाब की कामयाबी

जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, वह संगठन और हौसले के लिहाज़ से पस्त हालत में है. उसका नेतृत्व चमकदार नहीं है.

इसके बावजूद अगर कांग्रेस ने निगम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर दिया तो उसे पंजाब की कामयाबी के बाद उसी सिलसिले में उसका दूसरा छक्का माना जाएगा.

साथ ही यह भी मान लिया जाएगा कि भाजपा के खिलाफ कांग्रेस की जगह लेने की केजरीवाल की कोशिशें अपनी क्षमताओं से ज़्यादा हासिल करने की कोशिश ही है.

इसलिए नगर निगम के चुनाव में 'आप' चौका लगा कर काम नहीं चला सकती.

क्या पंजाब को कभी मिलेगा दलित मुख्यमंत्री?

मोदी जी बिल्कुल पगला गए हैं: केजरीवाल

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बंत सिंह की पहचान दलितों के मशहूर लोकगीत गायक की रही है.

जीत और प्रभावशाली जीत के बिना न केवल पंजाब की निराशा नहीं धुलेगी, वरन दिल्ली की राजनीति में भी उसके प्रभाव में गिरावट आनी शुरू हो सकती है.

इसके अलावा 'आप' को अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को स्पर्श देने का एक और मौका अक्टूबर में गुजरात विधानसभा चुनावों में मिलेगा.

मोदी के गृह प्रदेश में भाजपा इस समय पटेलों, दलितों और मुसलमानों के संयुक्त मोर्चे के अंदेशों का सामना कर रही है.

उसके खिलाफ़ दो दशक से ज़्यादा के लगातार शासन की एंटीइनकम्बेंसी भी है. इस परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए वहाँ कांग्रेस अच्छी हालत में नहीं है.

पंजाब की तरह गुजरात भी 'आप' के दाँव की प्रतीक्षा कर रहा है.

(अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में प्रोफ़ेसर और भारतीय भाषा केंद्र के निदेशक हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)